आज से सौ साल पहले, पांच लाख लोगों का क़त्ल

  • 24 अप्रैल 2015
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Image caption आज भी 24 अप्रैल को आर्मीनिया में दुख के साथ याद किया जाता है.

आज से ठीक सौ साल पहले, यानी 24 अप्रैल 1915 को तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य ने राजधानी कांस्टैंटिनोपोल से आर्मीनियाई समुदाय के दो सौ लोगों को गिरफ़्तार किया था.

निर्वासन और सामूहिक जनसंहार के एक बर्बर अभियान की यह शुरुआत थी, जिसमें तुर्की के कम से कम पांच लाख आर्मीनियाई लोगों का सफ़ाया हो गया. आर्मीनियाई इसे जनसंहार कहते हैं.

बीबीसी के दो पत्रकारों ने तुर्की के गुम हुए आर्मीनियाईयों के बारे में जानने की कोशिश की.

Image caption इस्तांबुल में अपनी यात्रा शुरू करने से पहले बीबीसी संवाददाता लारा और रेंग्जिन.

बीबीसी पर्शियन की लारा पेट्रोसियन्स ने अपने आर्मीनियाई परदादा के परिवार की कहानी तलाशते हुए तुर्की के पूर्वी शहर वॉन की यात्रा की, जो इस हत्याकांड से किसी तरह बच निकले और ईरान में पनाह लेने में क़ामयाब रहे.

बीबीसी टर्किश की पत्रकार रंग्जिन आर्सलॉन ने अपने गृह जनपद एस्कीशेहिर की यात्रा की. एक समय यहां आर्मीनियाई समुदाय बड़ी संख्या में रहता था.

लारा और रेंग्जिन ने इस्तांबुल से अपनी यात्रा की शुरुआत की.

लारा की कहानी

किसी भी अन्य आर्मीनियाई बच्चे की तरह मैं भी 1915 में हुए अत्याचार की कहानियां सुनते हुए बड़ी हुई हूँ.

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Image caption 1915 में हुए क़त्लेआम को आर्मीनियाई दुख के साथ याद करते हैं.

मैं उम्मीद कर रही थी कि तुर्की में अपने परदादा-परदादी के बारे में कोई निशान तलाशने में किसी तरह मैं सफ़ल हो जाउंगी, जो उन्होंने सौ साल पहले अपने पीछे छोड़े होंगे.

मेरे परदादा मिहरान वॉन क़स्बे में ज्वैलर थे. यह क़स्बा ऑटोमन साम्राज्य के बिल्कुल पूर्वी छोर पर स्थित था.

जब क़त्लेआम शुरू हुआ तब वे और उनकी पत्नी आर्मीनेह, पहाड़ों के रास्ते भाग निकले थे. आख़िरकार उन्होंने ईरान में पनाह ली. यहीं मैं पैदा हुई और पली बढ़ी.

आज वॉन एक विशाल और शोरशराबे वाले ऐसे शहर में तब्दील हो चुका है, जहां ट्रैफ़िक और चमकते साईनबोर्ड वाली दुकानें हैं.

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Image caption तुर्की इन हत्याओं को नरसंहार कहने का विरोध करता आ रहा है.

लेकिन आर्मीनियाई लोगों के पुराने वीरान क्वार्टर अभी भी देखे जा सकते हैं. छोटे-छोटे घरों और दुकानों की वो क़तारें जहां कभी मेरे परदादा-परदादी रहते और काम करते थे, तभी से ढ़ही पड़ी हैं.

यहां बची हुई कच्ची सड़क पर मैं आगे बढ़ती हूँ, जिस पर अब घास उग आई है. मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि मैं वहां चल रही हूं जहां कभी आर्मीनेह और मिहरान के क़दम पड़े थे और कि यह वही जगह है जहां कभी शहरी ज़िंदगी की चहल-पहल हुआ करती थी.

हमारे पास वॉन के चंद परिवारों की जो कुछ यादग़ार चीज़ है, वो आर्मीनियाई सुनार एसोसिएशन की 1908 में ली गई एक तस्वीर है.

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Image caption वॉन के आर्मीनियाई सिल्वरस्मिथ एसोसिएशन की 1908 की तस्वीर (लारा के परदादा मिहरान पहली क़तार में दाएं से दूसरे.)

तस्वीर में मिहरान पहली क़तार में बैठे हैं. इसमें वो नौजवान और संजीदा लग रहे हैं: उस त्रासदी से बिल्कुल अनजान जो उन सबको लील जाने वाली थी.

मैं शहर के बीचोबीच मौजूद आभूषण बाज़ार में इस तस्वीर को इस उम्मीद में ले गई कि शायद किसी कारीगर से कोई सुराग मिल जाए.

बहुत हताशा मिली, कोई भी सुराग या कहानी हाथ नहीं लगी. आर्मीनियाईयों के साथ क्या घटना घटी थी, इस बारे में कुछ भी जानने की बात कोई स्वीकार नहीं कर रहा था.

मेरी हताशा को भांपते हुए मेरे अनुवादक ने कहा, “यह सामूहिक विस्मृति है.”

आख़िरकार एक कार्पेट शॉप में मुझे कुछ ऐसा मिला जो मेरे परिवार के अतीत से जुड़ा हुआ था.

मेरा ध्यान ज्यामितीय डिज़ाइन वाले कंबंलों के एक ढ़ेर की ओर गया. दुकानदार ने बताया, “ये सौ साल पुराने हैं.”

Image caption सौ साल पुरानी, आर्मीनियाई लोगों द्वारा बनी कालीन.

दुकानदार ने बताया, “ये आर्मीनियाई लोगों के हाथ के बने हैं और जब वो चले गए तो उनके घरों से इन्हें इकट्ठा किया गया था.”

मैंने इनमें से एक कंबल को उठाया और मुझे लगा कि मेरे हाथ में ऐसा कुछ है जिसे उस समय बनाया गया था जब आर्मीनेह और मिहरान वॉन में रहते थे.

यह उस दुनिया का बहुत छोटा लेकिन बहुत क़ीमती यादगार है जो कभी हमारा घर हुआ करता था.

रेंग्जिन की कहानी

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Image caption आर्मीनिया नरसंहार को याद में जुलूस में हिस्सा लेते आर्मीनियाई समुदाय के लोग

जब मैं विश्वविद्यालय में पहुंची मुझे पता चला कि एनातोलिया के बीचों-बीच स्थित मेरा गृह जनपद एस्कीसेहिर में समृद्ध आर्मीनियाई इतिहास मौजूद है.

मुझे ये जानकर बहुत हैरानी हुई कि एक शताब्दी पहले यहां क़रीब पांच हज़ार आर्मीनियाई रहते थे.

मुझे लगता था मैं एस्कीशेहिर को बहुत अच्छी तरह जानती हूँ, लेकिन अब मुझे इसके गुम हुए अतीत के बारे में नई नई जानकारी मिल रही थी.

मैं इस क़स्बे के बीचों-बीच स्थित एक इमारत को देखने गई, जिस पर बिना ध्यान दिए मैं कई बार इसके पास से गुजर चुकी हूँ.

जब मैं यहां रहती थी तो यहां एक सिनेमाघर हुआ करता था, जिसमें एडल्ट फ़िल्में लगती थीं.

अब यह एक सांस्कृतिक केंद्र है. लेकिन जब मैं इतिहास के एक स्थानीय जानकार केमाल याकूट के साथ यहां आई तो उन्होंने मुझे बताया कि 1915 में यह एक आर्मीनियाई चर्च हुआ करता था.

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Image caption आर्मीनियाई बस्ती, जो अब पूरी तरह नष्ट हो चुकी है.

मैं खाली पड़ी कुर्सियों की क़तारों को देखती हूँ और मैं उन सभी लोगों के बारे में सोचने लगती हूँ जो यहां अक्सर आया करते होंगे.

मैं उनके चेहरों और उनके साथ क्या हुआ इसकी कल्पना करने की कोशिश करती हूँ.

केमाल याकूट मुझे बताते हैं कि हमारे क़स्बे में आर्मीनियाईयों ने पहला थियेटर बनाया था.

वो बेकरी, चमड़े के कारखाने और आभूषण की दुकानें चलाते थे. जब उन्हें यहां से जाने के लिए मजबूर किया गया स्थानीय परिवारों ने उनके घर और व्यवसायों को मामूली दामों में ख़रीद लिया.

बहुत से आर्मीनियाई एस्कीशेहिर में रेलवे लाइन बनाने का काम करने के लिए आए थे. और सबसे दुखद बात ये है कि इसी रेलवे का इस्तेमाल उन्हें यहां से बाहर भेजने के लिए किया गया.

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Image caption एस्कीशेहिर रेलवे स्टेशन, जिसे आर्मीनियाईयों को 1915 में सामूहिक रूप से निर्वासित करने के लिए इस्तेमाल किया गया.

इनमें से अधिकांश लोग जिस स्टेशन पर काम करते थे, वो वही जगह है जहां उन्होंने इस शहर को छोड़कर अज्ञात भविष्य की ओर जाने से पहले अंतिम वक़्त बिताया था.

मुझे ताज्जुब है कि यदि आर्मीनियाई यहां अभी भी रह रहे होते तो यह शहर कैसा लगता.

यहां बड़े होते और आर्मीनियाई दोस्तों के साथ रहते कैसा लगता?

यह यात्रा मेरे लिए एक नई जानकारियों से भरी रही है. अब मैं एस्कीशेहिर को अलग नज़र से देखती हूं.

जब मैं सड़कों पर चहलक़दमी कर रही होती हूँ या जब मैं ट्रेन की सीटी सुनती हूँ, तो मैं उन आर्मीनियाईयों की आत्माओं को महसूस करती हूँ, जो यहां रहते थे और उन थोड़ी बहुत चीजों को देखती हूँ जो उनके जाने के बाद पीछे छूट गई हैं.

अब मैं जान गई हूँ कि वे कभी यहां थे, यहीं के हुआ करते थे- जैसे कि अनातोलिया के हर हिस्से में.

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