दुबई की कामकाजी औरतें और बराबरी का हक़

  • 18 मई 2015
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संयुक्त अरब अमीरात की नई पीढी की महिलाएं काफी हद तक फराह अलशम्सी की तरह दिखती हैं- पढ़ी लिखी और करियर पर ध्यान देने वाली.

लेकिन उन्हें आगे बढ़ने के लिए तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. वेतन से लेकर छुट्टियों तक में उनसे भेदभाव होता है और मातृत्व अवकाश को लेकर भी स्पष्ट नीति नहीं है.

इसके बावजूद अलशम्सी जैसी महिलाओं का मनोबल कम नहीं हुआ है.

31 साल की अलशम्सी के पास दो डिग्रियां हैं और वे सरकारी एजेंसी में वरिष्ठ पद पर काम कर रही हैं. इसके अलावा वे अपनी कम्यूनिकेशन और एडवाइज़री कंपनी भी चलाती हैं.

अलशम्सी कहती हैं, "सभी क्षेत्रों में महिलाएं काम कर रही हैं. सरकार महिलाओं की काफी सहायता कर रही है. परिवार के लोग भी उत्साह बढ़ाते हैं. सरकारी मंत्रालयों से लेकर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में कई महिलाएं काम कर रही हैं."

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पहली नजर में ऐसा जाहिर होता है कि सयुक्त अरब अमीरात में महिलाओं के लिए कामकाजी शर्तें दूसरे मध्य पूर्व के देशों की तुलना में बेहतर हैं. लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है.

महिलाओं की हिस्सेदारी

अलशम्सी जैसी युवतियों को मुफ्त में शिक्षा, मुफ्त में घर और सावर्जनिक नौकरियों में प्राथमिकता जैसी सुविधाएं हासिल हैं. लेकिन संयुक्त अरब अमीरात के कामकाजी लोगों में यूएई के नागरिकों की संख्या केवल 10 फ़ीसदी है.

संयुक्त अरब अमीरात की लेबर फोर्स में दुनिया भर के लोग शामिल हैं. उनमें महिलाएं भी शामिल हैं. क्योंकि यहां की बेहतर अर्थव्यवस्था, सालों भर एक जैसा मौसम और कर मुक्त वातावरण लोगों को आकर्षित करते हैं.

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यहां के समाज में कामकाजी महिलाओं की स्वीकार्यता बढ़ रही है. उन्हें ऊंचे पदों पर नौकरियां मिल रही हैं लेकिन उनकी कार्यक्षमता को अभी भी संदेह की नजरों से देखा जाता है.

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बावजूद इसके अलशम्सी जैसी यूएई की महिलाएं आगे बढ़ रही हैं. सेना, पुलिस, इंजीनियरिंग, मीडिया, मैनेजमेंट इन सब सेक्टर में अपनी जगह बना रही हैं.

संयुक्त अरब अमीरात सरकार में पांच महिला कैबिनेट मंत्री शामिल हैं और कई सरकारी एजेंसियों में महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रही हैं. इनमें 2020 एक्सपो और दुबई मीडिया ऑफिस जैसी जगहें भी शामिल हैं.

महिलाओं को बढ़ाने की मुहिम

इसी साल फरवरी में संयुक्त अरब अमीरात के उपराष्ट्रपति और दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मख़्तूम ने संयुक्त अरब अमीरात के अंदर जेंडर बैलेंस काउंसिल की स्थापना की.

स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ये काउंसिल कामकाजी महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए नई रणनीति बनाने का काम करेगी.

इस काउंसिल की चेयरमैन शेख मोहम्मद की बेटी शेख मानल बिंन मोहम्मद बिन राशिद अल मख़्तूम को बनाया गया है, जो दुबई वीमेंस एस्टेबलिशमेंट की अध्यक्ष भी हैं. इसकी स्थापना 2006 में हुई थी ताकि दुबई की वर्क फोर्स में महिलाओं की संख्या और उनके स्तर पर नजर रखी जा सके.

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हालांकि कामकाजी महिलाओं के लिए करियर ग्रोथ की संभावना अभी भी सीमित है. सर्विस इंडस्ट्री में काम करने वाली महिलाएं, जैसे हाउसमेड, वेट्रेस, लोअर लेवल की ऑफिस स्टॉफ के पास बहुत सीमित अवसर होते हैं. इन्हें थर्ड पार्टी एजेंसियों के अनुबंध पर काम करना होता है.

क्या है मुश्किलें?

यूरोप, भारत और मध्य पूर्व के दूसरे हिस्सों से यहां आकर कारपोरेट दुनिया में काम करने वाली महिलाओं की स्थिति बेहतर है. अगर महिलाएं इंटरनेशनल संस्था में काम कर रही हैं तो उन्हें वेतन भी ज़्यादा मिलता है और प्रमोशन भी मिलते हैं.

हालांकि जब कोई महिला अपने पति के साथ संयुक्त अरब अमीरात पहुंचती हैं तो उसे हाउसवाइफ वीज़ा मिलता है. इस वीज़ा के चलते वे तब तक काम नहीं कर सकतीं, जब तक उन्हें अपने पति से 'नो औब्जेक्शन' प्रमाण पत्र नहीं मिल जाता.

व्यवहारिक तौर पर ये औपचारिकता से कहीं ज्यादा का मामला बन जाता है. पति के साथ आई महिलाओं को जो वीज़ा मिलता है उसके चलते बैंकिंग से लेकर संपत्ति खरीदने तक में उन्हें कई पाबंदियों का सामना करना होता है.

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क्लायड एंड को. के दुबई स्थित दफ्तर में काम करने वाली रोजगार मामलों की वकील सारा खोजा बताती हैं कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो प्राइवेट सेक्टर के नियोक्ताओं को महिला कर्मचारियों के अधिकारों को संरक्षित करने को कहता है.

कम मातृत्व अवकाश

वैसे यूएई में असमान वेतन से लेकर सीमित मातृत्व अवकाश तक की मुश्किलें कायम हैं.

सालेम सादेह की अभी शादी नहीं हुई है और वे लेबनान से 2000 में बैंकिंग और कैपिटल मार्केट में काम करने के लिए दुबई आईं थीं. सालेम बताती हैं कि यहां का कारपोरेट कल्चर काफी हद तक पुरुष प्रधान ही है.

सालेम अब अपनी वेंचर कैपिटल फर्म एक्टिवेम चलाती हैं. वे कहती हैं, "दुनिया भर में बैंकिंग की दुनिया में उतनी महिलाएं नहीं काम करतीं, जितने पुरुष काम करते हैं. मध्य पूर्व में ये औसत और भी कम है. महिलाओं को ख़ुद को साबित करने के लिए दोगुना काम करना होता है."

42 साल की सादेह के मुताबिक संयुक्त अरब अमीरात में सीनियर लेवल पर कम ही महिलाएं काम कर रही हैं.

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अबू धाबी के अखब़ार द नेशनल में काम करने वाली 25 साल की यूएई की पत्रकार आयशा अलाजरुई कहती हैं, "हालात बदल रहे हैं, महिलाएं अपनी स्वतंत्रता को अहमियत दे रही हैं. उनका आत्म विश्वास बढ़ रहा है. शिक्षा और करियर के लिए वे देरी से शादियां कर रही हैं."

रोजगार के ढेरों अवसर

काम करने वाली महिलाओं को सऊदी अरब में केवल 45 दिनों का मातृत्व अवकाश मिलता है. कुछ ही प्राइवेट फर्म हैं जो बिना वेतन की छुट्टियों को मंजूरी देते हैं.

सारा खोजा बताती हैं, "पार्ट टाइम काम भी नहीं के बराबर उपलब्ध है."

कंसल्टेंट मैथ्यू ग्रिबल मिडल ईस्ट और अफ्रीका के पेज ग्रुप के एमडी हैं. उनका मानना है कि संयुक्त अरब अमीरात मे पार्ट टाइम काम के क्षेत्र को अभी विस्तार दिया जा सकता है.

ग्रिबल का पेज ग्रुप महिलाओं को 12 महीने का मातृत्व अवकाश देता है.

यहां काम कर रही ग्लोबल मीडिया एजेंसी मीडिया कॉम महिलाओं को पहले दस सप्ताह के दौरान पूरा वेतन देती है, अगले छह सप्ताह के लिए आधा वेतन देती है और आठ सप्ताह की छुट्टियों का विकल्प भी मौजूद है, जिसमें वेतन नहीं मिलता. इसके अलावा कंपनी ने 7 दिनों का पितृत्व अवकाश भी देने की शुरुआत की है.

मीडिया कॉम की एचआर मैनेजर ब्रे हिल बताती हैं, "महिलाओं और पुरुषों की अपनी अलग काबिलियत होती है और संस्था को दोनों की जरूरत होती है."

संयुक्त अरब अमीरात के सात अमीरात में से एक शारजाह ने मातृत्व अवकाश बढ़ा कर 60 दिन करने का फैसला लिया है.

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वहीं दुबई इंटरनेशनल फाइनेसियल सेंटर ने महिलाओं को 65 दिन का मातृत्व अवकाश देना शुरू किया है. इसमें 33 दिनों का पूरा वेतन मिलता है जबकि 32 दिनों का आधा वेतन.

सालेम सादेह बताती हैं, "दुबई शानदार जगह है और यहां रोजगार के ढेरों अवसर मौजूद हैं. लेकिन इसके लिए आपको काफ़ी ज़्यादा काम करना होगा."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.

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