ईश्वर मर्द है या औरत ?

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चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का एक समूह अपनी दैनिक प्रार्थना के दौरान ईश्वर को 'ही' (पुरुषवाचक) के साथ ही 'शी' (स्त्रीवाचक) के रूप में भी संबोधित करने की मांग कर रहा है.

ईश्वर के पुरुष या स्त्री होने का सवाल ईसाई चर्च के इतिहास जितना ही पुराना है. ईसाई धर्म में ईश्वर के लिंग को लेकर हमेशा ही थोड़ी समस्या रही है.

वो कहते हैं ईश्वर का कोई लिंग नहीं होता, लेकिन उसे अक्सर 'पुरुष' रूप में ही संबोधित किया जाता है.

ईश्वर के बारे में बात करने के लिए हमें उसे कुछ तो पुकारना होगा. बगैर किसी सर्वनाम के उसके बारे में बात करना काफ़ी मुश्किल भरा काम है.

ईश्वर क्या है?

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ईश्वर के बारे में गुरुत्वाकर्षण या मुद्रास्फ़ीति की तरह अवैयक्तिक रूप से बात करना अभद्रता जैसा लगता है. यानी ईश्वर को स्त्रीलिंग या पुलिंग के रूप में संबोधित करना होगा.

कैथोलिक चर्च कहता है, "ईश्वर न तो पुरुष है, न ही स्त्री. वह ईश्वर है."

कुछ दूसरे ईसाई समुदाय इससे भी आगे बढ़ गए. तीसरी सदी में एक सीरियाई ईसाई समूह होली स्पिरिट की स्त्री के रूप में प्रार्थना करता था.

चर्च की स्थापना के शुरुआती सालों में कुछ ईसाई समूह मानते थे कि ईश्वर अज्ञेय है और वह ख़ुद को स्त्री और पुरुष समेत कई रूपों में अभिव्यक्त करता है.

14वीं सदी में जूलियन ऑफ़ नार्विच ने ईश्वरीय प्रेम की तुलना मां के प्रेम से की.

जूलियन ने कहा था, "जिस तरह ईश्वर हमारे पिता हैं, उसी तरह वह हमारी माता भी हैं." जूलियन 'हमारी बेशकीमती मां ईसा' के बारे में बात करती थीं.

'ईसा मेरी माँ'

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जूलियन ईसाई धर्म के द ट्रिनिटी (फ़ादर, सन और द होली स्पिरिट) को इस तरह पेश करती थीं, "हमारे पिता इच्छा करते हैं, हमारी माता उस पर अमल करती हैं और हमारे प्रिय प्रभु द होली घोस्ट उसकी पुष्टि करते हैं."

11वीं सदी के आर्कबिशप ऑफ़ कैंटेबरी सेंट एंसलेम "ईसा मेरी मां" से प्रार्थना करते थे. वह ईश्वर को 'द ग्रेट मदर' कहते थे.

ईश्वर को लेकर यह रवैया क़रीब 50 साल पहले तक छिटपुट ही रहा था. 20वीं सदी के उत्तरार्ध में नारीवादी धर्मशास्त्रियों ने ये सवाल उठाना शुरू किया कि चर्च की भाषा से बेवजह महिलाओं को बाहर किया जाता रहा है.

मैरी डैली ने 1973 में लिखा, "अगर ईश्वर मर्द है तो मर्द ही ईश्वर है."

1980 के दशक में बाइबिल के अनुवाद में भाषा में अंतर्निहित लैंगिक पूर्वाग्रहों का ख़्याल रखा जाने लगा.

पुरुष की जगह मनुष्य

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किंग जेम्स बाइबिल के 1989 के संस्करण में पुराने संस्करण के मैन (पुरुष) की जगह ह्यूमन (मनुष्य) शब्द का प्रयोग हुआ.

बाइबिल के ज़्यादातर अनुवादों में ईश्वर के लिए पुल्लिंग का प्रयोग किया जाता है, लेकिन इसके अपवाद भी हैं.

2003 में न्यू टेस्टामेंट के जॉन हेंसन और वन कम्यूनिटी फॉर क्रिश्चियन एक्सप्लोरेशन के अनुवाद में ईश्वर को 'हमारा पिता' की जगह 'हमारा अभिभावक' कहा गया है.

इसमें होली स्पिरिट को स्त्रीलिंग और ईसा मसीह को पुल्लिंग के रूप में संबोधित किया गया है लेकिन ईश्वर के लिए किसी तरह के सर्वनाम के प्रयोग से बचा गया है.

चर्च की पूजा-प्रार्थना की भाषा की बात की जाए तो ब्रिटेन के बाक़ी संगठन चर्च ऑफ़ इंग्लैंड से ज़्यादा समावेशी हो चुके हैं.

मेथॉडिस्ट चर्च ने 1999 में नई सर्विस बुक प्रस्तुत की जिसमें ईश्वर को स्त्री और पुरुष दोनों रूप में संबोधित किया जाता है.

समावेशी भाषा

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दी यूनाइटेड रिफ़ॉर्म्ड चर्च 1984 में ही समावेशी भाषा के प्रयोग पर सहमत हो गया था.

पिछले साल इसकी आम सभा में इससे जुड़े सभी चर्चों में समावेशी और व्यापक भाषा और प्रतीकों के प्रयोग की अनुशंसा की गई.

बहुदेववादी धर्मों में पुरुष और स्त्री दोनों तरह के देवी-देवताओं की मौजूदगी के कारण इस तरह के सवाल से नहीं जूझना पड़ता. लेकिन यहूदी धर्म पर इसका थोड़ा प्रभाव पड़ा है.

1975 में अमरीका में नाओमी जैनोविट्ज़ और मार्ग्रेट वेनिग ने प्रार्थना की एक नई पुस्तक प्रस्तुत की जिसमें ईश्वर के लिए स्त्रीलिंग सर्वनाम और छवि का प्रयोग किया गया.

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1996 में रिफॉर्म जुडाइज़्म के हाई होली डे प्रेयर बुक में ईश्वर को 'राजा' की जगह 'संप्रभु' और 'पिता' की जगह 'अभिभावक' कहा गया.

इस्लाम में अभी तक इस तरह की कोई ख़ास मुहिम नहीं देखने को मिली है. इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि इसमें पुनर्व्याख्या की बहुत गुंजाइश नहीं है.

लेकिन ईसाई और यहूदी एक बड़े बदलाव की प्रक्रिया की गुजर रहे हैं.

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