'तुम आख़िरी भारतीय को ख़त्म कर सकते हो?'

  • 22 जून 2015
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इस वक़्त इस इलाक़े के लिए कोई कुछ अच्छा करना चाहे तो सबसे बेहतर यह है कि मजबूत पैकिंग वाले टेप का 500 रुपये वाला एक-एक डिब्बा दिल्ली और इस्लामाबाद भिजवा दे.

इन्हें दोनों देशों के उन मंत्रियों और सांसदों के मुंह पर चिपका दिया जाए, जिन्हें खुद भी नहीं पता कि वो हवा में मुक्के क्यों चला रहे हैं?

उनके मुंह से झाग क्यों निकल रहे हैं और कौन उन्हें पट्टी पढ़ा रहा है कि ऐसा करोगे तो दूसरा मुंह के बल गिरके खाक चाटने लगेगा.

फूंक कर रखो कदम

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यारों, अक्ल इतनी महंगी कब से बिकने लगी?

अगर दोनों देशों के तरह तरह के मंत्रियों और आड़े-तिरछे धुरंधरों को ही मामलात सुलटाने होते तो विदेश मंत्रालय के लोगों को घर भेज कुछ पैसा ही बचा लो.

भाषण देने के शौकीनों की भीड़ को समझाना आखि़र किसकी ज़िम्मेदारी है कि देशों के आपसी संबंध गुड़िया-गुड्डे का खेल नहीं.

यह बड़ा फूंक-फूंक के कदम रखने वाला मामला है.

यह किसी लावारिस गंजे की टांट नहीं कि हर आता-जाता एक आध ठेंगा जड़ कर हंसता खेलता बढ़ जाए.

कौन तय करेगा रास्ता?

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हमने तो सुना था कि जब फ़ौजी रिटायर हो जाते हैं तो वो बाज़ की वर्दी उतारकर फ़ाख़्ते की चादर ओढ़ लेते हैं.

मगर पिछले एक महीने का मीडिया देख लें, कोई रिटायर्ड अफ़सर कह रहा है कि यह भारत वो वाला नहीं है जो सब कुछ सह जाता था.

उधर से एक हाथ उठेगा तो इधर से दस तमाचों का जवाब मिलेगा.

दूसरा कह रहा है कि हमने भी परमाणु हथियार शबे-बारात के पटाखे समझ कर जमा नहीं किए भइयन.

और मीडिया की फाफाकुटनी ऐसे चस्के ले ले के इन रिटायर्ड पेंशनियों की बिना मतलब बातें उछाल रही है जैसे इंडिया-पाकिस्तान को किस रास्ते जाना है, यह घर बैठे जनरल और ब्यूरोक्रेट ही तो तय करेंगे.

क्यों समझाता है अमरीका?

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ये कैसा नेतृत्व है, जिसे यह तो मालूम है कि कितना आगे जाना है पर यह नहीं पता कि पीछे कितना हटना है?

और हर दफ़ा अमरीका ही क्यों आकर समझाता है, प्यारे बच्चों! संयम, धीरज. लोग हंस रहे हैं. अब थोड़ा-थोड़ा पीछे हटो. शाबाश.

करगिल के समय भी यही हुआ था.

संसद पर हमले के बाद सीमा पर दस महीने तक फौजों को आमने-सामने खड़े रखने के बाद भी यही हुआ था और आज भी कोई अमरीकी ही समझा रहा है कि लड़ना, बिगड़ना, गालियां देना अच्छी बात नहीं.

चलो, चलो, घर जाओ. अम्मी परेशान हो रही हैं.

मुंह पर लगाओ टेप

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क्या आज तक कोई कौम या वर्ग किसी दूसरे राष्ट्र या जाति को सौ प्रतिशत ख़त्म कर पाया है?

तो क्या तुम आख़िरी मुसलमान ख़त्म कर सकते हो ? और तुम आख़िरी हिंदू ख़त्म कर सकते हो ?

और तुम आख़िरी पाकिस्तानी को ख़त्म कर सकते हो? और तुम आख़िरी भारतीय को ख़त्म कर सकते हो?

नहीं कर सकते तो मुंह पर टेप लगा कर वह करो जो असल में तुम्हारे करने के काम हैं.

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