ये कूटनीति थी या कबड्डी?

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1965 की जंग की तरह भारत और पाकिस्तान के बीच ताज़ा झड़पें हार जीत के फ़ैसले के बिना ख़त्म हो गईं, न पाकिस्तान ने बात ख़त्म की, न हिन्दुस्तान ने शुरू, बस इस नाम के 'इंगेजमेंट' ने ख़ुद-ब-ख़ुद दम तोड़ दिया.

क़त्ल तो हुआ लेकिन क़ातिल कोई नहीं.

हिन्दुस्तानी अख़बारों में हिन्दुस्तान जीता, पाकिस्तानी मीडिया में पाकिस्तान. इस मैच में न्यूट्रल अम्पायरों को मैदान में उतरने की इजाज़त नहीं थी. लेकिन अगर कभी .... इतिहास लिखा गया तो कुछ सवाल ज़रूर पूछे जाएंगे.

कटूनीति कबड्डी में कैसे तबदील हो गई?

जब उफ़ा में बातचीत दोबारा शुरू करने का फ़ैसला हुआ तो क्या किसी को याद नहीं था कि पिछले साल बातचीत का सिलसिला टूटा क्यों था? क्या दोनों ये मान के चल रहे थे कि बातचीत वाले दिन हुर्रियत नेताओं की कहीं और दावत होगी?

पाकिस्तान उच्चायोग की तरफ़ से उन्हें दावत जाएगी और वो कहेंगे कि जनाब हमारे मोहल्ले में एक बच्चे का मुंडन है, पड़ोस की बात है, उसमें भी शिरकत ज़रूरी है, आपसे फिर कभी मुलाक़ात होगी.

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Image caption पिछले साल से रुकी बातचीत दोनों नेताओं की उफ़ा में भेंट के बाद फिर से शुरू होनेवाली थी.

तो रणनीति क्या थी? इत्तेफ़ाक़ किस बात पर हुआ था? अगर ये बात ध्यान में नहीं आई तो कूटनीति की इससे बड़ी नाकामी क्या हो सकती है? तो अगर आया था तो फ़ैसला क्या हुआ था? और अगर समझौता हुआ था तो उससे पीछे कौन हटा?

कश्मीर उफ़ा में तय हुए एजेंडे में क्यों शामिल नहीं था?

क्या पाकिस्तानी राजनीतिज्ञों ने कहा कि पूर्व में एजेंडे में बहुत बार कश्मीर को शामिल करके देख चुके, बात आगे नहीं बढ़ती, क्यों न इस बार कीवर्ड का इस्तेमाल सिरे से किया ही न जाए, हो सकता है कि बातचीत ज़्यादा ख़ुशगवार माहौल में हो, मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए कश्मीर का ज़िक्र कर लेंगे वरना संयुक्त राष्ट्र महासभा में दोनों नेताओं की मुलाक़ात होनी ही है, बात वहां निपट जाएगी.

लेकिन जो लोग कूटनीति की बारिकियों को जानते हैं वो आपको बताएंगे कि इस तरह के एजेंडे को तय करने के लिए एक-एक शब्द पर लड़ाई होती है, हर जुमले को जैसे दूरबीन के नीचे रखकर देखा जाता है, पहले से सोचा जाता है कि इसका क्या मतलब निकाला जा सकता है, जो कुछ शामिल किया जाता है वो बहुत सोच-समझकर किया जाता है और जो सोच एजेंडे में शामिल नहीं की जाती है वो भी बहुत सोच समझकर.

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तो कश्मीर का ज़िक्र क्या जल्दी में छूट गया था? बीते सप्ताह इस बात का जितना विश्लेषण हुआ है उस पर पूरी की पूरी किताब लिखी जा सकती है. लेकिन एक भारतीय राजनयिक का मानना है कि ये भारत के आग्रह पर हुआ होगा. कश्मीर का ज़िक्र न हो और बातचीत का एजेंडा आतंकवाद हो तो भारत को दोबारा बातचीत शुरू करने का बहाना मिल सकता है.

लेकिन जब भारत में इसे बड़ी कामयाबी और पाकिस्तान में कश्मीर के हितों के साथ ग़द्दारी के तौर पर पेश किया जाने लगा तो बात बिगड़ती चली गई.

कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कभी-कभी बड़ी पते की बात कहते हैं. पिछले सप्ताह उन्होंने कहा दिया था कि दोनों मुल्कों की सरकारें ख़ुद ही इस बातचीत को तोड़ना चाहती हैं.

जब बातचीत बिगड़ने लगी तो क्या नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ़ के फ़ोन ख़राब थे.

दोनों नेता एक दूसरे को ईद की मुबारक बाद देते हैं, क्रिकेट के मैच के पहले बेहतर कामना का संदेश भेजते हैं, तो जब नज़र आ रहा था कि मुलाक़ात ख़तरे में है और ये भी मालूम होगा कि दोबारा बातचीत शुरू करना आसान न होगा तो फ़ोन उठाकर सीधे-सीधे बातचीत क्यों ना हुई?

वार्ता की तारीख़ आगे क्यों नहीं बढ़ाई गई? ये कहना कितना मुश्किल था कि एजेंडे को लेकर इतना विवाद है, लिहाज़ा बातचीत को कुछ दिनों के लिए स्थगित किया जा रहा है. अगर ऐसा होता तो किसी को फ़ैसला न करना पड़ता कि कौन हारा कौन जीता और ना ही बातचीत दोबारा शुरू करने के लिए किसी को पहले करनी पड़ती.

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लेकिन मसला ये है कि कूटनीति कहां ख़त्म होती है और कबड्डी कहां शुरू इसकी कोई लाईन ऑफ़ कंट्रोल नहीं है , ये लाईन पूरी तरह आउट ऑफ़ कंट्रोल है और इसी लाईन के ईर्द-गिर्द रहनेवाले तनाव का नतीजा भी भुगतेंगे.

अब बात दोबारा कैसे शुरू होगी? लगता नहीं कि उफ़ा के बाद किसी एजेंडे पर सहमति हो सके. और क्या ऐसा हो सकता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत होने वाली हो और पाकिस्तान के राजदूत की ओर से हुर्रियत नेताओं को निमंत्रण न भेजा जाए? फ़िलहाल तो ये मुश्किल लगता है.

किसी एक को अपनी ज़िद से पीछे हटना होगा, या कम से कम उसमे नरमी करनी होगा. बुरी ख़बर ये है कि दोनों देशों ने इतना सख़्त रूख़ अख़्तियार कर लिया है कि उसकी कोई उम्मीद फ़िलहाल नज़र नहीं आती.

हमारी सलाह है कि फ़िलहाल बातचीत 'स्काईप' या 'पेटाईम' पर की जाए, जब बात में तल्ख़ी बढ़ने लगे या बात में मज़ा न आ रहा हो तो 'म्यूट' का बदन दबाएं और दूसरे कामों में लग जाएं.

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