ज़रदारी के बयान से ‘पाकिस्तान में भूचाल’

जरदारी इमेज कॉपीरइट BBC World Service

पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के उस बयान की कड़ी आलोचना हो रही है जिसमें उन्होंने देश की सेना पर निशाना साधा है.

‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि पिछले दिनों ज़रदारी ने पेशावर में अपनी पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन में पाकिस्तान सेना और जनरलों को खुली चुनौती दी कि अगर ‘हमारी किरदार कशी (चरित्र हनन) बंद नहीं की गई तो पाकिस्तान बनने से अब तक जनरलों का कच्चा चिट्ठा खोल देंगे.’

अख़बार के मुताबिक़ इस बयान से पाकिस्तानी सियासत में भूचाल आ गया है, लेकिन यह बयान मरणासन्न हो चली पाकिस्तान पीपल्स पार्टी में नई जान डालने की कोशिश भी हो सकती है.

'हिम्मत करें ज़रदारी'

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

रोज़नामा ‘इंसाफ़’ ने इस बयान की पृष्ठभूमि में ज़रदारी से अपनी मुलाक़ात रद्द करने के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के फ़ैसले को बिल्कुल ठीक बताया है.

अख़बार लिखता है कि अफ़सोस की बात है कि पीपल्स पार्टी के नेता अपने सह अध्यक्ष और दूसरे साथियों पर भ्रष्टाचार के बदतरीन आरोपों और जांच से डर कर पाकिस्तानी सेना से लड़ने और देश की ईंट से ईंट बजाने की बातें कर रहे हैं.

‘इंसाफ़’ ज़रदारी के बयान की वजह कराची में ‘आपराधिक तत्वों और लूट खसोट करने वालों के ख़िलाफ़’ अर्धसैनिक बल रेंजर्स के ऑपरेशन को बताता है जिसका दायरा, अख़बार के मुताबिक़ अब पीपल्स पार्टी तक फैलने लगा है.

'जसारत' सवाल करता है कि क्या ज़रदारी को ये डर लग रहा है कि उन पर भी हाथ डाला जा सकता है?

लेकिन अख़बार ये भी कहता है कि इस बात में शक नहीं कि कुछ जनरलों की कारगुजारियां आपत्तिजनक रही हैं और इसी वजह से देश में बार-बार मार्शल लॉ लगा है.

अख़बार लिखता है कि ऐसे में अगर ज़रदारी के पास जनरलों की कोई लिस्ट है तो हिम्मत करके वो इसे सामने लाएं.

‘जंग का एलान’

इमेज कॉपीरइट AFP

रोज़नामा ‘दुनिया’ लिखता है कि ज़रदारी की बातों से सेना की छवि को तो नुक़सान नहीं हुआ, लेकिन जनता की भावनाओं को ज़रूर ठेस लगी है क्योंकि नरम से भी नरम शब्दों में यही कहा जा सकता है कि पूर्व राष्ट्रपति का भाषण सेना के ख़िलाफ़ जंग का खुला एलान था.

अख़बार ने प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के इस बयान को भी प्रमुखता दी कि ये कैसे मुमकिन है कि पाकिस्तानी फ़ौज के ख़िलाफ़ कोई बात करे और सरकार ख़ामोश रहे.

दूसरी तरफ़ कई अख़बारों में भारत को लेकर तल्ख़ी जारी है.

रोज़नामा ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि पिछले दिनों भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ़ोन कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को रमज़ान की मुबारकबाद दी, लेकिन हक़ीक़त ये है कि भारत पाकिस्तान के लिए मुश्किलें ही पैदा कर रहा है.

अख़बार के मुताबिक़ भारत की आक्रामकता को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए.

‘मोदी इज़ इंडिया...’

इमेज कॉपीरइट EPA

रुख़ भारत का करें तो भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की तरफ़ से इमरजेंसी की वापसी की आशंका जताने पर ‘सहाफ़त’ कहता है कि इस बयान ने सियासी हलकों को चौंका दिया है.

एक अंग्रेज़ी अख़बार के साथ इंटरव्यू में आडवाणी ने कहा कि मौजूदा दौर में लोकतंत्र को कुचलने वाली ताक़तें सक्रिय हो गई हैं.

अख़बार के मुताबिक़ बीजेपी में इस वक़्त हर कोण से हर फ्रेम में प्रधानमंत्री मोदी ही नज़र आ रहे हैं, इसलिए लगता है कि जल्द ही कोई भाजपा नेता कहेगा ‘इंडिया इज़ मोदी, मोदी इज़ इंडिया’.

इमेज कॉपीरइट AP

अख़बार कहता है कि देखने वाली बात ये है कि मोदी इस पर क्या कहते हैं, हालांकि ये उम्मीद कम है कि वो इस मामले पर कुछ कहेंगे.

आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी से जुड़े विवाद पर ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ का संपादकीय है – सुषमा के ख़िलाफ़ कांग्रेस का मोर्चा.

अख़बार लिखता है कि कांग्रेस इस मामले में कोई ढील नहीं देना चाहती जबकि सरकार सुषमा को हटाने के लिए तैयार नहीं है, ऐसे में संसद का मानसून सत्र हंगामेदार हो सकता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार