मदरसों से डर रही है पाकिस्तान सरकार?

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पेशावर हमले के बाद चरमपंथ के ख़िलाफ़ अभियान शुरू करने की पाकिस्तान सरकार की योजना पर सवाल उठने लगे हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार सरकार मदरसों और दूसरे मजहबी गुटों की तरफ़ से होनी वाली प्रतिक्रिया के डर से कार्रवाई नहीं कर रही है.

द नेशन अख़बार में एक टिप्पणी में कहा गया है, "ये एक खुला सच है कि पाकिस्तान में मजहबी संस्थानों में चरमपंथ फलता-फूलता है. मौलवियों से कुछेक फ़ॉर्म भरवाने के अलावा इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गई है."

अख़बार ने लिखा है कि पेशावर हमले के बाद सरकार ने चरमपंथ के मूल के ख़िलाफ़ शायद ही कुछ किया है.

नाम बदलकर वही काम

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पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार जिन चरमपंथी गुटों पर प्रतिबंध लगे भी हैं वो नाम बदलकर सक्रिय हैं. जैसे, प्रतिबंधित सुन्नी संगठन अहले सुन्नत वल जमात पहले सिपाह-ई-सहाबा पाकिस्तान नाम से जाना जाता था.

ख़बरों के अनुसार इस संगठन ने मई में क्वेटा में एक रैली भी की थी.

वहीं जब जमात-उद-दावा और हक़्क़ानी नेटवर्क जैसे संगठनों पर प्रतिबंध को लेकर मीडिया में विवाद हुआ तो गृह मंत्रालय ने कथित तौर पर अपनी वेबसाइट से प्रतिबंधित संगठनों की लिस्ट हटा दी.

पिछले साल से अब तक पाकिस्तान सरकार अरबों रुपए चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ने में ख़र्च किए हैं. लेकिन तालिबान और दूसरे चरमपंथी गुटों के हमले लगातार जारी हैं.

एक्शन प्लान की समीक्षा

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पेशावर के एक स्कूल में हुए तालिबानी हमले के बाद पाकिस्तान सरकार ने चरमपंथ के ख़िलाफ़ नेशनल एक्शन प्लान(एनएपी) की घोषणा की थी.

घोषणा के पाँच महीने बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने इसकी समीक्षा के लिए 27 मई को बैठक की और माना कि एनएपी से जो उम्मीद थी उससे वो अभी बहुत दूर है.

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दी एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने हाल में अपने एक संपादकीय में लिखा, "एनएपी एक मुकम्मल प्लान के बजाय एक विश लिस्ट की तरह प्रतीत होता है."

अख़बार के अनुसार ये योजना जल्दबाज़ी में बनाई गई लगती है.

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