ब्रिटेन: क्यों बंटे हुए नज़र आ रहे हैं मतदाता?

डेविड कैमरन, एड मिलिबैंड

भारत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी बहुमत की सरकार के बाद क़रीब ढाई दशक से चली आ रही गठबंधन सरकारों पर फ़िलहाल विराम लग गया है. लेकिन ब्रिटेन में मौजूदा कंज़रवेटिव और लिबरल डेमोक्रैटिक पार्टी की गठबंधन सरकार के बाद एक बार फिर से साझा सरकार बनने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है.

ब्रिटेन में 1922 से लेबर या कंज़र्वेटिव पार्टी की ही सरकार रही है हालांकि भारत की ही तरह यहां भी मुख्य दो पार्टियों को छोड़कर लिबरल डेमोक्रैट, यूनाइटेड किंगडम इंडिपेंडेंस पार्टी, ग्रीन पार्टी, एसएनपी जैसे कई दल चुनाव में क़िस्मत आज़माते रहे हैं.

साल 2010 में 650 सीटों वाली संसद में किसी भी दल को 326 सीटों का बहुमत हासिल नहीं होने की सूरत में कंज़र्वेटिव पार्टी ने डेविड कैमरन के नेतृत्व में लिबरल डेमोक्रैट्स के साथ मिलकर एक साझा सरकार का गठन किया और ये सरकार पांच साल तक चली भी.

अब फिर तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षण यही कह रहे हैं कि 7 मई को होनेवाले चुनाव में किसी भी दल को बहुमत हासिल नहीं होगा और नई सरकार गठबंधन सरकार होगी.

मतदाता का भरोसा

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Image caption ब्रितानी आम चुनाव में टीवी पर होनेवाले डिबेट की अहम भूमिका रहती है.

लेकिन ऐसा क्यों है कि परंपरा के विपरीत मतदाता किसी एक पार्टी में भरोसा नहीं जता पा रहे?

लंदन के स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड अफ़्रीकन स्टडीज़(सोआस) में प्रोफ़ेसर गुरहरपाल सिंह कहते हैं, “लोग इसलिए बंटे हैं क्योंकि मतदाता के सामने कई विकल्प हैं. ब्रिटेन में देशव्यापी प्रभाव वाली ऐसी पार्टी व्यवस्था भी नहीं रह गई है जो मतदाताओं को जोड़ सके. हमें ये भी ध्यान में रखना चाहिए कि पिछले तीस सालों में लेबर और कंज़र्वेटिव पार्टी का जनाधार लगातार घटा है और इसका फ़ायदा क्षेत्रीय और व्यवस्था विरोधी पार्टियों को हुआ है.”

अगर डेविड कैमरन के नेतृत्व वाली मौजूदा टोरी सरकार को छोड़ दें तो पिछले 70 साल में ब्रिटेन के लोगों को गठबंधन सरकार का कोई ख़ास अनुभव नहीं रहा है.

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय साल 1940 में कंज़र्वेट्व पार्टी के विंस्टन चर्चिल ने लेबर समेत कई दलों के साथ मिलकर एक साझा सरकार चलाई थी. हालांकि तब की परिस्थितियां अलग थीं.

इसके अलावा लेबर पार्टी के जेम्स कैलाहन ने 1977 में लिबरल पार्टी के साथ मिलकर एक साझा सरकार बनाई थी जब उपचुनाव के बाद उनकी सरकार अल्पमत में आ गई थी. हालांकि ये गठबंधन सरकार एक साल से थोड़े ही ज़्यादा समय तक चल पाया था. इसके बाद कैलाहन ने थोड़े समय के लिए अल्पमत की सरकार का नेतृत्व किया और फिर चुनाव हुए जिसमें कंज़रवेटिव पार्टी की मार्गरेट थैचर सत्ता में आईं.

गठबंधन की प्रकृति

अगर भारत से तुलना करें तो वहां चली गठबंधन राजनीति और ब्रिटेन की गठबंधन राजनीति में कई बुनियादी फ़र्क हैं, जैसे भारत में राज्यस्तरीय राजनीतिक दलों की केंद्र की गठबंधन सरकारों में अहम भूमिका रही है जबकि ब्रिटेन में ऐसा नहीं है.

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Image caption ब्रितानी प्रधानमंत्री और कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता डेविड कैमरन अपनी पत्नी के साथ चुनाव प्रचार करते हुए.

लंदन के सेंटर फ़ॉर अफ़्रीकन एंड ओरिएंटल स्टडीज़ (सोआस) में डेवलपमेंटल स्टडीज़ विभाग में सीनियर लेक्चरर सुबीर सिन्हा इसकी वजह बताते हैं, “ब्रिटेन में पार्टियों के बीच गठबंधन चुनाव के बाद होता है. यहां चुनाव से पहले गठबंधन नहीं होता. फ़िलहाल लेबर और एसएनपी (स्कॉटिश नेशनल पार्टी) में एक प्रकार का खेल जैसा चल रहा है गठबंधन बनाने को लेकर. दरअसल पार्टियां वोटरों के पास जाकर ये नहीं कहतीं कि वो गठबंधन सरकार बनाएंगी. वो कहती हैं कि उन्हें बहुमत मिलेगा. जबकि भारत में पिछले 20-25 साल में पार्टियां गठबंधन बनाकर ही चुनाव में जाती रही हैं.”

2010 के ब्रितानी आम चुनाव में 650 सदस्यों वाले हाउस ऑफ़ कॉमन्स में कंज़र्वेटिव पार्टी को 306, लेबर को 258 और लिबरल डेमोक्रैटिक पार्टी को 57 सीटें मिली थीं. सात मई को होनेवाले चुनाव से पहले बीबीसी के पोल ट्रैकर के हिसाब से दोनों प्रमुख पार्टियां में 19-20 का ही फ़र्क है और दोनों ही 33-34 फ़ीसदी की रेटिंग हासिल कर पा रही हैं.

छोटे दलों की भूमिका

ऐसे में इस चुनाव में भी छोटे दलों की भूमिका पर सबकी निगाहें हैं. लेकिन छोटे दलों के प्रमुखता हासिल करने की वजह क्या रही है.

प्रोफ़ेसर गुरहरपाल कहते हैं, “नब्बे के दशक में वेल्स, उत्तरी आयरलैंड और स्कॉटलैंड के पक्ष में शक्ति के विकेंद्रीकरण की शुरुआत हुई और समय के साथ ये मज़बूत होती गई. फिर उप राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का उदय हुआ जिसने राजनीतिक परिदृश्य को विभाजित कर दिया. परिणामस्वरूप आज हमारे सामने क्षेत्रीय दल हैं और यूकिप जैसी व्यवस्था विरोधी पार्टी भी है जो इमिग्रेशन का विरोध करती है. लेकिन इसने बहुदलीय व्यवस्था तो बना ही दी है. “

ब्रितानी चुनाव के लिए अगले कुछ दिन निर्णायक हैं और इसी का फ़ायदा उठाने के लिए सभी पार्टियों के नेता जीतोड़ मेहनत कर रहे हैं. यहां तक कि भारतीय मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए मंदिरों और गुरुद्वारों के चक्कर भी लगाए जा रहे हैं.

हालांकि अब तक के अनुमानों से तो त्रिशंकु संसद चुने जाने के ही आसार नज़र आ रहे हैं, लेकिन वोटों की गिनती तक ये महज़ अनुमान ही कहे जा सकते हैं.

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