दुनिया में चमक फीकी हो गई है ब्रिटेन की?

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क्या विश्व मंच पर ब्रिटेन की भूमिका एक दशक लंबे व्यवस्थित उतार की कहानी है, जिसमें एक समय बेहद बड़े साम्राज्य की समयानुसार वापसी शामिल है.

या फिर यह कहानी एक मध्यम शक्ति के एक देश की है जो विश्व की नई हक़ीकतों को उजागर करती है.

ऐसे में हमें किसकी ओर देखना चाहिएः यूरोप या अमरीका की ओर?

'क्षमता से ज़्यादा उछलता है'

अमरीकी विदेश मंत्री डीन एकसन ने 1962 में ब्रिटेन को एक ऐसा देश बताया था जिसका साम्राज्य तो खो गया है लेकिन अपनी भूमिका उसे अभी तलाश करनी है.

लेकिन ब्रिटेन के पूर्व विदेश सचिव डगलस हर्ड जैसे लोगों को यह कहना ठीक लगता था कि वैश्विक मामलों में ब्रिटेन 'अपनी क्षमता से ज़्यादा उछलता है.'

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अमरीका में 11 सितंबर के हमले के बाद टोनी ब्लेयर ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर ब्रिटेन के स्थान के बारे में अपने विचार रखे थे, ''अगर एक महाशक्ति न हो तो भी कम से एक ऐसी ताकत तो रहे जो दुनिया के भले के लिए हो.''

लेकिन विश्व में ब्रिटेन की भूमिका के बारे में बहस जारी है.

ब्रितानी चुनाव प्रचार पर पहली बहस में कुछ लोगों को यह पूछने पर मजबूर होना ही पड़ा कि क्यों विदेश नीति पर एक भी सवाल नहीं है.

सफ़ाई में कहा जा सकता है कि सीमित समय में सब विषयों पर बात नहीं की जा सकती.

लेकिन अजीब बात यह है कि विदेश नीति में रक्षा खर्च और ट्राइडेंट को दरकिनार करने की झलक मिलनी चाहिए थी, जो चुनाव प्रचार के दौरान सही तरीके से नहीं दिखी.

'ब्रिटेन की भूमिका?'

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ऐसे समय में यह बहुत ही उलझाने वाला हो सकता है जब विश्व भर में कई संकट मौजूद हैं.

सीरिया, इराक़ और यमन में सैन्य संघर्ष चल रहे हैं, लीबिया टूट रहा है और खुद यूरोप में यूक्रेन का संघर्ष जारी है.

नीति निर्माताओं को ज़रा भी पता नहीं है कि रूस के बढ़ते प्रभाव से कैसे निपटा जाए और चीन की बढ़ती शक्ति के साथ कैसे मुकाबला किया जाए.

लेकिन ब्रिटेन की भूमिका क्या है, इसके अलावा अगर यह कुछ करना चाहे, तो ऐसे समय में जबकि बजट कम होता जा रहा हो, वास्तविक और व्यावहारिक क्या होगा?

कुछ हद तक हर्ड की टिप्पणी कि ब्रिटेन अपनी क्षमता से ज़्यादा कूदता है, एक ऐसी बहस है जो जारी है.

एक वक्त बड़े साम्राज्य पर राज करने वाला जांबाज देश ब्रिटेन अब भी शीर्ष पर है. उसकी आवाज़ अब भी ऊंची है और आज की स्थिति में उसकी भूमिका सराहनीय है.

'विदेश नीति कार्यकर्ता'

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ब्रिटेन की कहानी को एक वैश्विक महाशक्ति की भूमिका से धीरे-धीरे पीछे हटने को ब्रिटेन की शक्ति और प्रभाव के अन्य उदाहरणों के साथ संतुलित किए जाने की ज़रूरत है.

इसमें इराक़ और अफ़गानिस्तान के साथ ही बोस्निया और कोसोवो के संघर्ष में इसके शिकरत करने की बात है.

यह मार्गरेट थैचर और टोनी ब्लेयर को अंतरराष्ट्रीय मंच के बड़े खिलाड़ियों के रूप में दर्शाती है, जो अंतरराष्ट्रीय नीतियों के बड़े मुद्दों पर अमरीका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे.

दुनिया भर में जैसे जैसे संकट बढ़ते जा रहे हैं ब्रिटेन की भूमिका कम होती जा रही है.

वो कहते हैं कि ग्रीस के कर्ज़ पर यूरोज़ोन के गतिरोध को देखो, ब्रिटेन की इसमें कोई भूमिका नहीं है, वह कुछ नहीं कर सकता.

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वह यूक्रेन मामले में व्लादिमिर पुतिन को रोकने में जर्मनी की चांसलन एंगेला मर्केल के साथ ही फ्रांस की भूमिका की ओर इशारा करते हैं और फिर पूछते हैं कि इसमें ब्रिटेन कहां था?

वह अमरीका की सीरिया में कार्रवाई का समर्थन न करने की 2013 में संसद के फ़ैसले को विदेश नीति में नेतृत्व से पीछे हटने का एक और उदाहरण मानते हैं.

वे एक और उदाहरण ईरान वार्ता का देते हैं, जिसमें उनका दावा है कि फ्रांस की बात ब्रिटेन के मुक़ाबले ज़्यादा प्रभावी है. दूसरे शब्दों में महत्वपूर्ण विदेश नीति के मुद्दों पर कभी ब्रिटेन ने आगे बढ़कर नेतृत्व किया था, लेकिन अब ऐसा नहीं है.

'सैन्य शक्ति से बेहतर तरीका'

इसके विपरीत तर्क कुछ इस तरह हैं. ब्रिटेन की जनता इराक़ और अफ़गानिस्तान के बाद सैन्य हस्तक्षेप से थक गई है.

लीबिया में कर्नल मुअम्मर गद्दाफ़ी के तख़्ता पलट के लिए पश्चिम की सैन्य कार्रवाई ने जनता की अविश्वास की भावना को बढ़ाया है.

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इस तर्क के समर्थकों का कहना है कि ब्रिटेन को वास्तविकता को समझने की ज़रूरत है. यह ज़्यादा से ज़्यादा एक औसत दर्जे की शक्ति है, जिसकी कुछ और प्राथमिकताएं भी हैं.

यह विश्व के मंच पर नहीं छा सकता और न ही उसे ऐसी इच्छा करनी चाहिए. उसे अपने संघर्षों को सावधानीपूर्वक किसी और समय और उम्र के लिए चुनकर रखना चाहिए.

वह आईएस के ख़िलाफ़ जंग में अमरीका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है और इराक़ में आईएस को कमज़ोर करने के सैन्य अभियान में एक पक्ष भी है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अब भी इसकी आवाज़ महत्वपूर्ण है जहां इसके पास कीमती स्थाई सीट है. वह यूरोपीय यूनियन का वरिष्ठ सदस्य है और नाटो की स्थापना करने वाले सदस्यों में से है जहां अब भी उसकी आवाज़ सुनी जाती है.

और फिर अमरीका के साथ कथित विशेष संबंध हैं. इस संदर्भ में ब्रिटेन एक समझदार दोस्त है.

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उनका कहना है कि ब्रिटेन अपनी विदेश नीति को व्यापार और सांस्कृतिक-आर्थिक ताकत के ज़रिए आगे बढ़ा रहा है.

ये लोग जंग के बाद जर्मनी और जापान के बड़ी और महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं के रूप में सफल होने की ओर इशारा करते हैं.

यह कहा जाता है कि इन देशों ने साबित किया है कि व्यापारिक और आर्थिक सफलता सैन्य शक्ति दिखाने के बजाय बेहतर और ज़्यादा फायदेमंद तरीका है.

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