यहां स्मार्टफ़ोन लेना बच्चों का खेल नहीं

किशोर बच्चे

दक्षिण कोरिया में इन दिनों बहस चल रही है कि बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर कितनी रोक होनी चाहिए?

दक्षिण कोरिया सरकार ने एक क़ानून बनाया है जिसके तहत स्मार्टफ़ोन ख़रीदने वाले 19 साल से कम उम्र के युवाओं के लिए एक ऐसा ऐप इंस्टॉल करना अनिवार्य बना दिया गया है जो फ़ोन में इंटरनेट सर्च की निगरानी करेगा.

इस ऐप के ज़रिए अभिभावक अपने बच्चों की ऑनलाइन गतिविधि को देख सकते हैं और अवांछित वेबसाइट को ब्लॉक कर सकते हैं.

इस ऐप को इंस्टॉल न करने पर फ़ोन काम नहीं करेगा.

क्या यह अच्छी मंशा की जीत है या सरकार की ज़्यादती है, ख़ासकर ऐसी उम्र के लोगों के साथ, जो अन्य देशों में वोट देने या सेना में भर्ती होने के लायक होते हैं.

निगरानी ऐप

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सरकार ने अपना खुद का मॉनीटरिंग ऐप विकसित किया है जिसका नाम है स्मार्ट शेरिफ़, हालांकि बाज़ार में दर्जनों अन्य ऐप भी हैं.

फ़ोन स्टोरों के प्रवेश द्वार पर पोस्टर लगे हैं, “युवा स्मार्टफ़ोन यूज़र्स, आपको हानिकारक सामग्री ब्लॉक करने वाले ऐप अवश्य इंस्टॉल करना चाहिए.”

हालांकि इसका कोई विकल्प नहीं है लेकिन कुछ और तरीक़े हैं.

असल में यहां संचार आयोग मान कर चलता है कि सैमसंग की धरती पर हर कोई एपल पर एंड्रॉयड को ही तरजीह देता है. इस तरह आईफ़ोन इस क़ानून से बच निकल सकता है.

सरकार का तर्क बहुत साधारण लेकिन मज़बूत है: वेब पर बुरी चीज़ों का पिटारा है और युवाओं को इससे बचाने की ज़रूरत है.

निजी आज़ादी

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लेकिन विरोधियों का तर्क भी उतना ही साधारण और मजबूत है: यह निजी आज़ादी का मसला है.

उनका तर्क है कि बच्चों को इंटरनेट की दुनिया में खुला घूमने देना होगा, ताकि वो ज़िंदगी की कठिनाइयों से वाक़िफ़ हो सके और साथ ही ज़िंदगी की खुशी का आनंद उठा सके.

और यदि इंटरनेट के एक हिस्से पर पाबंदी लगानी भी है तो इसे अभिभावकों पर छोड़ देना चाहिए.

उनका तर्क है कि स्मार्टफ़ोन ऐप से प्रतिबंधित वेबसाइट के सर्च को ब्लॉक करना दूर की कौड़ी है.

अधिकांश ऐप कुछ ख़ास शब्द या मुहावरे को ही पहचानते हैं और जब इन्हें सर्च किया जाता है तो वो अभिभावकों को चेता देते हैं.

उदाहरण के लिए, बहुत से शब्दों और मुहावरों के अलावा ख़तरा, घर से भागो, गर्भावस्था और क्रेज़ी जैसे शब्द.

ओपेन नेट कोरिया संस्था से जुड़े वकील किम येउन कहते हैं, “ये तो ऐसे ही है जैसे किशोरों के स्मार्टफ़ोन पर ख़ुफ़िया कैमरा लगा दिया जाए.”

बच्चों का हक़

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ओपन नेट कोरिया को यह भी डर लगता है कि प्रतिबंधित वेबसाइटों की सूची और लंबी हो सकती है, अगर राजनीतिक कारणों से नेता इसमें हस्तक्षेप करने लगे.

कोरिया में अभिभावकत्व की रिवायत रही है. इसलिए हाई टेक कोरिया में जो कुछ बर्दाश्त किया जा सकता है शायद उसे और कहीं न किया जा सके.

यहां 10 किशोरों में से 8 के पास स्मार्टफ़ोन है.

स्मार्टफ़ोन कैमरे में शटर के आवाज़ वाली डिफ़ॉल्ट सेटिंग भी होती है ताकि कोई दूसरे की अवांछित तस्वीर न ले सके.

सोल ग्लोबल हाईस्कूल में पढ़ने वाले वॉन जून-ली, येरिम जिन और मिंजुन किम का तर्क है कि मां बाप का इस बात के लिए डरना ज़रूरी है कि उनका बच्चा इंटरनेट पर क्या कर रहा है.

लेकिन बच्चों का भी हक़ है कि जो वो देखना चाहते हैं, उसकी इजाज़त दी जाए.

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