पाकः साल भर में 2763 चरमपंथियों का सफाया

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पाकिस्तान के क़बायली इलाक़े उत्तरी वज़ीरिस्तान में पिछले एक साल से जारी ऑपरेशन जर्ब-ए-अज़्ब की वजह से देश में आम तौर पर बड़े-बड़े चरमपंथी हमलों में कमी तो नज़र आई है लेकिन इलाक़े को अभी भी पूरी तरह से चरमपंथी संगठनों से खाली नहीं करवाया जा सका है.

एक साल पहले तक तालिबान के 'गढ़' समझे जाने वाले उत्तरी वज़ीरिस्तान में सरकारी कार्रवाई की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था, इलाक़े के अधिकांश क्षेत्रों में घरेलू और विदेशी चरमपंथी काबिज़ थे जिन्होंने स्थानीय लोगों को भी एक तरह से बंधक बनाया हुआ था.

शुरू में यह ऑपरेशन तेज़ी से जारी रहा लेकिन ज्यों-ज्यों इसका दायरा बढ़ता गया चरमपंथी गतिविधियों में भी कमी आती गई.

पिछले साल अक्टूबर में सरकार ने दावा किया था कि वज़ीरिस्तान के 80 प्रतिशत क्षेत्र में सरकार का नियंत्रण स्थापित हो चुका है.

लेकिन पिछले सात महीनों में अभी भी बीस प्रतिशत क्षेत्र पर नियंत्रण हासिल नहीं किया जा सका है क्योंकि पाक-अफ़गान सीमा क्षेत्रों दत्ता खैल और शवाल में सुरक्षा बलों की ओर से बदस्तूर गतिविधियों का सिलसिला जारी है.

सफलता

ऑपरेशन में सेना ने किस हद तक सफलता पाई है, इस बारे में लोगों की राय अलग-अलग नज़र आती है.

रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर मोहम्मद साद का कहना है कि एक साल पहले तक देश में अराजकता का माहौल था, हर तरफ बड़े हमले हो रहे थे, कराची एयरपोर्ट पर बड़ा हमला किया गया हालांकि अब इस ऑपरेशन के कारण स्थिति अब कुछ हद तक बेहतर हुई हैं.

उनका कहना है, "हम इसे पूरी तरह से सफल तो बिल्कुल नहीं कह सकते लेकिन वक्ती तौर पर चरमपंथ की घटनाओं में कमी आई है. जो लोग देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं उनके पास अब भी यह क्षमता है कि वे बड़ी-बड़ी घटनाओं को अंजाम दे सकें जैसे पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमला और कराची में शिया मस्जिदों पर हमलें इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है."

उनके अनुसार हाल ही में हुए हमले चरमपंथियों की ओर से एक संदेश भी है कि वे अभी भी किसी किसी भी इलाके में दहशतगर्दी फैलाने की क्षमता रखते हैं.

मोहम्मद साद ने कहा कि इस ऑपरेशन की सफलता इस बात पर निर्भर है कि जल्दी से जल्दी ऑपरेशन को पूरा किया जाए और नागरिक प्रशासन को आधारभूत ढांचा खड़ा करने के लिए इलाक़ा सौंप दिया जाए ताकि पुनर्वास की योजनाओं की शुरुआत की जा सकें.

पुनर्वास का सवाल

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इस ऑपरेशन की शुरुआत से ही मीडिया को दूर रखा गया है.

सरकार और सेना की ओर से सभी जानकारियों को नियंत्रण में रखा गया जिससे यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि वहाँ कितनी हत्याएं हुई, किस पक्ष को अधिक नुकसान उठाना पड़ा और चरमपंथी संगठन कहाँ गए?

चरमपंथ पर शोध करने वाले वरिष्ठ विश्लेषक और लेखक डॉक्टर खादिम हुसैन का कहना है, "आपरेशन इस हद तक तो सफल नज़र आ रहा है कि तालिबान के चरमपंथी बिखर गए हैं और लगता है कि उनके सूचना नियंत्रण प्रणाली को भी नुकसान पहुंचा है."

हालांकि उन्होंने कहा कि अभी तक बेघर अपने घरों को वापस नहीं जा सके हैं और वहाँ आपरेशन जारी है इसलिए इसे पूरी तरह से सफल ऑपरेशन नहीं कह सकते हैं.

आपरेशन के परिणामस्वरूप दस लाख से अधिक लोग बेघर हो चुके हैं जो शरणार्थी शिविरों या किराए के मकान में रह रहे हैं.

सरकार ने हाल ही में पीड़ितों की वापसी की प्रक्रिया शुरू की है जिसके तहत बेघर लोगों को एक साल के अंदर घरों को वापस भेजा जाएगा.

अभी तक मिली जानकारी के अनुसार अधिकतर उन क्षेत्रों में लोगों को वापस भेजा गया है जहां नियमित तौर पर ऑपरेशन के तहत कार्रवाइयां नहीं की गई थी.

इस फ़ैसले का विरोध किया जा रहा है. कबाइलियों की मांग है कि पहले मिरान शाह और मीर अली जैसे इलाक़ों के पीड़ितों को वापस भेजा जाए जो पहले बेघर हुए है और जिनका नुकसान भी अधिक हुआ है.

उपलब्धियां

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उधर दूसरी ओर ऑपरेशन के एक साल पूरा होने पर पाकिस्तानी सेना की ओर से जारी किए गए आंकड़ों में कहा गया है कि आपरेशन के दौरान अब तक विभिन्न गतिविधियों में 2763 चरमपंथियों को मारा गया है.

इस ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों के 347 अधिकारी और जवान भी मारे गए हैं.

सेना के जनसंपर्क विभाग के महानिदेशक मेजर जनरल आसीम बाजवह ने शनिवार को सोशल नेटवर्किंग साइट टि्वटर पर जारी बयान में कहा कि सुरक्षा बलों ने उत्तरी वजीरिस्तान में जारी कार्रवाइयों के दौरान बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं.

बयान के मुताबिक़ सुरक्षा बलों ने 9000 खुफ़िया जानकारियों के आधार पर शहरी क्षेत्रों में 218 चरमपंथियों को मार गिराया है.

जनसंपर्क विभाग के मुताबिक़ उत्तरी वजीरिस्तान में कार्रवाई के दौरान विभिन्न प्रकार के 18087 हथियार और 253 टन विस्फोटक बरामद किया गया है.

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