नेपाल के तराई क्षेत्र में नाराजगी क्यों?

  • 4 सितंबर 2015
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नेपाल में जैसे-जैसे संविधान जारी करने का वक्त करीब आ रहा है, वैसे-वैसे कुछ क्षेत्रों में नाराज़गी भी बढ़ती जा रही है.

खास कर नेपाल का मैदानी इलाक़ा जिसे तराई क्षेत्र कहा जाता है, आजकल वहाँ के ज़िलों में नाराज़गी कुछ ज्यादा देखने को मिल रही है.

तराई में कुल मिलाकर 22 ज़िले हैं, जहाँ की आबादी एक करोड़ से ज्यादा है, तराई के इलाक़े को ही मधेश या वहाँ रहने वाले लोगों को मधेशी कहा जाता है.

नाराज़गी की वजह

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मधेशी लोगों की नाराज़गी की मुख्य वजह ये है वहाँ अब पहाड़ी लोग बड़ी संख्या में रह रहे हैं, मधेशी लोगों का आरोप है कि काठमांडू से चलने वाली सरकार में उनकी सहभागिता नहीं है.

नेपाल के अधिकतर संसाधन और बड़ी आबादी मधेश इलाक़े में हैं लेकिन उनका आरोप है कि सत्ता पर नियंत्रण पहाड़ी लोगों का है. मधेशी जनता में नाराज़गी तब तेज़ी से बढ़ी जब चार प्रमुख राजनीतिक दलों ने यह सहमति बनाई कि संघीय नेपाल में 6 प्रदेश होंगे.

उन चार दलों में दो सत्ताधारी दल नेपाली कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले), प्रमुख विपक्षी दल एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और मधेशी जनाधिकार फोरम (लोकतांत्रिक) शामिल थी.

मधेशी जनाधिकार फोरम (लोकतांत्रिक) के प्रमुख विजय कुमार गच्छदर हैं जो आदिवासी थारु समुदाय से हैं और कई बार मंत्री भी रह चुके हैं. चार दलों के प्रमुख नेताओं ने छह प्रदेशों को लेकर जो सहमति बनाई थी उसी के बाद तराई की जनता में आक्रोश बढ़ने लगा.

मधेशी चाहते हैं कि तराई के सारे ज़िलों को मिलाकर एक प्रदेश या दो प्रदेश बनाए जाएँ और उनको पहाड़ के ज़िलों से अलग रखा जाए. लेकिन प्रमुख चार दलों का कहना है कि प्रदेश इस तरह से नहीं बनाया जा सकता कि कहीं सारे संसाधन हों और कहीं कुछ भी न हो.

जब तराई के 8 ज़िलों को मिला कर 6 प्रदेशों में एक ऐसा प्रदेश बनाने का प्रस्ताव किया गया था, जो पहाड़ से अलग हो, इसको लेकर तराई के दलों में और नाराज़गी बढ़ गई.

बरकरार रखा जाए

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यहीं नहीं, बल्कि उन लोगों के साथ-साथ देश के मध्य-पश्चिम इलाक़े के लोग और राजनीतिक पार्टियाँ भी काफी नाराज़ हो गईं क्योंकि मध्य-पश्चिम के दल ये चाहते थे कि नए प्रदेश बनाने के लिए उनके इलाक़े को न तोड़ा जाए.

फिर मजबूरन चार दलों के प्रमुख नेताओं ने अपना फैसला वापस ले लिया और छह की जगह सात प्रदेश बनाने के लिए राजी हो गए.

सात प्रदेशों में से एक प्रदेश मध्य-पश्चिम होगा, इससे वहाँ के लोग तो खुश हो गए लेकिन आदिवासी थारु लोगों में सात प्रदेशों को लेकर बहुत नाराज़गी पैदा हो गई.

गठबंधन

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वे लोग आंदोलन पर उतर आए और इस कदम से तराई नेताओं को राहत मिल गई, दोनों समुदायों की नाराज़गी उन्हें एक गठबंधन में ले आई.

फिर दोनों मिलकर अभी आंदोलन कर रहे हैं, तकरीबन 3 सप्ताह से, पश्चिम नेपाल के टिकापुर में कर्फ्यू के बावजूद कुछ रोज़ पहले थारु प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए.

उनमें से कुछ जगहों को दंगाग्रस्त क्षेत्र भी घोषित कर दिया गया.

उसके बावजूद थारु समुदाय और तराई के नाराज़ दलों के नेता अपना आंदोलन जारी रखे हुए हैं.

सरकार कई बार वार्ता की अपील कर चुकी है लेकिन आंदोलनकारियों ने वार्ता का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया है.

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