भारत में महिला पायलट होना कितना मुश्किल?

  • 19 अगस्त 2015
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पूरी दुनिया में केवल 4000 महिला पायलट हैं और उनमें से 600 भारत में हैं. दूसरी ओर दुनिया में पुरुष पायलटों की संख्या 1.3 लाख है.

भारत में किसी महिला पायटल के लिए पारिवारिक जीवन और ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ एक कुशल पायलट होना कितना मुश्किल है?

दो बच्चों की मां, प्रीति कोहल 1996 से जेट एयरवेज़ की पायलट हैं और 2009 से वे कैप्टन हैं. वो बताती हैं कि वो अपने बच्चों की परवरिश और पारिवारिक जीवन से इस तरह जुड़ी हुई हैं कि उन्होंने बच्चों से जुड़ा कोई ख़ास दिन काम की वजह से 'मिस' नहीं किया है.

अगर उनकी मानें तो निजी जीवन में कड़ा अनुशासन रखें तो भारत में महिला पायलट होना कोई मुश्किल काम नहीं है. बीबीसी कैपिटल ने ये समझने की कोशिश की कि ये संभव कैसे हुआ.

कैसे हुई शुरुआत?

मुंबई की प्रीति कोहल जब 16 साल की थीं, तब पहली बार उन्हें उड़ान भरने की चाह हुई. लेकिन हवाई जहाज उड़ाने के सपने उन्होंने तब देखना शुरु किए, जब वो अपने माता-पिता की इजाज़त के बिना, उनकी कार चलाते हुए मुंबई के अलग-अलग इलाक़ों में घूमती थीं.

वो कहती हैं कि कार पर ख़ुद का नियंत्रण होना, एक तरह से आज़ादी का आभास होना, जब दिल करे, सैर-सपाटे के लिए निकल जाना उन्हें अच्छा लगता था.

वह बताती हैं, "मुझे खुद से काम करना अच्छा लगता है. कार के बाद मैं चाहती थी कि तेज रफ़्तार वाले हवाई जहाज को उड़ा सकूं."

कोहल की मां डॉक्टर थीं और पिता इंजीनियर. दोनों ने कोहल और उनकी बहन को बचपन से ही सिखाया कि वे किसी भी मामले में पुरुषों से कमतर नहीं हैं.

कोहल बताती हैं कि उन्होंने कड़ी मेहनत की और हवाई जहाज़ उड़ाने का लाइसेंस पाने के लिए उस इम्तिहान में पास हुई जिसमें सफलता की दर 0.1 प्रतिशत है.

उन्हें 1994 में हवाई जहाज़ उड़ाने का लाइसेंस मिला और फिर 1996 में वे जेट एयरवेज़ की पायलट बनीं.

इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ़ वीमेन एयरलाइन पायलट्स के मुताबिक दुनिया की 4000 महिला पायलटों में से 600 भारत में हैं.

परिवार के सहयोग ने उन्हें बेहतर करने को प्रेरित किया. हालांकि पुरुषों के आधिपत्य वाले पेशे में महिलाओं को काफी चुनौतियों का सामना करना होता है.

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कोहल कहती हैं कि उन्हें किसी तरह के भेदभाव का सामना तो नहीं करना पड़ा लेकिन एयरलाइन इंडस्ट्री में दूसरी महिलाओं को मुश्किलें आई हैं.

2009 में एयर इंडिया ने 10 महिला फ्लाइट एटेंडेंट्स को ज़्यादा वजन होने के कारण नौकरी से हटा दिया था. भारत की बजट एयरलाइन गो एयर ने 2013 में कहा था कि वह अपने यहां छोटी एवं युवा महिला एटेंडेंट्स को ही रखना चाहता है ताकि 'जहाज़ का वजन कम रहे और ईंधन पर होने वाला खर्च भी कम हो.'

परिवार पर ध्यान

पायलट बनने के बारे में कोहल को कभी दोबारा सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ी. वह कहती हैं, "मुझे कभी नहीं लगा कि एक पायलट होना, इंजीनियर या फिर टीचर होने से अलग है. हम क्या कर सकते हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है."

कोहल के बच्चे जब छोटे-छोटे थे, तब वह केवल एक से दो घंटे ही विमान उड़ाया करती थीं. सुबह साढ़े तीन बजे उठती थीं, बच्चे को दूध पिलातीं फिर उसे सुलातीं.

इसके बाद सुबह चार बजे तक एयरपोर्ट पहुंच जातीं. इसके बाद सुबह साढ़े दस बजे तक वह घर लौट आतीं ताकि दिन भर का समय अपने बच्चों को दे सकें.

इस तरह की रुटीन का असर है कि वह अपने बच्चों से जुड़े किसी भी अहम मौके पर, या फिर बच्चों के स्कूल में 'पेयरेंट-टीचर मीटिंग' तक के लिए हमेशा मौजूद रहीं.

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अब उनके बच्चे 14 साल और 11 साल के हैं.

कोहल के मुताबिक पायलट का करियर, घर और कामकाज के बीच संतुलन बिठाने के उद्देश्य से बहुत ही अच्छा करियर है, लेकिन इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से ज़िदगी चलानी होती है.

कोहल के बच्चे अब बड़े हो गए हैं तो उनका भी शेड्यूल बदला है. अब वे कैप्टन हैं और उन्हें लंबी उड़ानों पर जाना होता है.

इसके बावजूद कोहल कोशिश करती हैं कि हर महीने चार रात से ज़्यादा उन्हें घर से बाहर नहीं बितानी पड़ें.

इन सबके लिए कोहल को बड़ी क़ीमत चुकानी होती है. वह अपने पति के साथ ज़्यादा वक्त नहीं बिता पाती हैं.

उनके पति एयर इंडिया के बोईंग 777 विमान के कैप्टन हैं. वे अमूमन एक वक्त में चार दिन घर से बाहर रहते हैं और उसके बाद उन्हें छह छुट्टियां होती हैं.

जब वे घर पर होते हैं तब कोहल उनके साथ ही वक्त गुजारती हैं. वह कहती हैं, "छह दिन पति के लिए बुक होते हैं."

अनुशासन सबसे अहम

लेकिन जब पति नहीं होते हैं, तब कोहल बताती हैं, "मेरे लिए आजादी रहती हैं. मैं उन 16 घंटों में जो चाहूं, कर सकती हूं."

जब दोनों कामकाजी उड़ान पर होते हैं तो कोहल के माता-पिता उनके बच्चों की देखभाल करते हैं. कोहल भारतीय समाज के इस सपोर्ट सिस्टम की बहुत तारीफ़ करती हैं.

इन दिनों कोहल अमूमन साढ़े पांच बजे उठती हैं. 9 बजे के करीब एयरपोर्ट पहुंचती हैं. दिन भर में कुछ घंटे की उड़ान के बाद, वह ढाई बजे घर आ जाती हैं.

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एक घंटा वो आराम करती है और उसके बाद उनके बच्चे स्कूल से आ जाते हैं.

परिवार के लोग रात साढ़े आठ बजे खाने के लिए बैठते हैं और बच्चे साढ़े नौ बजे तक सोने चले जाते हैं.

कोहल कहती हैं, "पायलट होने की सबसे ख़ास बात यह है कि आप नियमों को तोड़ नहीं सकते हैं. हवा में 1000 फ़ीट की ऊंचाई पर आप ग़लती नहीं कर सकते, आपका मन शांत होना चाहिए. इसलिए मैंने घर के लिए कुछ कड़े नियम बना रखे हैं. बहुत कड़े नियमों के कारण मेरे बच्चों के लिए शायद ये ज़्यादा मश्किल है, जब हम छोटे थे तो हमारे लिए स्थितियां ज़्यादा आसान थीं.'

'कुछ भी मुश्किल नहीं'

कोहल मध्यरात्रि तक सोने चली जाती हैं. जब अगले दिन उड़ान नहीं हो, और पति भी घर पर नहीं हों, तो कोहल देर रात 2.30 बजे तक भी रीडिंग कर लेती हैं. उनके मुताबिक यह उनका अपना समय होता है.

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कोहल अपनी कामयाबी का श्रेय कठिन मेहनत को देती हैं. वैसे पायलट बनने के लिए होने वाली परीक्षा में मात्र 0.1 फ़ीसदी लोग पास होते हैं और अपनी कक्षा में इस परीक्षा को पास होने वाली प्रीति कोहल इकलौती थीं.

इन सबके बावजूद प्रीति ये नहीं मानती हैं कि उन्होंने कुछ असाधारण किया है. वह कहती हैं कि भारत में कई शिक्षित महिलाओं का बेहद कामयाब करियर है.

वह कहती हैं, "अगर आपने दिमाग में कुछ तय कर लिया है, तो उसे बस कर लीजिए. कल कुछ और भी हो सकता है."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.

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