चींटियों का अपना नेटवर्क है, एंटरनेट

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हमारे आस-पड़ोस में चींटियाँ किसी काम को एक समूह में करते हुए नजर आती हैं.

लेकिन ये चींटियाँ जब बिल से बाहर निकलती हैं तो उन्हें कोई निर्देश नहीं होता है कि क्या काम करना है. बिना किसी लक्ष्य के इधर-उधर घूमती ये चींटियां अचानक ही किसी सेना की तरह काम करने लगती हैं.

ऐसे में ये सवाल उठता है कि आखिर ये चींटियां साथ में काम करने के लिए एक दूसरे से कैसे संवाद स्थापित कर लेती हैं?

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दुनिया भर में चींटियों की करीब 14 हज़ार प्रजातियाँ मौजूद हैं और ये प्रजातियां पृथ्वी के अलग अलग हिस्सों में आसानी से तालमेल बिठाकर रहती हैं.

दरअसल चींटियों की कोई भाषा नहीं होती है, इसके बावजूद वे आपस में एक दूसरे को संदेशा देती हैं. कैसे होता है ये संभव?

'चींटियों का एंटरनेट'

आपको यकीन भले नहीं हो लेकिन इस बात के शुरुआती संकेत मिल रहे हैं कि चींटियां आपस में इंटरनेट की तरह संवाद स्थापित करती हैं, जिन्हें एंटरनेट कहा जा रहा है.

स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डेबरा गॉर्डन चींटियों के रवैए और व्यवहार पर अध्ययन कर रही हैं.

अमरीका के एरिजोना रेगिस्तानी इलाके में चींटियों के अध्ययन के दौरान गॉर्डन ये पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि बिना भाषा और बिना किसी नेतृत्व सिस्टम के चींटियों का समूह एकत्रित होकर काम कैसे करता है.

गॉर्डन ने बीबीसी फ़्यूचर से कहा, "चींटियां रहने के लिए अपना बिल बनाती हैं. भोजन की तलाश करती हैं. फंगस पैदा करती हैं. पेड़ पौधों के साथ जटिल रिश्ता बनाती हैं. बिना किसी सेंट्रल कंट्रोल के चींटियां ये सब कर लेती हैं."

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गॉर्डन संवाद की प्रक्रिया को एंटरनेट कहती हैं. उन्होंने कहा, "चींटियों में ये देखा गया है कि वो आपस में संवाद करने के लिए ख़ास किस्म के एलगॉरिदम का इस्तेमाल करती हैं. एक तरह का एलगॉरिदम विकसित करने में चींटियों को लंबा समय लगता है."

ख़ास तरह का एलगॉरिदम

गॉर्डन की मानें तो जिस तरह से इंटरनेट की दुनिया में डेटा का संचार होता है, ठीक उसी तरह से चींटियां आपस में सूचनाओं का आदान-प्रदान करती हैं. गॉर्डन बताती हैं, "इंटरनेट में सूचना डेटा पैकेट के रूप में ट्रैवल करती हैं, जो बैंडविथ के जरिए एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर तक पहुंचता है. इसी टीसीपी प्रोटोकॉल कहते हैं. चींटियों में भी इसी तरह संवाद होता है."

जिस तरह कंप्यूटर के संचार में फीडबैक मिलता है कि सूचना दूसरी जगह पहुंच गई है, वह चींटियों में भी होता है. जिस चींटी को सूचना मिलती है, वह सूचना हासिल करने के बाद एकनॉलेजमेंट भी प्रेषित करती हैं.

गॉर्डन ने उन चींटियों पर प्रयोग किया है जो अमूमन खेती वाली जमीन में पाए जाते हैं. उन्होंने इन चींटियों के भोजन की तलाश संबंधी व्यवहार पर नजर रखी है कि किस तरह चींटियां अपने रहने की जगह पर भोजन जमा करती हैं.

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गॉर्डन के मुताबिक अगर चींटियों के एलगॉरिदम को समझने के लिए विस्तार से अध्ययन हो तो मानव शरीर के अंदर कैंसर फ़ैलने की प्रक्रिया को भी समझने में मदद मिलेगी.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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