क्या चिम्पैंज़ियों के भी हैं मानवाधिकार?

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अमरीका में इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या जानवरों को भी इंसानों जैसे अधिकार दिए जाने चाहिए?

न्यूयॉर्क की एक अदालत ने एक विश्वविद्यालय की लैब में बंद दो चिम्पैंज़ियों के मामले में दलीलें सुनी.

चिम्पैंज़ी लियो और हरक्युलिस की ओर से मुक़दमा लड़ रहे वकील चाहते हैं कि दोनों को किसी अभ्यारण्य में भेजा जाए.

स्टोनी ब्रुक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता शरीर के हिलने डुलने पर शोध के लिए इन चिम्पैंज़ियों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

एक अहम फ़ैसले में जज बारबरा जेफ़ी ने चिम्पैंज़ी के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) के अधिकार का सुझाव दिया था.

इसके तहत लापता हुए व्यक्ति को अदालत के सामने लाने की अनिवार्यता होती है.

इंसानों से अधिकार

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लेकिन शुरुआत में इस शब्द का इस्तेमाल करने के बाद, जज ने इन्हें निकाल दिया और जानवरों को एक क़ानूनी व्यक्ति का दर्जा देने से इनकार कर दिया.

असल में पिछले साल न्यूयॉर्क में ही एक फ़ैसले में जज ने चिम्पैंज़ियों को इंसानों जैसे अधिकार देने से मना कर दिया था.

जानवरों को इंसानों जैसे अधिकार देने पर विचार होता रहा है, लेकिन यह कोई नई बात नहीं है.

सदियों से ही जानवर मुक़दमेबाज़ी में घसीटे जाते रहे हैं और इनमें कई को दोषी पाए जाने पर बाक़ायदा मार डालने की सज़ा हुई.

जानवरों के अधिकारों से असहमत लोगों का तर्क़ है कि जानवरों में नैतिकता या अपने कर्तव्य का ज्ञान नहीं होता है.

लेकिन जानवरों के व्यवहार को समझने के लिए कई अजीब प्रयोग भी हुए हैं.

माफी मांगने वाला चिम्पैंज़ी

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न्यूयॉर्क के एक परिवार में निम नामक चिम्पैंज़ी था और परिवार को उम्मीद थी कि वो संकेत भाषा को समझने में क़ामयाब हो जाएगा.

जब छोटे से निम ने परिवार में रहना शुरू किया, उस समय जेनी ली की उम्र 13 साल थी. निम जेनी का ‘भाई’ जैसा बन गया.

जेनी को लगता है कि हालांकि, निम को लोगों को काटने से रोका नहीं जा सकता लेकिन उसमें इंसानों जैसे कुछ व्यवहार दिखाई दिए.

जेनी ने न्यूज़ ऑवर एक्स्ट्रा को बताया, “उसे पता है कि कब माफ़ी मांगनी चाहिए और इसे मांगना कब सही रहेगा. वो मेरे गाल पर आए आंसू को बहुत आहिस्ता से चूमता है.”

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लेकिन जानवरों के हक़ को लेकर शंकालु लोगों को यह तर्क़ पर्याप्त नहीं लगता है.

अग्रणी ब्रितानी न्यूरोबायोलॉजिस्ट प्रोफ़ेसर सर कोलिन ब्लैकमोर के अनुसार, “हमें ख़ुद को बाक़ी सजीव दुनिया से एक अलग श्रेणी में रखना होगा- यानी मानवता की श्रेणी में.”

मिशिगन विश्वविद्यालय से जुड़े प्रोफ़ेसर कार्ल कोहेन के मुताबिक़, “जानवर अपराध नहीं करते, अपने नैतिक नज़रिए के कारण उन पर हमला नहीं होता. जहां तक अधिकारों की बात है, वो इंसानों की नैतिकता से जुड़ा है.”

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