कराची हमला : 'भारत से लेकर आईएस पर आरोप'

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कराची में हुए बस हमले को लेकर पाकिस्तानी मीडिया दो धड़ों में बंटा हुई दिख रहा है. 13 मई को हुए इस हमले में शिया समुदाय के 43 लोग मारे गए थे.

पाकिस्तान के चरमपंथी संगठन तालिबान के सहायक समूह जुनदुल्लाह ने हमले की ज़िम्मेदारी ली थी.

वहीं कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हमले की जगह से कुछ पर्चे मिले थे, जिसमें चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने हमलों की ज़िम्मेदारी ली थी.

पाकिस्तानी अख़बार 'डॉन' ने 14 मई को एक ख़बर प्रकाशित की थी. इसके अनुसार आईएस ने अपने ट्विटर एकाउंट पर लिखा था, ''हमले में 43 'विश्वासघाती' लोग मारे गए और 30 घायल हुए हैं.''

वहीं पाकिस्तानी विदेश सचिव एजाज़ चौधरी ने एक प्रेसवार्ता कर हमले में आईएस का हाथ होने से इनकार कर दिया था.

उन्होंने कहा था कि केवल कुछ पर्चों की वजह से आईएस को हमलों का ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता.

साथ ही उन्होंने भारतीय गुप्तचर एजेंसी रॉ पर पाकिस्तान में चरमपंथी संगठनों की मदद करने का आरोप लगाया.

ज़िम्मेदार कौन?

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अंग्रेज़ी अख़बार डॉन लिखता है, ''पाकिस्तानी सरकार या तो देश में मौजूद चरमपंथ के मुद्दे को स्वीकार नहीं करना चाहती या फिर वो उसके असल रूप से डरती है.''

अख़बार ने आगे लिखा, ''केवल हथियारबंद चरमपंथियों को मारने से कुछ देर के लिए ही सफलता मिलेगी. लेकिन चरमपंथी जिस तरह से जिहादियों की नई पीढ़ी तैयार कर रहे हैं वो ज़्यादा ख़तरनाक है.''

वहीं एक अन्य अख़बार 'डेली टाइम्स' लिखता है, ''देश में मौजूद आईएस के ख़तरे को सरकार को समझना होगा. आईएस दूसरे चरमपंथी संगठनों की भी मदद कर रहा है.''

वहीं 'द न्यूज़' ने लिखा, ''लोगों को सुरक्षा मुहैया करा पाने में नाकाम हमारी सरकार ने एक बार फिर रॉ नाम का ट्रम्प कार्ड चला है. क्या हमें 'विदेशी हाथों' वाली थ्योरी पर पहुंचने से पहले थोड़ा आत्ममंथन नहीं करना चाहिए.''

विदेशी साज़िश

उर्दू अख़बार जंग लिखता है, ''कराची, सिंध समेत देश के अन्य हिस्सों में हो रहे हमलों में विदेशी ताकत ख़ासकर भारत का हाथ है. वो पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं.''

वहीं 'औसफ' ने लिखा है, ''इस हमले में प्रधानमंत्री को भारत के शामिल होने के ठोस सबूत देने चाहिए. साथ ही उन्हें यह सबूत संयुक्त राष्ट्र, अमरीका और ब्रिटेन को भी देने चाहिए.''

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