तेरी बकरी मेरी झाड़ी के पत्ते क्यों खा गई?

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साहब, ये दोनों बिल्कुल येड़े हो गए हैं. ऐसे तो मेंटल अस्पताल में एक साथ रहने वाले पागल भी नहीं करते जैसे ये दोनों एक-दूसरे से कर रहे हैं.

साहब, मेरी बेटी के दिल में सुराख़ था. दो साल पहले मैं उसे इलाज के लिए वहाँ ले गया. 15 दिन रहना पड़ा.

क्या डॉक्टर, क्या मरीज़, क्या मरीज़ों को देखने वाले, सबको जब पता चलता था कि मैं कहाँ से आया हूँ तो मेरी बेटी के लिए दुआ करते थे और मुझे ज़बरदस्ती खाना और फल भी खिलाते थे.

और साहब जब वहां के कलाकार, शायर, लेखक और अफ़सर लोग जब हमारे यहाँ आते हैं तो सब वापस जाकर बोलते हैं कि हमने तो ऐसा मुल्क और ऐसे लोग नहीं देखे. हमें तो कुछ और बताया गया था मगर ये तो हम जैसे ही मोहब्बत करने वाले लोग हैं, मानो जैसे अपने ही घर में हम हों.

यहाँ वहाँ का फर्क

साहब आपको क्या बताऊँ, मेरी बेटी सिर्फ़ वही फ़िल्में देखती है जो वहाँ बनती हैं. यहाँ जितने भी एफ़एम रेडियो स्टेशन हैं उन्हीं के गाने चलाते हैं.

और उधर जो मेरी ख़ाला रहती हैं वो हमेशा फ़ोन पर यही बताती हैं कि हम तो बस तुम्हारे टीवी ड्रामे देखते हैं, तुम्हारे यहाँ की ग़ज़लें और कव्वालियाँ सुनते हैं.

जब सब ठीक है तो पंगा कौन कर रहा है? दोनों तरफ़ का मीडिया केवल आग ही क्यों देखता है? दोनों तरफ़ के सियासतदाँ मुस्कराते हुए हाथ मिलाकर पहले फ़ोटो क्यों खिंचवाते हैं और वापस जाकर एक दूसरे को गालियाँ क्यों देते हैं?

इतनी ही नफ़रत है तो फिर प्यार-मोहब्बत, अमन-शांति की बकवास न करें...और इतनी ही मोहब्बत है तो फिर एक दूसरे की लगाई-बुझाई न करें...

साहब, बाक़ी दुनिया जैसे रह रही है वैसे हम क्यों नहीं रह सकते. और अगर नहीं रह सकते तो एक दफ़ा बैठकर तय क्यों नहीं कर लेते कि एक दूसरे ख़त्म करना है.

अजीब लोग हैं साहब, ज़िंदा भी रहना चाहते और एक दूसरे को मारना भी चाहते हैं.

दो घर एक दीवार

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वैसे आपने कभी ज़िंदगी में सुना है कि दो घर जिनकी दीवारें मिली हुई हैं, उनमें रहने वाले सुबह एक-दूसरे को गालियाँ दें, दोपहर को एक दूसरे को लतीफ़े सुनाएँ और गले मिलें, और रात को फिर एक दूसरे की सात पुश्तों को गालियाँ देकर सो जाएँ.

और आँख खुलते ही इसपर झगड़ने लगें कि तेरी बकरी मेरी झाड़ी की तीन पत्ते क्यों खा गई?

और इसके झगड़े के थोड़ी देर बाद बच्चा होने की ख़ुशी में एक घर से दूसरे घर मिठाई जाए और उसके आधे ही घंटे बाद ही वो इस बात पर फिर गुत्थमगुत्था हो जाएँ कि तुम्हारा छोरा हमारी छोरी को दूसरी बार देखकर मुस्कराया क्यों?

साहब मुझे तो लगता है कि दोनों तरफ़ के पागलखानों को भी पागल ही चला रहे हैं. जिन्हें अंदर होना चाहिए वो खुले घूम रहे हैं और जिन्हें आज़ाद घूमना चाहिए वो पागलखानों में बंद हैं, ऐसा कब तक चलेगा साहब?

जान के अनजान

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मैंने अब्दुल्ला पानवाले से कहा मुझे तुम्हारी इतनी लंबी तकरीर सुनकर अब तक नहीं समझ न आया कि तुम किसकी बात कर रहे हो.

अब्दुल्ला ने मुझे हैरत भरी नज़रों से देखते हुए कहा, मैं तो समझ रहा था कि आप सब समझ रहे हो, वाकई साहब आपको पता नहीं चला कि मैं इंडिया और पाकिस्तान की बात कर रहा हूँ!

बुरा न मानना साहब मुझे तो आप भी इन दोनों की तरह ही लगते हो जो सब कुछ समझते हुए भी ऐसे जाहिर करते हैं जैसे कुछ नहीं समझ रहे हैं.

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