'भारत और पाकिस्तान बस टाइमपास करते हैं'

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ये जो इतनी उधमबाज़ी और हाहाकर हर तरफ़ मचा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू नहीं हो सकी तो जैसे कोई क़यामत आ गई तो ये बात अपन की समझ से ऊपर है.

इसे कहते हैं सूत न कपास, जुलाहों में लठ्ठम लट्ठा.

अब तक जितनी बार भी बातचीत हुई, जितने भी हस्तक्षेप हुए, जितनी क़समें खाई गईं, जितनी आनिया जानियाँ हुईं, जितनी बार कल्ले से कल्ला मिलाया गया, जितने युद्ध किए गए, पीठ पीछे वार भी हुए, जितनी फ़िल्में दिखाई, मौसिक़ि सुनवाई, क्रिकेट खेली...इस सबसे क्या हुआ जो इन सबके न होने से हो जाएगा?

इसलिए ये अपना ख़ून जलाने का नहीं चिल करने का टाइम है.

अब तो दुनिया के पंसारियों को भी अच्छे से पता चल गया है कि इन दो झक्कियों को समझाने बुझाने से सिर्फ़ समझाने वाले का टाइम ज़ाया होता है.

काला और सफ़ेद

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69-69 साल के ये दोनों बुड्ढे उन फ़ालतू ग्राहकों की तरह होते हैं जिन्होंने ख़रीदना-वरीदना कुछ नहीं होता मगर हर सौदे को हाथ मारकर चेक ज़रूर करते हैं और फिर कीड़े भी निकालते हैं. यूं बाज़ार में टाइमपास ही करते हैं.

और जब इससे बोर हो जाते हैं तो एक दायरे में एक दूसरे के पीछे गोल गोल घूमकर समझते हैं कि कहीं न कहीं पहुँच जाएँगे.

कभी कभी कुछ भी करने को नहीं होता तो एक दूसरे से बातचीत भी कर लेते हैं.

बातचीत कुछ ऐसी होती है, ये काला आप देख रहे हैं....जी कौन सा काला, ये तो सफ़ेद है....अरे ध्यान से देख ये सफ़ेद नहीं काला है...दिमाग़ चल गया है तेरा....साफ़ साफ़ सफ़ेद नज़र आ रहा है...अरे तू अंधा है क्या अच्छे भले काले को सफ़ेद कह रहा है...ओ भाई साहब इधर आइए, आप ही बताइए कि ये सफ़ेद है या काला?

डॉक्टर की ज़रूरत

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भाई साहब पहले तो इन दोनों को ऊपर से नीचे तक देखते हैं और फिर कहते हैं, न ये काला है न सफ़ेद, ये तो भूरा है. आप दोनों को किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाना चाहिए.

देख मैं कह रहा था ना कि ये काला नहीं है....मगर ये सफ़ेद भी तो नहीं है.

शुरू शुरू में लोग इन दोनों कैरेक्टर को देखने के लिए रुकते भी थे. इनसे हमदर्दी भी करते थे. कभी कभार मदद की पेशकश भी कर देते थे. लेकिन अब बस इन संतों बंतों को देखते हुए मुस्कराते हुए गुज़र जाते हैं.

वैसे भी, ख़ून थूके कभी रोए, कभी तकरीर करे, ऐसे पागल के लिए क्या कोई तदबीर करे.

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