कश्मीर पर क्यों चुप है यूएन: पाक मीडिया

  • 30 अगस्त 2015
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भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव लगातार पाकिस्तान के उर्दू मीडिया की सुर्खियों में बना हुआ है.

‘जंग’ के मुताबिक़, पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने संकेत दिया है कि प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र महासभा की अगली बैठक में उठाएंगे और दुनिया को बताएंगे कि भारत किस तरह शांति वार्ता से कन्नी काट रहा है.

अख़बार जहां भारत पर कश्मीर के लोगों को ज़ोर ज़बरदस्ती से ग़ुलाम बनाए रखने का आरोप लगाता है, वहीं इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर भी सवाल उठाता है.

अख़बार की टिप्पणी है कि संयुक्त राष्ट्र इंडोनेशिया से पूर्वी तिमोर की आज़ादी के लिए जब अपने इतने सारे प्रस्तावों पर अमल करा सकता है तो कश्मीर को लेकर वो चुप क्यों है?

‘मोदी से मुलाक़ात नहीं’

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वहीं ‘एक्सप्रेस’ में पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के इस बयान को तवज्जो दी गई है कि न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की मुलाक़ात का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है और न ही भारतीय पीएम मोदी से मुलाक़ात की कोई ख़्वाहिश है.

अख़बार लिखता है कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बेहतरी की जो भी उम्मीद उभरती है, वो कुछ समय बाद ही भारत के आक्रामक रवैये के कारण टूट जाती है.

‘नवा-ए-वक़्त’ ने अमरीकी अख़बार ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ की इस रिपोर्ट पर संपादकीय लिखा है कि अगले पांच से दस बरसों में पाकिस्तान परमाणु हथियारों के मामले में भारत से बहुत आगे निकल जाएगा और उसके परमाणु हथियारों की संख्या 350 तक पहुंच जाएगी.

अख़बार लिखता है कि अगर अमरीकी थिकटैंकों के अनुमान पर आधारित इस रिपोर्ट से दुनिया में खलबली पैदा होती है, तो वो विश्व शांति की ख़ातिर भारत के आक्रामक इरादों पर लगाम लगाए.

अख़बार के मुताबिक़, भारत के जुनून के मद्देनज़र देश की रक्षा के लिए एटमी हथियार हासिल करने से लेकर कोई भी क़दम उठाना पाकिस्तान की मजबूरी होगी.

पाक-अफ़ग़ान तनाव

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अख़बार ‘जसारत’ ने पाक-अफ़ग़ान रिश्तों में आए तनाव पर लिखा है कि एक तरफ़ अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी शुरू कर दी है तो दूसरी तरफ़ काबुल में पाकिस्तानी दूतावास के कर्मचारियों के लिए ख़तरे पैदा हो रहे हैं.

लेकिन अख़बार के मुताबिक़, इससे अफ़ग़ानिस्तान पर हुकूमत कर रहे और उनके समर्थकों को कुछ हासिल नहीं होगा.

अख़बार का ये भी आरोप है कि पाकिस्तान में अस्थिरता फैलाने और चीन के साथ उसकी आर्थिक कोरिडोर परियोजना में रोड़े अटकाने के लिए अमरीका ने भारत को आगे कर दिया है.

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वही रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ के इस बयान को प्रमुखता दी कि ‘दहशतगर्दों की मदद करने वालों को बेनक़ाब करके रहेंगे’.

अख़बार लिखता है कि दहशतगर्दों के ये मददगार देश के भीतर अलग-अलग जगहों पर मौजूद हो सकते हैं और इन्हें अंदरूनी और बाहरी तत्वों की मदद हासिल है.

इस सिलसिले में भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ की भूमिका पर एक बार फिर सवाल उठाए गए हैं.

‘कोई क़दम तो उठाना होगा’

रुख़ भारत का करें तो रोज़नामा ‘ख़बरें’ ने सीमा और नियंत्रण रेखा पर तनाव के मद्देनज़र लिखा है कि दोनों देशों की सरकारें कम से कम सरहद के पास बसे आम लोगों का लिहाज़ करते हुए इस मामले में कोई स्थायी रणनीति अपनाएं.

अख़बार के मुताबिक़ अपने दबदबे और कंट्रोल के लिए सेनाएं आपस में लड़ें, ये बात तो मानी जा सकती है, लेकिन उनकी गोलियों का निशाना निर्दोष आम लोग बनें, ये कौन सा कंट्रोल और कौन सी रणनीति है.

अख़बार भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को ख़तरनाक बताते हुए लिखता है कि इसके हल के लिए कोई न कोई क़दम तो उठाना होगा.

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गुजरात में पटेल आरक्षण आंदोलन और उसे लेकर हुई हिंसा पर ‘हमारा समाज’ का संपादकीय है- बाइब्रेंट गुजरात नहीं, वाइलेंट यानी हिंसक गुजरात.

अख़बार लिखता है कि शांति बनाए रखने की प्रधानमंत्री मोदी की अपील जनता और प्रदर्शनकारियों पर तो प्रभावी रही लेकिन पुलिस ने इसे बिल्कुल नज़रअंदाज़ किया.

पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए अख़बार लिखता है कि दंगे को रोकने के लिए पुलिस ने ताक़त इस्तेमाल की, जिसमें नौ लोग मारे गए और कई ज़ख्मी हो गए.

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