चीन की मंदी से दुनिया को ख़तरा क्यों?

  • 26 अगस्त 2015
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पिछले छह दिन में दुनिया के बाज़ारों से करीब तीन ट्रिलियन डॉलर (1985.39 खरब रुपये से ज़्यादा) डूब गए हैं.

चीन के शेयर बाज़ार में गिरावट का दौर मंगलवार को भी जारी रहा. शंघाई कंपोज़िट 7.6 फ़ीसदी गिरा. लेकिन एशिया के अन्य बाज़ारों ने मिली-जुली प्रतिक्रिया दी.

टोक्यो स्टॉक एक्सचेंज में चार फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई. सिंगापुर का शेयर बाज़ार 1.55 फ़ीसद की बढ़त के साथ बंद हुआ. यह सोमवार को 3.6 फ़ीसदी गिरा था.

हॉंगकॉंग स्टाक एक्सचेंज 0.71 फ़ीसदी बढ़कर बंद हुआ जबकि सोमवार को इसमें 4.8 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी.

एेपल के खरबों गए

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स्टॉक मार्केट की अस्थिरता से कुछ कंपनियों पर बहुत भारी मार पड़ी है. बाज़ार पूंजीकरण के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एेपल को पिछले कुछ हफ़्ते में 158 अरब डॉलर (104.56 खरब रुपये से ज़्यादा) का नुक़सान उठाना पड़ा है.

एेपल की क़ीमत इसलिए बढ़ गई थी क्योंकि उसे चीन के बढ़ते मध्यवर्ग को आईफ़ोन बेचने की उम्मीद थी. लेकिन चीनियों की ख़रीद की रफ़्तार कम होने से ऐपल का बाज़ार सिकुड़ गया है.

निवेशक स्टॉक मार्केट से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित जगहों में लगा रहे हैं. इससे जापानी येन और स्विस फ़्रैंक जैसी मुद्राएं मजबूत हो रही हैं.

सोना हालांकि मंगलवार को कुछ सुस्त ही रहा. लेकिन यह ऐसी वस्तुओं में बना हुआ है जिनमें सुधार का रुख है. यह पिछले चार हफ़्तों में 7.7 फ़ीसद बढ़ा है.

दुनिया का चीनी इंजन

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पिछले 35 साल से वैश्विक अर्थव्यवस्था की कहानी दरअसल चीनी अर्थव्यवस्था की कहानी है. क्योंकि यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है. इसका दुनिया की जीडीपी या आय में 15 फ़ीसदी हिस्सा है.

इसके अलावा विश्व के विकास में इसका हिस्सा एक चौथाई या 25 फ़ीसदी है.

चीनी अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती से तेल की कीमतें 43 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई हैं. तेल का ये दर साल 2009 में देखा गया था.

इसके अलावा मोटे तौर पर कच्चे माल की कीमतें गिरकर 1999 के स्तर पर पहुंच गई हैं.

हालांकि कुछ दिनों के लिए यह लोगों के लिए यह अच्छी ख़बर हो सकती है क्योंकि अब उसी पैसे में पहले के मुकाबले आप ज़्यादा पेट्रोल या सामान ले सकते हैं. लेकिन दीर्घकाल में यह समस्या पैदा करेगी.

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अगर विश्व अर्थव्यवस्था का इंजन कही जाने वाली चीनी अर्थव्यवस्था पटरी से उतरती है या थमती है तो हम सब और ग़रीब हो जाएंगे.

कर्ज़ नीति

दरअसल कंपनियों के लिए दुनिया भर में व्यापार करने के जोखिम काफ़ी बढ़ गए हैं.

डीप वैल्यू के ट्रेडर स्टीफ़न गुइलफ़ॉएल कहते हैं, "दुनिया भर में व्यापार करने वाले कंपनियों के लिए मुश्किल हो गई हैं. इसके चलते वो बहुत सारी चीज़ें बहुत सारे लोगों को बेच नहीं पाएंगे."

साल 2008-09 की मंदी के बाद जब पश्चिमी देशों के पास पैसे की कमी थी तो चीन की अर्थव्यवस्था को निर्माण और निवेश में आए ऐसे उछाल ने रफ़्तार दी थी, जो दुनिया में पहले कभी नहीं देखी गई थी.

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इसका आधार ख़तरनाक तेजी से दिए गए उधार थे.

अब बाज़ार में डर इस बात का है कि जो भी ऊपर चढ़ता है वो एक दिन नीचे ज़रूर आता है.

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