'हम बाहर की तरफ़ नहीं बढ़ पा रहे थे'

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भूकंप के समय मैं घर के रोज़ाना के काम देख रही थी तभी अचानक हल्का-सा झटका लगा.

फिर लगा कि हम एक जगह पर खड़े नहीं हो पा रहे थे. जिस दिशा में हम जाना चाहते थे, हम उस तरफ बढ़ नहीं पा रहे थे.

थोड़ी देर बाद जब ये थमा तो हम अपने घर से नीचे उतर आए. हम काठमांडु में पशुपति के पास गौशाला के इलाके में रहते हैं.

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डरावना अनुभव

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भूकंप के वक्त घर का सामान हिल रहा था और जब हम वापस आए तो देखा कि घर की दीवारों पर दरारें उभर आई हैं.

मेरे घर से थोड़े फ़ासले पर एक घर के गिरने की खबर सुनने को मिली है.

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सब अपने-अपने घरों से बाहर निकलकर नजदीक के चौक के पास इकट्ठा हो गए थे. हर पंद्रह-बीस मिनट बाद झटके महसूस हो रहे थे.

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हम लोग करीब-करीब तीन घंटे तक घर से बाहर रहे. फ़ैमिली और बच्चों को लेकर तीन घंटे तक बाहर रहना बेहद डरावना था.

उस दौरान भी हम लोग मूवमेंट नहीं कर पा रहे थे. भूकंप के समय मोबाइल फ़ोन लाइनों पर असर पड़ा था लेकिन लैंडलाइन फ़ोन चालू थे.

ताकतवर झटके

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बिजली का कनेक्शन काट दिया गया था. हालांकि मोबाइल लाइनें बाद में चालू हो गईं थीं लेकिन बिजली की परेशानी बरकरार है.

सरकारी सूचनाओं के लिए हमने रेडियो चालू रखा है पर बिजली न होने के कारण टेलीविज़न बंद हैं.

मेरे लिए ये चौंकानेवाली घटना थी. मैंने अब तक ज़िंदगी में इस तरह के भूकंप के झटकों को पहले कभी नहीं महसूस किया था.

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ये बहुत डरावना था. भूकंप के बाद के झटके अधिक डरावने थे.

हमें लग रहा था कि इतने ताकतवर झटके दोबारा न आ जाएं.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)

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