ये महिला है, इसे कम वेतन दो....

  • 17 जुलाई 2015
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Image caption 20 मार्च को पड़ने वाले इक्वल पे डे के अवसर पर होने वाली रैलियों में पूरी दुनिया में महिलाएं हिस्सा लेती हैं.

दुनिया भर में महिलाओं को उनके समकक्ष पुरुषों के मुकाबले कम वेतन में असमानता का शिकार होना पड़ता है.

भारत की स्थिति तो दुनिया के उन देशों जैसी है जहां वेतन के मामले में सबसे अधिक गैर बराबरी है.

लेकिन लैंगिक आधार पर वेतन में भेदभाव का मामला केवल भारत जैसे विकासशील में ही नहीं है, विकसित यूरोपीय देश भी इससे अछूते नहीं है.

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हाल ही में ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने एक ही पीढ़ी में पे गैप (लैंगिक आधार पर वेतन में असमानता) ख़त्म करने का वादा किया है.

कैमरन ने द टाइम्स में अपने लेख में लिखा, “जब मेरी बेटियां नैंसी और फ़्लोरेंस नौकरी शुरू करें तो, मैं चाहता हूँ कि वो पे गैप को वैसे ही बीते जमाने की बात के रूप में देखें जैसे किसी जमाने में महिलाओं को वोट का अधिकार नहीं था और वो काम भी नहीं करती थीं.”

लैंगिक आधार पर वेतन को इतिहास में दफ़न करने की डेविड कैमरन की कोशिश तब सामने आई है, जब ब्रिटेन लैंगिक असमानता को लेकर वैश्विक रैंकिंग में आठ स्थान नीचे खिसक गया है.

अब उसका स्थान 26वां हो गया है, जो इक्वेडोर, बुरुंडी और फ़िलिपींस जैसे देशों और अन्य यूरोपीय देशों से 14 स्थान नीचे है.

बढ़ी है असमानता

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लेकिन लिंग के आधार पर वेतन में असमानता का नक्शा क्या दिखाता है? इस मामले में दुनिया आज कहां है?

अंकड़े बताते हैं कि लैंगिक असमानता (जिसमें वेतन में गैरबराबरी शामिल है) पिछले दशक से कम हो रही है लेकिन बहुत धीमें और असमान रूप से.

विश्व आर्थिक फ़ोरम में लैंगिक समानता के वरिष्ठ निदेशक सादिया ज़ाहिदी कहती हैं, “लैंगिक समानता में सबसे अधिक असर श्रमशक्ति में महिलाओं के शामिल होने से हुआ है.”

साल 2005 के बाद से केवल छह देश ऐसे हैं जहां लैंगिक असमानता बढ़ी है. ये हैं- श्रीलंका, माली, क्रोएशिया, मकदूनिया और ट्यूनीशिया.

आर्थिक हिस्सेदारी और महिलाओं के लिए अवसरों के मामले में अभी 60 प्रतिशत लैंगिक गैरबराबरी है.

यह 2006 के आंकड़े से 4 प्रतिशत ही कम है.

ख़त्म हो पाएगी असमानता?

अगर इसी रफ़्तार से लैंगिक गैरबराबरी कम हुई तो इसे ख़त्म करने में दुनिया को 81 साल लगेंगे, यानी 2095 तक ही कार्यस्थलों में लैंगिक भेद ख़त्म हो पाएगा.

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किसी देश में कुल लैंगिक असमानता का आकलन कई वजहों को ध्यान में रख कर किया जाता है. जैसे- आर्थिक कारक, स्वास्थ्य, शिक्षा और राजनीति में पुरुषों के मुकाबले हिस्सेदारी.

इस रैंकिंग में शीर्ष पांच देश उत्तरी यूरोप के हैं. उसके बाद निकारागुआ का छठा स्थान है, क्योंकि महिलाओं का स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और राजनीतिक हिस्सेदारी की दर यहां अधिक है. हालांकि वेतन बराबरी के मामले में इसका बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा है.

ज़ाहिदी के मुताबिक़, रवांडा का स्थान सातवां है, क्योंकि यहां लगभग उतनी ही महिलाएं नौकरी करती हैं, जितने पुरुष. इसी कारण यह पूरे अफ़्रीका में सबसे कम लैंगिक असमानता वाला देश है.

एशिया में सबसे ऊपर नौवीं रैंकिंग फ़िलीपींस की है. और इसका सबसे मुख्य कारण है, पुरुषों और महिलाओं के बीच एक ही काम के लिए समान वेतनमान का होना.

सबसे खराब प्रदर्शन करने वालों में माली, सीरिया, चाड, पाकिस्तान और यमन हैं.

भारत 114वें नंबर पर

इस मामले में भारत का रिकॉर्ड भी ख़राब है. 142 देशों की सूची में भारत 114वें नंबर पर है.

दुनिया में 14 देश ऐसे हैं जो आर्थिक हिस्सेदारी और अवसर के मामले में लैंगिक गैरबराबरी का 80 फीसदी ख़त्म कर चुके हैं.

इनमें चार अफ़्रीकी देश हैं, पांच देश यूरोप और मध्य एशिया के और बाकी पांच हैं- बुरुंडी, नॉर्वे, मलावी, अमरीका और बहामास.

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ये कहने की ज़रूरत नहीं कि आम तौर पर देशों में संघर्ष और लोगों के विस्थापन के कारण महिलाओं को सबसे अधिक नुकसान सहना पड़ता है.

लेकिन, समावेशी आर्थिक विकास और वेतन बराबरी के मामले में कौन सा देश अच्छा प्रदर्शन कर रहा है?

आकलन

विशेषज्ञ महिलाओं की आर्थिक हिस्सेदारी और खास तौर पर उनके लिए आर्थिक अवसरों का आकलन करते हैं. यानी देश की कुल श्रमशक्ति में उनकी संख्या और कामकाजी महिलाओं को मिलने वाली नौकरी की गुणवत्ता.

विश्व आर्थिक फ़ोरम के अनुसार, उन विकसित देशों में यह खास तौर पर प्रासंगिक है, जहां महिलाएं आसानी से नौकरी पा सकती हैं लेकिन उन्हें और और बेहतर नौकरी और तनख्वाह पाने का मौका नहीं मिलता.

विशेषज्ञों का कहना है कि वेतन में असमानता उम्मीदें को दर्शाता है.

उदाहरण के लिए यह महिलाओं को मानने के लिए प्रेरित करता है कि एक ही काम के लिए पुरुष सहकर्मियों के मुक़ाबले उन्हें कम वेतन किया जाएगा, यहां तक कि विकसित देशों में भी.

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