अपने ही जाल से कैसे निकलेगा ईरान?

  • 2 जुलाई 2015
जॉन केरी, ज़रीफ़, ईरान परमाणु वार्ता इमेज कॉपीरइट AFP

ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय बातचीत अंतिम मुकाम तक पहुंच रही है और इसकी सफलता या असफलता पर राष्ट्रपति हसन रोहानी का भविष्य बहुत कुछ निर्भर करेगा.

साल 2013 में चुनाव जीतने के बाद विदेशों में नरम नेता के रूप में देखे जा रहे नए राष्ट्रपति ने उन प्रतिबंधों को हटाने की दिशा में काम करने का वायदा किया था जिनसे अर्थव्यवस्था पंगु हो गई है और आम ईरानी के लिए ज़िंदगी मुश्किल हो गई है.

ईरानी कट्टरपंथियों ने परमाणु ऊर्जा पर ईरान के 'राष्ट्रीय अधिकार' पर ढील देने और समझौता करने का विरोध किया था, लेकिन अब तक ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रपति और उनके समझौताकारों के दल का पलड़ा भारी है.

हालांकि अंततः सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामनेई की बात ही अंतिम होगी.

द्विअर्थी बयान

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ख़ामनेई ने सार्वजनिक रूप से समझौता दल का समर्थन किया है और पिछले कुछ समय में उन्होंने इस दल को कुछ मामलों में छूट दी है तो कुछ मसलों पर पश्चिम को लेकर अपना रुख़ सख़्त किया है.

अयातुल्लाह ख़ामनेई ने मंगलवार को एक भाषण में कहा कि अनुबंध होने पर संयुक्त राष्ट्र और अमरीका के 'आर्थिक, वित्तीय और बैंकिंग' प्रतिबंध 'तुरंत' हटने चाहिए और बाकी प्रतिबंध 'उचित समयांतराल में' हटा लिए जाने चाहिए.

उन्होंने यूरोपीय यूनियन के प्रतिबंधों का कोई ज़िक्र नहीं किया.

परमाणु वार्ता शुरू होने के बाद से सरकार की आलोचना करने से रोके जाने की वजह से कट्टरपंथी पिछले डेढ़ साल से तकलीफ़ में हैं.

आलोचना से रोकने जाने के निर्देश खुद सर्वोच्च नेता ने दिए थे. उन्होंने 30 जून की समयसीमा तक सभी अधिकारियों को एका बनाए रखने की बात कही थी.

अयातुल्लाह ख़ामनेई के द्विअर्थी बयान, जैसे कि "न तो मैं समझौते के पक्ष में हूं, न ही विरोध में", ने ईरान में समझौते के समर्थक और विरोधी दोनों पक्षों को संतुष्ट रखा है.

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उन्होंने अपनी स्थिति को कई भाषणों में संतुलित किए रखा है ताकि न सिर्फ़ किसी संभावित नकारात्मक परिणाम की स्थिति में बच जाएं, बल्कि इसलिए भी कि वह शक्तिशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प (आईआरजीसी) से दुश्मनी नहीं चाहते.

आईआरजीसी कभी भी वार्ता के समर्थन में नहीं रहा, लेकिन वह प्रतिबंध हटाए जाने के फ़ायदों को लेकर सतर्क है जिनकी वजह से उसके अरबों डॉलर के व्यापारिक साम्राज्य पर असर पड़ा है.

हालांकि उसने समझौताकारों का खुलकर समर्थन नहीं किया है.

'विरोध मुश्किल'

पिछले कुछ महीने से रूढ़िवादियों के बहुमत वाली संसद में दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस चल रही है.

ज़्यादातर गर्मागर्म बहसें बंद दरवाज़ों के अंदर हुई हैं लेकिन उनमें से कुछ सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया तक लीक हो गई हैं.

सोमवार को सुधारवादी शर्क़ अख़बार ने लिखा, "जितना हम समझौते पर हस्ताक्षर करने के करीब पहुंच रहे हैं हमले उतने ही तीखे होते जा रहे हैं और साथ ही हसन रोहानी की सरकार का अपमान भी."

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एक अन्य लेख में पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के गुट पर आरोप लगाया गया कि वह समझौते में ईरान की सफलता के ख़िलाफ़ 'महीनों से षड्यंत्र' कर रहा है.

संसद में विरोध करने वाला गुट पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के समर्थक हैं.

अमरीकी सीनेट में रिपब्लिकन्स की तर्ज पर ही पेडारी (ज़िद्दी) कहे जाने वाले इस गुट ने कई प्रस्ताव रखे हैं ताकि संसद को अंतिम समझौते में बदलाव को चुनौती देने का अधिकार मिल जाए.

इनमें से कोई भी सफल नहीं हुआ और इसके ताज़ा विधेयक में इस तरह संशोधन किया गया कि वीटो की शक्ति संसद से लेकर सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (एसएनएससी) को सौंप दी गई, जो ईरान में निर्णय लेने वाली सबसे शक्तिशाली संस्था है और सर्वोच्च नेता की वफ़ादार है.

इसके अध्यक्ष राष्ट्रपति रोहानी हैं और इसमें संसद के सभापति अली तारिजानी और उनके भाई सादिक़ लारीजानी, जो न्यायपालिका के प्रमुख हैं, भी शामिल हैं.

सामान्यतः इसके सदस्यों को अयातुल्लाह ख़ामनेई ने खुद चुना है और इनमें सेना और आईआरजीसी के प्रमुख, विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद ज़ारिफ़ और कुछ अन्य मंत्री शामिल हैं.

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इसलिए पिछले कुछ महीनों से जारी ज़ुबानी जंग के बावजूद एक बार समझौता पर सर्वोच्च नेता की मुहर लग गई तो फिर इसका विरोध करने वाला बमुश्किल ही कोई होगा.

राष्ट्रपति की मुश्किल

ईरान के परमाणु दल के पास कोई चाल चलने की गुंजाइश कम ही है. एसएनएससी की निगरानी यह सुनिश्चित करती है कि सर्वोच्च नेता और आईआरजीसी की तय की गई सारी शर्तें पूरी हों.

अयातुल्लाह ख़ामनेई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह सैन्य स्थलों का निरीक्षण स्वीकार नहीं करेंगे (कथित पी5+1 के वार्ताकारों की यह मुख्य मांग थी). आईआरजीसी ने इसकी ज़रूरत बताई थी.

तमाम रुकावटों के बावजूद राष्ट्रपति रोहानी और उनके समझौताकारों को सर्वोच्च नेता के समर्थन की सुरक्षा हासिल है.

हालांकि अगर 30 जून की समयसीमा के बाद समझौता नाकाम हो जाता है या इसमें कोई बड़ी रुकावट आ जाती है तो ख़तरा होगा.

उस स्थिति में अयातुल्लाह ख़ामनेई शांति बनाए रखने की अपील कर सकते हैं.

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आईआरजीसी और रूढ़िवादी, जो प्रतिबंध हटाने से नाराज़ होंगे सर्वोच्च नेता को सख़्त रुख़ अपनाने पर मजबूर करेंगे, संसद में अपने बहुमत का इस्तेमाल राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ करेंगे जिससे कि फ़रवरी में होने वाले अगले संसदीय चुनावों में उन्हें सुधारवादियों की अपनी संख्या बढ़ाने में मुश्किल हो.

राष्ट्रपति को आम लोगों का समर्थन मोटे तौर पर जारी रहेगा लेकिन इन शक्तिशाली गुटों के षड्यंत्रों से जून, 2017 में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों में उनकी स्थिति अस्थिर हो सकती है.

इन चुनावों को देखते हुए ही न सिर्फ़ राष्ट्रपति बल्कि संसद में मौजूद सभी धड़े अपने लिए खींचतान की जगह बना रहे हैं.

(डॉक्टर मसौमेह तोरफ़ेह लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स (एलएसई) और स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड अफ़्रीकन स्टडीज़ में शोधार्थी हैं. उनकी ईरान, अफ़गानिस्तान और मध्य एशिया में विशेषज्ञता है. वह पहले अफ़गानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र की रणनीतिक संचार निदेशक थीं.)

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