भारत की ज़ुबान बोलने लगे अफ़ग़ान: पाक मीडिया

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पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के रिश्तों में आए तनाव ने इस हफ़्ते पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में ख़ासी सुर्ख़ियां बटोरी.

‘नवाए वक्त’ ने इस विषय पर अपने संपादकीय को शीर्षक दिया- अशरफ़ ग़नी फिर भारत की ज़ुबान बोलने लगे.

अख़बार का इशारा काबुल एयरपोर्ट पर हुए हालिया हमले के बाद अफग़ान राष्ट्रपति ग़नी के बयान की तरफ़ है जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें तो पाकिस्तान से शांति की उम्मीद थी लेकिन वहां से जंग के संदेश मिल रहे हैं.

अख़बार के मुताबिक़ अफ़ग़ान राष्ट्रपति ने भी भारत का यही रवैया अपना लिया कि इधर धमाका हुआ और उधर बिना छानबीन आरोप पाकिस्तान पर मढ़ दो.

अख़बार कहता है कि जब तक ग़नी अपनी सरज़मीन को भारत के ग़लत इरादों के लिए इस्तेमाल करने देंगे, तब तक अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच अमन नहीं हो सकता.

किसने थोपी जंग

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वहीं ‘जसारत’ अख़बार लिखता है कि जंग तो अफ़ग़ानिस्तान की तरफ़ से थोपी गई है.

अख़बार लिखता है कि जंग अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान की तरफ़ आई है और पाकिस्तान में जितने भी ड्रोन हमले हुए हैं, उनमें ज़्यादातर अफ़ग़ानिस्तान से हुए हैं.

अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की सरहद की पूरी पट्टी पर भारतीय निर्माण कंपनियां क्या कर रही हैं, और उन्हें राजनयिक सुविधाएं कौन देता है?

वहीं ‘जंग’ ने पाकिस्तान की मध्यस्थता से अफ़ग़ान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत की बहाली पर ज़ोर दिया है.

अख़बार ने लिखा है कि अफ़ग़ान सरकार अपने यहां होने वाले हर धमाके की ज़िम्मेदारी पाकिस्तान पर थोप कर अपनी नाकामी पर पर्दा डाल रही है.

अख़बार की राय है कि अफ़ग़ान सरकार और तालिबान की बातचीत की बहाली के सिवाय कोई चारा नहीं है और अफ़ग़ानिस्तान को पाकिस्तान के साथ मिलकर ही समस्या का स्थाई समाधान तलाशना होगा.

पाकिस्तान के लिए

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वहीं ‘औसाफ़’ का संपादकीय है- किसी की ख़ुशी के लिए पाकिस्तान को नाराज़ नहीं कर सकते, ईरान का दो टूक रुख़.

अख़बार कहता है कि ये बात ईरान ने दोनों देशों की गैस पाइपलाइन परियोजना पर जल्द से जल्द अमल के सिलसिले में कही है और इससे पाकिस्तान को उर्जा संकट से निपटने में मदद मिलेगी.

अख़बार ने पाकिस्तान दौरे पर गए ईरानी विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ के इस बयान को भी सराहा कि उनका देश कश्मीर समस्या के हल में अपनी भूमिका अदा करने को तैयार है.

रोज़नामा ‘दुनिया’ लिखता है कि जिस तरह फ़लीस्तीनी मुद्दे ने मध्यपूर्व की शांति को तबाह कर दिया है, उसी तरह कश्मीर मुद्दे के कारण दक्षिण एशिया अशांति और अस्थिरता से दोचार है.

इस मुद्दे पर मध्यस्थता से इनकार करने वाले भारत के रुख़ पर अख़बार की टिप्पणी है कि जब ईरानी विदेश मंत्री कश्मीर मुद्दे पर भारतीय नेताओं से बात करेंगे तो उन्हें पता चल जाएगा कि भारत की राजनीति में विनम्रता और लिहाज़ की कोई जगह नहीं है.

वहीं कराची में जारी पाकिस्तानी रेंजर्स के अभियान के विरोध में एमक्यूएम पार्टियों के सांसदों और विधायकों के इस्तीफ़ों से पैदा संकट की भी पाकिस्तानी अख़बारों में लगातार चर्चा हो रही है.

‘आरएसएस का असर’

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रुख़ भारत का करें तो हंगामे की भेंट चढ़े मॉनसून सत्र पर ‘हमारा समाज’ लिखता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसद में ऐसा भाषण देना चाहिए था कि वो विपक्ष के लिए मिसाल बन जाता, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

अख़बार कहता है कि कुछ विश्लेषक ये भी मानते हैं कि कांग्रेसी सांसदों के ख़िलाफ़ एनडीए की मुहिम कहीं उसी की बदनामी का सबब न बन जाए.

एफ़टीआईआई का चेयरमैन गजेंद्र चौहान को बनाने के मुद्दे पर हो रहे विवाद पर जदीद ख़बर का संपादकीय है- आरएसएस का असर.

अख़बार लिखता है कि बात सिर्फ़ गजेंद्र चौहान की नहीं है, बल्कि आरएसएस हर क्षेत्र में ऐसे संकुचित दृष्टिकोण और मामूली योग्यता वाले लोगों को नियुक्त करवा रहा है, जिनकी इकलौती ख़ूबी कथित फासीवादी विचारधारा से जुड़े होना है.

अख़बार लिखता है कि भारतीय जनता पार्टी ख़ुद को लोकतांत्रिक पार्टी कहती है, लेकिन उसकी कमान आरएसएस के हाथों में है जो देश में एक भाषा, एक धर्म और एक संस्कृति को सर्वोपरि बनाना चाहता है.

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