दुनिया का पहला ब्रेन टू ब्रेन मैसेज?

  • 25 जून 2015
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आजकल इंटरनेट कनेक्शन की रफ़्तार ख़ासी तेज़ हो गई है. हम उन उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो हमें लगभग हर समय ऑनलाइन रखने में मदद करते हैं.

कई बार तो ऐसा लगता है कि हम हर पल ईमेल कम्यूनिकेशन से जुड़े हैं.

ये इंस्टेंट कम्यूनिकेशन का दौर है. ये अच्छा है या बुरा, इस पर अलग से बहस हो सकती है लेकिन अहम ये है कि ऐसा संभव है.

बहुत समय पहले की बात नहीं कि हम एक दूसरे से संपर्क के लिए दिनों और कई बार हफ़्तों तक इंतजार किया करते थे.

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ऐसे में ऑनलाइन कम्यूनिकेशन का सबसे बेहतर तरीका क्या होगा? क्या ऐसा दौर भी आएगा जब एक आदमी दूसरे आदमी के दिमाग से सीधा संपर्क साध लेगा?

यदि ऐसा हुआ तो सबसे पहले तो टाइपिंग के झंझट से छुटकारा मिल जाएगा. जैसे ही आपके दिमाग में कोई आइडिया आता है तो उसे आप सीधे अपने दोस्त से शेयर कर पाएँगे, फिर वो दुनिया के किसी भी कोने में हो.

इस दिशा में पहला कदम उठाया गया है. एक ताज़ा प्रयोग में हज़ारों मील की दूरी पर दो इंसानों के बीच इंटरने के ज़रिए ब्रेन टू ब्रेन कम्यूनिकेशन का दावा किया गया है.

पहला प्रयोग

ऐसा नहीं कि मनुष्य ऐसे संवाद के बेहद करीब पहुँच गया हो और नज़दीक भविष्य में ऐसा होने लगेगा.

ये अध्ययन केवल प्रूफ़ ऑफ़ कॉन्सेप्ट (यानी ऐसा संभव होने का सबूत) है.

बार्सिलोना स्थित स्टारलैब के सीईओ और इस प्रोजेक्ट से जुड़े एक शोधकर्ता जूलियो रुफ़िनी इस मुद्दे पर विस्तार से रोशनी डालते हैं.

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उनके मुताबिक केरल स्थित एक आदमी के दिमाग को ब्रेन कंप्यूटर इंटरफ़ेस से कनेक्ट किया गया जो ब्रेन वेव्स को रिकॉर्ड कर लेता है.

उस व्यक्ति को कहा गया कि वो कल्पना करे कि वह अपना हाथ हिला रहा है या फिर पांव. जब वह अपना पांव हिलाने की सोचता तो कंप्यूटर उसे शून्य दर्ज करता, जब वह अपने हाथ हिलाने की सोचता तो कंप्यूटर उसे एक दर्ज करता.

शून्य और एक के बारंबर आवृति को इंटरनेट के ज़रिए फ़्रांस के स्ट्रॉसबर्ग में बैठे एक शख्स तक पहुँचाया गया जो इस संदेश का रिसीवर था.

फ़्रांसीसी शख़्स को टीएमएस रोबोट से जोड़ा गया. टीएमइस रोबोट के ज़रिए दिमाग में बिजली का छोटा मगर तेज़ झटका दिया जाता है.

जब संदेश भेजने वाला ये सोचता कि वह हाथ हिलाए तो टीएमएस रोबोट के ज़रिए संवाद ग्रहण करने वाला व्यक्ति दिमाग में लाइट देखता, चाहे उसकी आंखे बंद थीं.

जब केरल का व्यक्ति पांव हिलाने की सोचता तो कोई रोशनी नहीं जलती.

कई हैं मुश्किलें

यह सुनने में बड़ा सामान्य लगता है, लेकिन इसमें प्रत्येक स्टेज पर मुश्किलें है.

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संदेश भेजने वाले के दिमाग में यदि कुछ और विचार आने लगते हैं तो उसे डिस्टरबेंस माना जाता है और संदेश की प्रक्रिया बाधित हो जाती है. इसलिए संदेश भेजने वाले को पहले संदेश भेजने की ट्रेनिंग दी गई.

यह पूरी प्रक्रिया बहुत तेज़ी से भी नहीं हो पाती है. शोधकर्ताओं के मुताबिक दिमाग से दिमाग के बीच संवाद का संचार दो बिट प्रति मिनट की रफ़्तार से होता है, यानी सामान्य संदेश को भेजने में भी वक्त लगेगा. लेकिन रुफ़िनी इसके होने भर से रोमांचित हैं.

वे कहते हैं, "आप इस प्रयोग को दो तरह से देख सकते हैं. पहला तरीका तो है कि यह काफी तकनीकी मामला है जबकि दूसरी ओर पहली बार ऐसा संभव हुआ है, तो ये ऐतिहासिक भी है."

पहले भी हुई हैं कोशिशें

इस प्रयोग को लेकर बहस भी हो रही है कि क्या ऐसा पहली बार हुआ है. पिछले साल हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के दल ने आदमी के दिमाग और चूहे की पूंछ के बीच संपर्क स्थापित किया था. आदमी के सोचने भर से चूहे की पूंछ में हरकत होने लगती है.

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इसके अलावा वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में भी दिमाग से दिमाग के बीच संपर्क साधने की कोशिशों पर काम हुआ. ऐसे में आईईईई स्पेक्ट्रम से एक वैज्ञानिक ने तो यहां तक कह दिया कि उन्हें रुफ़िनी का काम 'स्टंट ज्यादा लगा' और ये पहले भी हो चुका था.

लेकिन रुफ़िनी के सपने बड़े हैं. वे इसके ज़रिए भावनाओं, संवेदनाओं और विचारों का आदान-प्रदान करना चाहते हैं.

वे कहते हैं, "अभी तकनीक का इस्तेमाल काफी सीमित होता है. लेकिन एक दिन यह काफी शक्तिशाली होगी. तब आपस में ये संवाद भी बहुत कारगर हो जाएगा."

क्या हैं इसके ख़तरे?

रुफ़िनी मानते हैं कि इससे लोगों को एक दूसरे को समझने में काफ़ी मदद मिलेगी. ऐसा होने पर दुनिया काफी बदल सकती है.

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लेकिन इसके लिए एक और शून्य की आवृति के विकल्प को तलाशना होगा, साथ ही संकेत के लिए रोशनी की जगह दूसरे विकल्प आज़माने होंगे.

हालांकि इसके खतरे भी कम नही हैं. इंटरनेट पर किसी संदेश को भेजने के दौरान उसे हैक करना संभव होगा. दिमाग से सीधे संदेश भेजना संभव होने पर लोग इसका ग़लत इस्तेमाल भी कर सकते हैं और कई वैज्ञानिकों ने तो इससे व्यक्ति के दिमाग और मोटर सिस्टम पर किसी बाहरी ताकत के कब्ज़े का ख़तरा भी गिनाया है.

लेकिन फ़िलहाल ये सब ख़ासी दूर की बात है.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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