यमन में आख़िर झगड़ा किस बात पर है

  • 22 अप्रैल 2015
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पिछले कुछ महीनों में उत्तरी यमन में बसने वाले हूती विद्रोहियों ने मुल्क के दूसरे हिस्सों पर हमला कर दिया, राजधानी सना पर क़ब्ज़ा कर लिया, राष्ट्रपति को देश छोड़ने पर मजबूर किया और दक्षिणी बंदरगाह अदन को क़बज़े में ले लिया.

तो क्या संघर्ष की अहम वजह भौगोलिक प्रतिद्वंद्विता है?

हूती शिया मुसलमान हैं, जिन्हें ईरान का समर्थन हासिल है. यमन के बाक़ी हिस्सों में बहुतायत सुन्नी मुसलमानों की है और हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ बमबारी करने का नेतृत्व सऊदी अरब ने शुरू किया था. तो क्या ये सांप्रदायिक संघर्ष है, या एक क्षेत्रीय छद्म युद्ध?

हूती विद्रोहियों ने मौजूदा नेतृत्व के ख़िलाफ़ पूर्व राष्ट्रपति सालेह से हाथ मिलाया है. यमन में 2011 की क्रांति के बाद सालेह को हटा दिया गया था. तो क्या मौजूदा संघर्ष की जड़ें क्रांति की विफलता में हैं?

क्या सोचते हैं, यमन के लोग, एक विश्लेषण

सारा जमाल

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Image caption सारा जमाल सना में रहती हैं

सारा राजधानी सना में रहती हैं और उन्होंने 2011 की क्रांति का समर्थन किया था.

सारा कहती हैं, "ये सांप्रदायिक संघर्ष नहीं है. लोग मज़हब के ख़ातिर एक-दूसरे की हत्याएं नहीं कर रहे हैं. मैं 2011 में अपने संप्रदाय के बारे में ठीक से नहीं जानती थी. जब मैं बड़ी हो रही थी तो विभिन्न पृष्ठभूमियों से आने वाले दोस्तों के साथ पास पास खड़े होकर प्रार्थनाएं कीं. हमारे स्कूल अलग-अलग नहीं होते थे. हमारा एक ही धार्मिक पाठ्यक्रम था, हम सभी एक जैसी पढ़ाई करते थे."

क्रांति का पहला दिन 'हनीमून' था, जिसमें विभिन्न पृष्ठभूमियों से जुड़े लोग आए थे. हमने एक प्लेट में खाना खाया, अजनबियों की मौत पर आंसू बहाए, एक-दूसरे का बचाव किया, और पूरी क्रांति के दौरान शांत और अपने लक्ष्यों के प्रति वफादार रहे.

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पिछली सत्ता ने देश के संसाधानों को चूस लिया था. मुल्क में संसाधन प्रचूर थे. वो सब सालेह, उनके परिवार और सहयोगियों को गया जिनकी तादाद शायद मुल्क की जनसंख्या का एक फ़ीसद हो. उन्होंने 33 सालों तक अत्याचार किया लेकिन इसके लिए कोई सज़ा नहीं हुई.

मौजूदा संघर्ष सौ प्रतिशत क्रांति के बाद की पैदा हुई निराशा का नतीजा है. लोग सड़कों पर आए, उनकी कुछ मांगें थी, वे पूरी नहीं हुई. उन्हें न्याय नहीं मिला, उनकी बात नहीं सुनी गई, अब यह पूरी तरह से बदला है.

मुझे 2011 की क्रांति में मारे जाने पर अफसोस न होता, क्योंकि वो एक बेहतर भविष्य के लिए क़ुरबानी होती.

बरा शिबन

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बरा शिबन परोपकारी संस्था रिपरिव इन यम के साथ काम करते थे लेकिन फिलहाल लंदन में रह रहे हैं.

मौजूदा संघर्ष 33 साल के अत्याचारों का नतीजा है. पूर्व राष्ट्रपति सालेह ने ख़ुद को सत्ता में बनाए रखने के लिए कई संघर्षों को हवा दे रखी थी.

2004 में हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति सालेह के युद्ध के दौरान लगभग 40 हज़ार लोग मारे गए थे. इससे लोगों में यह भावना गहरे तक घर गई कि सरकार को अपने नागरिकों की कोई चिंता नहीं है और इस युद्ध को हमेशा के लिए क़ायम रखना चाहती है.

हूती ख़ुद को नए सत्ता केंद्र के रूप में देख रहे हैं. मेरा डर है कि सांप्रदायिक संघर्ष को भड़काना और सांप्रदायिक आधार पर इसे युद्ध की शक्ल देना आसान है.

सुमेर नसीर

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Image caption सुमेर नसीर न्यूयॉर्क में पढ़ाई कर रही हैं

सुमेर नसीर यमनी मूल की अमरीकी नागरिक हैं और न्यूयॉर्क में पढ़ाई करती हैं. लेकिन युद्ध की वजह से यमन के दक्षिणी हिस्से में फंसी हैं.

सड़कों पर जारी लड़ाई दिल को दहलाने वाली शक्ल लेती जा रही है. सड़कों पर टैंक दौड़ रहे हैं जो कभी भी किसी तरफ़ गोले बरसाना शुरू कर देते हैं. कुछ वैसे लोग हैं जो फ़ौज, और हूतियों के ख़िलाफ़ हैं और दूसरी तरफ़ हूती हैं जो उनपर हमले कर रहे हैं.

1990 में यमन का उत्तरी और दक्षिणी हिस्सा एक ही देश के हिस्से थे.

वास्तव में दक्षिणी हिस्सा ज़्यादा खुशहाल था. लेकिन चार साल बाद ही सालेह ने जैसे ही सत्ता संभाली देश गृह युद्ध की गिरफ़्त में आ गया.

2007 में दक्षिणी यमन में आंदोलन शुरू हुआ, वे अलग देश की मांग नहीं कर रहे थे, लेकिन अपनी समस्याओं का हल करने की बात कर रहे थे.

इसलिए मौजूदा संकट का हल तब तक नहीं होगा, जब तक दक्षिणी यमन की चिंताओं को दूर नहीं किया जाता.

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