मौत से बचने का दिमाग पर कितना असर?

  • 21 जून 2015
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मैकिनन अपने पति के साथ हनीमून मनाने के लिए कनाडा से लिस्बन की फ़्लाइट पर थीं जब उनके साथ वह भयावह अनुभव हुआ, जिसे वह महीनों नहीं भुला पाईं.

जब किसी के साथ मौत के मुँह से निकलकर आने जैसा अनुभव होता है, तो बचने के बाद भी वो भयभीत करने वाले पल उसका पीछा नहीं छोड़ते.

और बचने के बाद भी वह इंसान लंबे समय तक उस स्थिति में रहता है, जिसे डॉक्टरी भाषा में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रैस कहते हैं. लेकिन इससे पीछा छुड़ाना संभव है.

जब लगा कि अब मरे

मैकिनन के लिए हनीमून कतई सामान्य नहीं था. 23 अगस्त 2001 को मैकिनन पति के साथ कनाडा से विमान में सवार हुईं.

एयर ट्रांसेट फ़्लाइट 236 जब अटलांटिक सागर के ऊपर से गुज़र रही थी, तब मैकिनन शौचालय गईं, वहां कुछ भी काम नहीं कर रहा था. मैकिनन थोड़ी असहज ज़रूर हुईं, लेकिन उन्होंने इसके बारे में ज़्यादा सोचा नहीं.

जब वो अपनी सीट पर लौटीं तो ब्रेकफास्ट सर्व हो रहा था. अचानक विमान की अापातकालीन लैंडिंग की घोषणा हुई. उन्हें एकबारगी लगा कि लिस्बन इतनी जल्दी कैसे पहुंच गए?

लेकिन फिर मची अफ़रा-तफ़री से उन्हें कुछ ग़लत होने का अंदाज़ा हुआ.

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उन्हें जल्द ही पता चल गया. विमान के कर्मचारियों ने सभी यात्रियों से लाइफ़ जैकेट पहनने का अनुरोध किया. विमान के अंदर रोशनी कम होने लगी थी. केबिन में दबाव कम होने लगा था, ऑक्सीजन मास्क दिए गए.

महीनों सताता रहा भय

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दरअसल प्लेन का ईंधन लीक होने के चलते पूरा सिस्टम बंद हो गया था. मैकिनन बताती हैं, "वे चिल्ला रहे थे कि हम लोग समुद्र में जा रहे हैं."

आधे घंटे तक विमान के तबाह होने के बारे में सोचने के बाद, मैकिनन याद करती हैं कि किसी ने बताया कि विमान ने ज़मीन पर लैंड किया है. वो जगह एजोरेस थी, पुर्तगाल के तट से करीब 850 मील (1360 किलोमीटर) दूर.

पायलट संयुक्त मिलिट्री-सिविलियन एयर बेस से संपर्क साधने में कामयाब रहा था. डराने वाली 360 डिग्री की स्पिन और कई खतरनाक मोड़ लेने के बाद विमान झटके खाता हुआ ज़मीन पर उतरने में कामयाब हुआ. विमान के पहियों में आग लग गई थी.

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घबराए हुए यात्रियों और कर्मचारियों का दल विमान से उतरकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा. इसमें दो यात्री गंभीर रूप से घायल हुए, जबकि 16 लोगों को थोड़ी बहुत चोट लगी. लेकिन विमान में सवार सभी 293 यात्री और 13 कर्मचारी सुरक्षित थे.

कई लोगों के लिए ये यात्रा यहीं ख़त्म नहीं हुईं. मैकिनन जैसे कई लोगों को इस यात्रा का डर महीनों बाद भी सताता रहा.

याददाश्त पर असर

मैकिनन एक क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट हैं. उन्होंने इस अनुभव के बाद यह जानने की कोशिश की कि ऐसे भयानक अनुभवों का इंसानी दिमाग़ पर क्या असर पड़ता है?

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यह हमारी याददाश्त पर क्या असर डालता है और कुछ लोगों को पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रैस डिसऑर्डर कैसे होता है?

वो और इस विषय का अध्ययन करने वाले अन्य लोग ये समझने में कामयाब रहे कि भयानक अनुभवों का असर लंबे समय तक क्यों रहता है.

इससे ऐसे लोगों के उपचार में बड़ी मदद मिली.

दरअसल, बीते कई दशकों से शोधकर्ताओं को डर और याददाश्त का रिश्ता किसी साज़िश जैसा लगता है. हालाँकि इसको लेकर मौजूदा आंकड़े परस्पर विरोधी है.

मैकिनन कहती हैं, "कुछ अध्ययनों के मुताबिक़ ऐसे भयानक हादसों के अनुभव को लोग आसानी से याद रख पाते हैं, लोग हर विवरण को याद रख पाते हैं."

वहीं दूसरी ओर, कई मामले ऐसे भी हैं जहां विवरण एक दूसरे से मेल नहीं खाते.

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मैकिनन ने एयर ट्रांसेट फ़्लाइट 236 में सवार अपने सहयात्रियों के अनुभव को अपने अध्ययन का विषय बनाया.

मैकिनन ने विमान में सवार 15 यात्रियों से बात की. इन सभी से उन्होंने तीन घटनाओं को याद करने को कहा- विमान यात्रा के बारे में, उसी साल घटी किसी दूसरी घटना के बारे में और नौ सितंबर, 2001 को अमरीका के ट्रेड टावर पर हुए हमले के बारे में.

15 में से छह लोगों में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) के लक्षण पाए गए.

दिलचस्प है अध्ययन

इन सभी से कहा गया कि आपको इन घटनाओं के बारे में जो भी याद हो, बताना है. इसके बाद उनसे दूसरे सवाल भी पूछे गए, मसलन आप क्या सोच रहे थे, आपके मन में क्या चल रहा था, केबिन में कैसी रोशनी थी.

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इन विवरणों की तुलना वास्तविक घटनाक्रम से की गई.

शोधकर्ताओं ने पाया कि सभी यात्रियों में डर के चलते याददाश्त पर असर देखा गया, चाहे उनमें पीटीएसडी के लक्षण हों या नहीं.

जिनमें पीटीएसडी के लक्षण थे, उनमें से हर व्यक्ति का हादसे का विवरण काफी अंतर भरा था. उन्हें अपनी याददाश्त को संजोने में काफी मुश्किल हुई.

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मैकिनन ने माना कि उनके अध्ययन का सैंपल बड़ा नहीं है, लेकिन वो इसे दिलचस्प ज़रूर मानती हैं.

मैकिनन ने बताया, "लोग इसमें भाग लेने के प्रति अनिच्छुक होते हैं. जिन्होंने भाग लिया उनके प्रति तो हम आभारी हैं, लेकिन इन मुद्दों पर बातचीत करना आसान नहीं होता."

कई तरह की यादें

तो जब ये हादसा हो रहा होता है तो हमारे दिमाग में क्या चल रहा होता है.

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दरअसल, हमारे दिमाग में याददाश्त के लिए कई स्तर पर मेमोरी सिस्टम होता है. एक तो फिज़िकल मेमोरी होती है, जैसे हमने बाइक चलानी कैसे सीखी.

हमारी सुनने संबंधी याददाश्त भी होती है, जिसमें गीत गाने की याद होती है. इसके अलावा हम सबमें हिप्पोकैंपस स्टोर मेमोरी भी होती है, जिसमें हम अपनी कार कैसे पार्क करते हैं या फिर दो और दो मिलकर चार होते जैसी बातें होती हैं.

लेकिन डर से हमारे दिमाग में कुछ और असर होता है- हमारे शरीर में आपातकालीन कंट्रोल सेंटर होता है- अमिगडला (बादाम के आकार का, जो हमारी भावनाओं को नियंत्रित करता है). डर के अलावा यह भोजन, सेक्स और ड्रग्स के इस्तेमाल से भी संचालित होता है.

अगर अचानक कोई याद आती है, तो वह हमारे भावनात्मक मेमोरी सिस्टम को एक्टिवेट करता है. किसी डरावने अनुभव पर हमारा सर्वाइवल सिस्टम हरकत में आता है, जिसे सिंगल ट्रायल मेमोरी कहते हैं.

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जॉर्जिया के अटलांटा स्थित इमारे यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान और व्यवहार विज्ञान के प्रोफ़ेसर केरी रेसलर कहते हैं, "अगर आप एक बार शेर से बच गए हों या फिर आपके सामने शेर ने किसी को शिकार बना लिया हो, तो आप शेर से डरने लगते हैं."

यह किताब में पढ़ने से अलग अनुभव होता है, जो हमारी भावना को संचालित करता है.

कनाडा के मॉन्ट्रियल स्थित मैक्कगिल यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञानी प्रोफ़ेसर करीम नाडार कहते हैं, "फ़ीयर सिस्टम से हमें ज़िंदा रहने में मदद मिलती है."

समय का होता है असर

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हालांकि ज़रूरी नहीं है कि डरावने अनुभवों की लंबी याद होती है. न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की मनोविज्ञानी प्रोफ़ेसर एलिजाबेथ फेल्प्स कहती हैं, "हममें से कई ने 11 सितंबर का हादसा देखा था, लेकिन इसके बारे में लोगों की याद उतनी मज़बूत नहीं है."

फेल्प्स की लैब हादसे की जगह के बगल में ही स्थित है. हादसे के कुछ ही सप्ताह बाद, फिर एक साल बाद, फिर दो साल बाद और 10 साल बाद कराए गए विस्तृत सर्वे में पाया गया कि हादसे के बारे में लोग अपनी याद को लेकर काफी निश्चिंत थे.

हालांकि इस तरह की याद समय के साथ बदलती भी रहती है. फेल्प्स कहती है, "डरावने अनुभवों के बारे में हमें लगता है कि हमारी याददाश्त बिलकुल सही है जबकि हकीक़त में ऐसा होता नहीं है. भावनात्मक सोच से ध्यान बंट जाता है."

ऐसे में क्या मतलब निकाला जाए, क्या भयानक याद को भुलाया जा सकता है, बदला जा सकता है?

जीवन बदलने वाला हादसा

याददाश्त के बारे में तेज़ी से बढ़ती समझ के साथ ऐसा संभव हो पाया है कि आप डराने वाली याददाश्त को बदल सकें.

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नाडार बताते हैं कि पहले छह घंटे के विंडो में यह संभव होता है. इस दौरान बीटा ब्लॉकर ड्रग्स के इस्तेमाल से पीटीएसडी को कम किया जा सकता है.

नाडार कहते हैं, "इसराइली सेना अब इसका इस्तेमाल करने लगी है." नए अनुसंधानों से ये पता चला है कि कुछ समय के बाद भी दिमाग के हार्ड ड्राइव में शामिल चीजों में बदलाव लाया जा सकता है.

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चूहों के साथ अपने प्रयोग में नाडार ने पाया कि बीटा ब्लॉकर से डरावनी यादों को कम किया जा सकता है. इसका मनुष्यों पर प्रयोग जारी है.

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वैसे मैकिनन ने बताया कि हादसे की जीवंत याद के बाद भी कई विवरण उन्हें याद नहीं थे. मैकिनन ने कहा, "हम द्वीप के ऊपर थे और समुद्र के ऊपर आ गए थे. यह काफी डरावना था."

उन्हें याद था कि कुछ घर भी दिखाई पड़ रहे थे और उन्हें आशंका हो रही थी कि दुर्घटना में कई लोगों की जान जाएगी. लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या जहाज़ अंधेरे में था तो मैकिनन ने ईमानदारी से कहा कि उन्हें ये याद नहीं है. उन्हें ये भी याद नहीं था कि वे खिड़की के पास बैठी थीं या नहीं.

वैसे मैकिनन बताती हैं कि शादी की ऐसी शुरुआत तो आश्चर्य भरी थी और ये साल उनके लिए जीवन बदलने वाला साबित हुआ.

उन्हें रिसर्चर के तौर पर अपना करियर शुरू करने की प्रेरणा मिली. समय के साथ उस हादसे की याद धूमिल ज़रूर हुई है लेकिन उसे पूरी तरह भुलाना बेहद मुश्किल है.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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