इस थप्पड़ की गूंज पूरी ज़िंदगी सुनाई देगी..

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थप्पड़ की गूंज भी हो सकती है ये हमें सबसे पहले बताया डॉक्टर डैंग ने 1986 की सुभाष घई की फ़िल्म कर्मा में जब दिलीप कुमार के थप्पड़ का जवाब अनुपम खेऱ ने कुछ यूं दिया:

"डॉक्टर डैंग को आज पहली बार किसी ने थप्पड़ मारा है..फर्स्ट टाइम..इस थप्पड़ की गूंज सुनी तुमने..इस गूंज की गूंज तुम्हें सुनाई देगी...पूरी ज़िंदगी सुनाई देगी."

बचपन में शायद ही कोई हफ़्ता गुज़रता था जब थप्पड़ न पड़ा हो--घर में, स्कूल में, स्कूल से वापस आकर फिर से घर में--सिलसिला चलता ही रहता था और बीच-बीच में नसीहत भी मिल जाती थी--"बेटा ये तुम्हारे भले के लिए ही कर रहे हैं"!

अब क्यों पड़ते थे ये थप्पड़ वो रहने दें!

लेकिन डॉक्टर डैंग को सुनने के बद अफ़सोस इस बात का रहा कि उन हफ़्तेवार थप्पड़ों में मुझे गूंज कभी नहीं सुनाई दी या फिर शायद सुनना नहीं आता था.

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केजरीवाल को थप्पड़

ज़िंदगी फ़ास्ट-फॉरवर्ड हुई, 24/7 मीडिया का ज़माना आया और फिर अचानक से थप्पड़ों की गूंज सुनाई देने लगी. खुशकिस्मत रहा कि ये थप्पड़ दूसरे के गालों पर पड़ रहे थे!

सियासी थप्पड़, रोमांटिक थप्पड़, सड़कछाप थप्पड़, बुलबुल पांडेय का थप्पड़ सबकी गूंज सुनाई देने लगी.

एक टीवी रिपोर्टर को एक नेता ने थप्पड़ मारा, गूंज दूर तक गई (आज वो रिपोर्टर आम आदमी पार्टी के नेता हैं)--केजरीवाल साहब को ऑटोवाले ने थप्पड़ ससीद कर दी, सोशल मीडिया के ज़माने में गूंज पूरे देश में फैली, आज वो दिल्ली के मुख्य मंत्री हैं. शरद पवार हों, उमा भारती हों, मिका हों, राखी सावंत हों थप्पड़ खानेवाले और लगानेवाले सभी उसकी गूंज के कायल रहे हैं.

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माँ का थप्पड़

लेकिन पिछले हफ़्ते अमरीका के बॉल्टीमोर शहर में जहां काले नौजवान पुलिस विरोधी प्रदर्शनों में दंगा कर रहे थे, दुकानों को लूट रहे थे, एक मां ने अपने बेटे को जो थप्पड़ मारा वो सही मायने में "थप्पड़ ऑफ़ दी सेंचुरी" कहलाएगा.

साहबजादे स्कूल से लौटते हुए हुडी पहनकर, चेहरे पर नकाब लगाए पुलिस और दुकानों पर पत्थर बरसा रहे थे, जब उनकी मां की नज़र पड़ गई उनपर.

मां ने आव देखा न ताव, थप्पड़े लगाते हुए घसीटते हुए घर ले गई और यंग ऐंग्री मैन दुम दबाए मां के साथ हो लिए.

लेकिन इस थप्पड़ को सिर्फ़ बॉल्टीमोर ने नहीं, टीवी पर पूरी दुनिया ने देखा.

आखिर अमरीका है भाई, छोटी सी बात भी हो तो पूरी दुनिया देखती है और उसकी गूंज ऐसी कि अभी तक सुनाई दे रही है.

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नस्लवाद

टीवी चैनल मां और बेटे दोनों ही को बार-बार कैमरे पर बुला रहे हैं. कई बार सवाल भी अपनी देसी मीडिया वाली स्टाइल में ही पूछ रहे हैं--जब आपने थप्पड़ मारा तो कैसा लगा, जब आपको थप्पड़ लगा तो कैसा लगा..वगैरह, वगैरह.

सफ़ेद दक्षिणपंक्षी तबके के लिए तो ये यूरेका मोमेंट था यानी उनकी नज़र में एक थप्पड़ ने कालों की हालत बेहतर करने का हल निकाल दिया. ये अमरीकी एक आवाज़ में उस मां को "मॉम आफ़ दी इयर" का खिताब देने के लिए टूट पड़े. आख़िर क्यों?

क्योंकि उनकी मानें तो ख़राबी सफ़ेद लोगों या पुलिस में नहीं है, नस्लवाद नाम की कोई चिड़िया है ही नहीं, सबकी जड़ काला समुदाय खुद है. उनका कहना है कि सारी मांएँ ऐसी हो जाएं तो अमरीका से जुर्म खत्म हो जाएगा, काले नौजवान रास्ते पर आ जाएंगे और पुलिस को सख्ती करनी ही नहीं पड़ेगी.

रिपब्लिकन पार्टी की तरफ़ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों में से एक, टेड क्रुज़, का बयान है कि काले नौजवानों के साथ ये सब बातें इसलिए होती हैं क्योंकि उनके घर में बाप नहीं होते, सिंगल मदर्स यानी मर्द के बगैर घर चलानेवाली औरतें उनपर नज़र नहीं रख पातीं.

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थप्पड़ सही या ग़लत

अब टेड क्रूज़ साहब से कौन कहे कि इन इलाकों में ज़्यादातर मर्द जवानी में कदम रखते ही छोटे-छोटे जुर्म के लिए भी जेल में बंद कर दिए जाते हैं और एक बार अंदर गए तो फिर सिलसिला शुरू हो जाता है. उसी जुर्म के लिए सफ़ेद नौजवान को पुलिस झिड़की देकर या फिर 'जवानी में हम सबने ऐसा किया है' कहकर छोड़ देती है.

सफ़ेद वामपंथी और उदारवादी तबका, जो काले समुदाय को साथ लेकर चलने की बात करता है, सरकार की ज़िम्मेदारी की बात करता है, नस्लवाद की बात करता है वो बंटा हुआ है कि थप्पड़ मारना सही था या नहीं. उनकी दलील है कि बच्चे को इस तरह सबके सामने ज़लील नहीं करना चाहिए था, न जाने उसपर क्या असर पड़ेगा.

अब असर जो भी हो, ये तय है कि इस नौजवान को डॉक्टर डैंग के शब्दों में: "इस थप्पड़ की गूंज पूरी ज़िंदगी सुनाई देगी."

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