भारत कब तक तालिबान को बढ़ता देखेगा?

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हमेशा की तरह अफ़ग़ानिस्तान के लिए 2015 का बसंत काफ़ी गर्म था. तालिबान ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि वो अशरफ़ ग़नी सरकार को घुटने टिकवा कर ही दम लेंगे.

ये अफ़ग़ान नेशनल आर्मी (एएनए) की भी परीक्षा थी, जो पहली अमरीकी गठबंधन वाली फ़ौज के बिना तालिबान का सामना करने जा रही थी.

यदि सच कहा जाए तो चीजें अफ़गान सरकार के मुताबिक़ नहीं रहीं.

हालांकि अफ़ग़ान आर्मी को कोई बहुत बड़ा झटका नहीं लगा है पर तालिबान के लगातार हमलों ने अफ़ग़ान सरकार के बचे रहने के भरोसे को बुरी तरह हिला दिया है.

तालिबान ने केवल काबुल के बीचो-बीच मनमर्ज़ी से हमला किए. साथ ही युद्धक्षेत्र को देश के उत्तर की ओर में फैला दिया. उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान तालिबान से सुरक्षित माना जाता रहा है.

भारत की परेशानी

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अफ़ग़ानिस्तान की यह हालत भारत के लिए चिंता और घबराहट दोनों का सबब है.

भारत ने राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की नीतियों पर संतोष कर लिया था. यहाँ सोचा गया कि हामिद करज़ई की तरह ही देर सबेर वो अपनी ग़लती का एहसास करेंगे और मदद के लिए भारत का रुख करेंगे.

यहां तक कि अफ़ग़ानिस्तान जिस सैन्य मदद की लंबे समय से राह देख रहा था भारत उसे देने के लिए तैयार नज़र आता है.

लेकिन लगता है कि राष्ट्रपति ग़नी 'पाकिस्तान के खेल' में फंस गए हैं और ख़ुद को निकाल नहीं पा रहे हैं.

वहीं ग़नी के उठाए कदमों के कारण भारत भी अपनी ‘रणनीतिक ठहराव’ की हालत से आगे नहीं बढ़ा है.

भारत को मंहगा ना पड़े?

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अभी तक नई दिल्ली को यह समझ जाना चाहिए कि अफ़ग़ानिस्तान को देखते हुए उसे ‘प्लान बी’ पर काम शुरू कर देना चाहिए था.

इसका मतलब है अफ़ग़ानिस्तान के उन समूहों को समर्थन देना जो ना तो पाकिस्तानी दखल और ना ही तालिबान के दबदबे को स्वीकार करना चाहते हैं.

लेकिन अन्य देशों की तरह भारत भी अभी तक ग़नी से आस छोड़ने को तैयार नहीं दिखाई देता.

लगभग तयशुदा लड़ाई में तालिबान विरोधी फ़ोर्स को तैयार करने में अगुआई करने की बजाय भारत ‘इंतज़ार करो और देखो’ के अंदाज़ में बना हुआ है.

इस बीच ने केवल ग़नी के पैरों तले ज़मीन खिसक रही है बल्कि बाकी के तालिबान विरोधी भी तेज़ी से मौके खोते जा रहे हैं.

जब तक भारत तालिबान के ख़िलाफ़ उठ खड़ी होने वाली ताक़तों के पक्ष में समर्थन जुटाने की शुरुआत करेगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.

पाकिस्तान भारी पड़ रहा

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जैसे-जैसे तालिबान की बर्बरता बढ़ रही है और वो उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के ग़ैर पश्तो इलाक़ों में लड़ाई फैलाने में कामयाब हो रहे हैं, राष्ट्रपति ग़नी का पाकिस्तान का तुष्टिकरण भी बढ़ रहा है.

दूसरे शब्दों में ग़नी पाकिस्तान के सामने जितना झुक रहे हैं, तालिबान उतना ही अफ़ग़ानिस्तान के अंदर हिंसा को बढ़ा रहा है.

ग़नी ने हाल ही में अफ़ग़ान खुफ़िया एजेंसियों से पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंटो पर हमले बंद कर पाकिस्तान के साथ समझौता करने को कहा है.

यह भी उतना ही सही है कि पाकिस्तानी सरकार और फ़ौज जितना कह रहे हैं कि ‘अफ़ग़ानिस्तान का दुश्मन पाकिस्तान का दुश्मन है’, उतना ही अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सक्रिय होता जा रहा है.

ग़नी का दांव फ़ेल

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ज़मीनी हालात बताते हैं कि पाकिस्तान पर ग़नी का सबसे बड़ा दांव फ़ेल हो रहा है और अफ़ग़ानिस्तान का बिखराव शुरू हो गया है.

ऐसा लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान का भविष्य गृह युद्ध या तालिबानी कब्ज़े के बीच झूल रहा है.

ग़नी का पाकिस्तान पर पूरा दांव लगाना समझ में आता है. तालिबान के पीछे पाकिस्तान को माना जाता है जो उसे पनाहगाह देता है, इसलिए अगर पाकिस्तान सध जाए तो बहुत सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी.

ऐसा लगता है कि यह नीति ने ही उन्हें अमरीकियों सुझाया है. लेकिन पाकिस्तान की हर मांग के आगे झुकने के बावजूद चीजें बद से बदतर हो जा रही हैं.

इसका एक कारण तो आंतरिक है. उनके चुनाव की तरह ही, ग़नी का घरेलू राजनीतिक समर्थन भी छल कपट भरा है.

पाकिस्तान से क्या मिला?

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इससे भी बुरी बात ये है कि पाकिस्तान की ओर झुकाव ने ऐसे बहुत सारे लोगों को उनसे दूर कर दिया है जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में ‘बड़े पैमाने पर धांधली’ के बावजूद उनका साथ दिया था.

राजनीति के अलावा देश की अर्थव्यवस्था भी ख़स्ताहाल है. बिना बाहरी मदद के अफ़ग़ानिस्तान बहुत दिन तक नहीं चल सकता और उसका आर्थिक स्रोत धीरे धीरे सूखता जा रहा है.

ग़नी घरेलू संसाधनों पर देश नहीं चला सकते. इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अनंतकाल तक उन्हें मदद देना जारी रखेगा. अफ़ग़ानिस्तान के पास ऐसा कुछ नहीं है जिसे वो मदद के बदले दे सके.

पाकिस्तान से अभी तक उसे खोखले वादों के सिवाय कुछ नहीं मिला है.

दोहरा खेल

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पाकिस्तान के लिए हालात तो ग़नी के हालात से भी जटिल हैं.

तालिबान के विकल्प को छोड़ देने का पाकिस्तान के लिए कोई मतलब नहीं बनता. पिछले 14 सालों से उसने तालिबान का समर्थन किया है और ऐसे समय जब वो जीत के क़रीब हों उनका साथ छोड़ने का कोई मतलब नहीं है.

पाकिस्तान दोहरा खेल खेलता हुआ दिखता है: एक तरफ़ तो वो ग़नी की मनपसंद बातें करता है और उसके बदले जो चाह रहा है ले रहा है.

दूसरी तरफ़, वो तालिबान को अपनी मनमर्जी करने का इशारा भी कर रहा है.

तालिबान के पुनर्वास की कोशिश

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राजनयिक स्तर पर पाकिस्तानी तालिबान के पुनर्वास की कोशिश कर रहे हैं और इस क्षेत्र में मौजूद चीन, ईरान, यूएई, क़तर, सउदी अरब और मध्य एशियाई देशों की आपत्तियों को भी कम कर रहे हैं.

फ़ौजी स्तर पर लड़ाई के मैदान को उत्तर तक खींचने का उद्देश्य उन संभावित रुकावटों को ख़त्म करना है, जो तालिबान के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल सकते हैं, जैसे नार्दन अलायंस.

उधर तालिबान की अपनी ही रणनीति है. वो पाकिस्तान की दोहरी नीति के प्रति सावधान हैं.

यह उनकी सैन्य गतिविधियों के लिए भी मुफ़ीद है, क्योंकि बातचीत की स्थिति में यह उनका पक्ष मजबूत करता है और साथ ही पाकिस्तान और दुनिया से भिड़ने का मौका भी देता है. इससे पाकिस्तान द्वारा किसी भी संभावित दोहरे खेल से बचाव भी होता है.

इसके अलावा इस्लामिक स्टेट से बचने के लिए तालिबान को अपना आधार बनाए रखने के लिए भी फौजी रूप से सक्रिय रहना भी ज़रूरी है.

अब्दुल्ला की भी चमक फ़ीकी

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जैसे हालात हैं, ग़नी का जुआ फ़ेल हो चुका है और अधिकांश अफ़ग़ानियों की नज़र में वो अब भार बन चुके हैं या शाह शुजा से भी गए बीते हो गए हैं.

उनके साथ साथ, अफ़ग़ानिस्तान के चीफ़ एक्ज़िक्यूटिव डॉ. अब्दुल्ला अब्दुल्ला की लोकप्रियता भी कम हुई है, क्योंकि ग़नी और अमरीकियों की हां में हां मिलाने से उनके प्रशंसक नाराज़ हैं.

तालिबान विरोधी ताक़तें, खासकर नार्दन अलायंस, अपना अस्तित्व बचाए रखने की ख़ातिर लड़ाई के लिए कमर कस रहे हैं.

अंत में यही कहा जा सकता है कि वो तालिबान को रोकने में सफल रहते हैं या नहीं, अफ़ग़ानिस्तान हिंसा के और दौर में दाख़िल होने जा रहा है.

हिंसा में आई हालिया बढ़ोत्तरी इसकी बस शुरुआत भर है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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