'फ़र्खंदा, मेरी बच्ची! उन्होंने ऐसा क्यों किया'

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बीते मार्च में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक भीड़ ने क़ुरान जलाने का ग़लत आरोप लगाकर एक महिला को पीट पीट कर मार डाला था.

जल्द ही इस घटना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए और अभियुक्तों पर मुक़दमा चला. लेकिन जिन्हें दोषी पाया गया बाद में उनकी सज़ा कम हो गई और कुछ तो जेल से पहले ही छूट चुके हैं.

यह अफ़गान न्यू ईयर के दो दिन पहले की बात है. फ़र्खंदा मलिकज़ादा अपनी मां बीबी हाजरा से ये कह कर बाहर निकलीं कि वो क़ुरान की क्लास में पढ़ने जा रही हैं.

27 साल की फ़र्खंदा इस्लामी क़ानून की पढ़ाई करती हुई बच्चों को निःशुल्क पढ़ाती थीं. उनका जज बनने का सपना था.

उनकी मां बीबी हाजरा कहती हैं कि उनकी बेटी बहादुर थी और मन की बात कहने से डरती नहीं थी.

उस दिन जब फ़र्खंदा घर वापस आ रही थीं तो वो क़ाबुल के बीचो-बीच स्थित शाह-ए-दू शमशीरा दरगाह पर रुक गईं.

आरोप

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यहां उन्होंने प्रार्थना की और इसके बाद वो तावीज़ बेचने वाले धर्मगुरु से उलझ गईं.

वो इन चीजों को अंधविश्वास और ग़ैर इस्लामी मानती थीं.

वो दरगाह के मुख्य धर्मगुरू ज़ैन-उल-दीन के पास जब ये मामला ले गईं तो उन्होंने चिल्लाते हुए कहा, “यह महिला अमरीकी है और इसने क़ुरान को जलाया है.”

इसके साथ ही लोग इकट्ठा हो गए, कुछ लोगों ने अपने फ़ोन में इस घटना को क़ैद भी किया. ये वीडियो काफ़ी दिल दहला देने वाला है, लेकिन बीबी हाजरा ने इसे देखा है.

फ़ुटेज में दिख रहा है कि फर्ख़ुंदा पर्दे में हैं और दरगाह के गेट के ठीक भीतर हैं और आरोपो से इनकार कर रही हैं.

एक आदमी ने चिल्ला कर कहा, “अमरीकियों ने इसे भेजा है.”

फ़र्खंदा ने कहा, “ऐसा मत कहो.” इस पर उस आदमी ने कहा, “अगर तुमने कुछ कहा तो तुम्हारा मुंह तोड़ दूंगा.”

फ़र्खंदा ने रिकॉर्डिंग करने वाले आदमी से ऐसा करने को मना भी किया.

उसने कहा कि, “तुमने क़ुरान क्यों जलाया, क्या तुम्हें शर्म नहीं है?”

इसके बाद फर्ख़ंदा को दरगाह से खींच कर बाहर लाया गया और ज़मीन पर पटक दिया गया, पैरों से ठोकरें मारी गईं और भीड़ से ‘मार डालो’ का शोर आने लगा.

'पुलिस देखती रही'

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पुलिस की ओर से चली गोलियों के बाद जब भीड़ पीछे हटी तो ज़मीन पर बैठी फ़र्खंदा नज़र आईं, उनका पर्दा और स्कार्फ़ हट गया था. उनके बाल उलझे हुए थे और उनके हाथ और चेहरा खून से सने हुए थे.

घबराई फ़र्खंदा ने सीधे कैमरे में देखा. उसका एक पैर का जूता दूर छिटक गया था.

बीबी हाजरा कहती हैं, “सबसे अधिक टीस इस बात की है कि जब वो इस तरह से बैठी थी और उसके सिर से खून बह रहा था तो पुलिस मूकदर्शक बनी हुई खड़ी थी. उन्होंने क्यों नहीं किसी कार को बुलाया या पुलिस सहायता बुलाई?”

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Image caption दरगाह शाह-ए-दू शमशीरा.

फ़ुटेज में दिखता है कि पुलिसकर्मी फ़र्खंदा को जमीन पर पटके जाते, ठोकरें मारे जाते, लाठी से पीटे जाते और एक कार द्वारा कुचले जाते देख रहे हैं. इस कार में फ़र्खंदा 200 मीटर तक घिसटती हुई दिखतीं हैं.

काबुल पुलिस के आपराधिक जांच के मुखिया जनरल ज़हीर ज़हीर ने बीबीसी को बताया, “उन्होंने अपनी ड्यूटी में लापरवाही बरती. अगर जान भी चली जाती तब भी, फ़र्खंदा को इस तरह से शहीद होने से बचाने की ड्यूटी बनती थी.”

उस दोपहर एक लड़का याक़ूब पास ही अपने चाचा की दुकान पर था. परिवार के अनुसार, वो अच्छा लड़का है और अपनी छोटी बहनों की देखभाल करता था.

मरने के बाद भी मारते रहे

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Image caption फ़र्ख़ंदा का शरीर यहीं आग के हवाले किया गया था.

लेकिन जब भीड़ फ़र्खंदा के शरीर को घसीटते हुए दुकान के पास पहुंची तो याक़ूब भी उनमें शामिल हो गया.

फ़र्खंदा के शरीर को नदी के सूखे किनारे पर फेंक दिया गया. वीडियो में याक़ूब शव पर एक बड़ा पत्थर फेंकते हुए दिखता है.

पत्थरबाजी के बाद फ़र्खंदा के शव को आग लगा दी गई.

यह वीडियो जल्द ही लोगों को बीच फैल गया और किसी ने इसे इंटरनेट पर अपलोड कर दिया.

कई लोगों ने इस हमले में खुद के शामिल होने का इंटनेट पर बखान किया या साफ साफ इसका समर्थन किया.

निंदा और समर्थन

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हालांकि राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने इसकी निंदा की और जांच के आदेश दिए, लेकिन कुछ अधिकारियों ने घटना का समर्थन किया. इनमें सूचना व संस्कृति उप मंत्री सेमिन गज़ल हसनज़ादा और क़ाबुल पुलिस के प्रवक्ता हशमत स्तानकज़ई शामिल थे.

इसके दूसरे दिन शुक्रवार था और जुमे की नमाज़ में कुछ इमामों ने भीड़ की इस कार्रवाई की तारीफ़ भी की.

पुलिस ने फ़र्खंदा के परिवार को क़ाबुल छोड़ किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाने को कहा.

लेकिन दूसरे दिन शाम तक तब एक नया मोड़ आ गया जब हज़ और धार्मिक मामलों के मंत्रालय को क़ुरान जलाए जाने का कोई सबूत नहीं मिला.

इमाम और अधिकारियों ने अपने बयान को वापस लिया और हसनज़ादा और स्तनेकज़ई को हटा दिया गया.

शहीद

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Image caption इस घटना के ख़िलाफ़ काबुल की सड़कों पर महिलाओं ने प्रदर्शन किए और यहां नारे लगे- 'हम सभी फ़र्खुंदा हैं.'

बीबी हाजरा याद करते कहती हैं, “हम शवगृह गए. मैंने एक प्लास्टिक में रखे जल चुके शव को चेन हटाकर खोला.”

“मैंने कहाः फ़र्खंदा, मेरी बच्ची! मैंने उसके हाथ और चेहरे को साफ़ किया. उसका चेहरा पूरी तरह जल चुका था.”

“उन्होंने तुम्हारे से ऐसा क्यों किया, मेरी बच्ची? मुझे लगा कि जैसे वो मुझसे कह रही है कि- मैं निर्दोष थी.”

लेकिन फ़र्खंदा नफ़रत की पात्र से शहीद बन गईं थीं. उनके अंतिम संस्कार में क़रीब एक हज़ार लोग आए.

वो देश जहां दफ़नाने की प्रक्रिया केवल आदमी ही करते हैं, फ़र्खंदा का ताबूत महिलाएं कब्र तक ले गईं.

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली सारा मोसावी ने बताया, “मैंने और मेरी दोस्तों ने तय कर लिया था कि ताबूत को किसी आदमी को छूने नहीं देंगे.”

घटना के दो दिन बाद हज़ारों महिलाएं ‘हम सभी फ़र्खंदा हैं’ के नारे लगाते क़ाबुल की सड़कों पर उतर आईं.

इस हत्या के संबंध में 59 लोगों पर आरोप लगे.

छह सप्ताह बाद मामले की सुनवाई को टेलीविज़न पर प्रसारित किया गया.

लापरवाही बरतने में 11 पुलिसकर्मियों को एक साल जेल, आठ लोगों को 16 साल की सज़ा और चार की मौत की सज़ा पर रोक लगा दी गई.

'आदमी नहीं जानवर'

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Image caption कोर्ट में सुनवाई के दौरान ज़ैन उल दीन और याक़ूब.

मौत की सज़ा पाए लोगों में दरगाह प्रमुख ज़ैन-उल-दीन और याक़ूब थे.

बीबी हाजरा कहती हैं, “वो आदमी नहीं थे, वो भेड़िया जैसे जानवर थे. उन्होंने उसे पीटा और मार डाला. उसे घसीटते हुए नदी के किनारे क्यों ले गए. उस पर कार क्यों चढ़ाई. इसके बाद जलाया क्यों. उन्होंने उसके मरे हुए शरीर को भी नहीं छोड़ा.”

याक़ूब के पिता कहना था कि जब भीड़ कोई बात कह रही हो तो कोई भी उसी रौ में आ जाता है.

लेकिन इस घटना का स्याह पहलू ये है कि हत्या करने वाली भीड़ धार्मिक कट्टरपंथियों की नहीं बल्कि आम लोगों की थी.

वीडियो में ठोकरें मारते और पीटते लोग पारंपरिक पहनावे की बजाय टी शर्ट और जीन्स में दिख रहे हैं.

राष्ट्रपति की पत्नी रुला गनी बीबीसी से बातचीत में कहती हैं, “यह दिखाता है कि अफ़ग़ानी समाज कई सालों से हिंसा के माहौल में रहता आया है. यह हर अफ़ग़ानी के लिए एक चेतावनी जैसा है.”

'उसका नाम ज़िंदा है'

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Image caption फ़र्खंदा की मां बीबी हाज़रा (बीच में) और परिवार के अन्य सदस्य.

फ़र्खंदा को आधिकारिक रूप से शहीद का दर्जा दिया गया है.

जिस सड़क पर उनकी हत्या हुई, उसका नाम फ़र्खंदा के नाम पर रख दिया गया है.

बीबी हाजरा कहती हैं, “उसका नाम ज़िंदा है. मुझे उस पर गर्व है.”

देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा रोकने के लिए नए क़ानून बनाए गए हैं.

पिछले महीने क़ाबुल की कोर्ट ने चारों आदमियों की मौत की सज़ा को रद्द कर दिया.

अब इनमें तीन को 20-20 की क़ैद और याक़ूब को 10 साल की सज़ा दी गई है.

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