फिर नाख़ून तेज़ कर रहा है भारत: पाक मीडिया

  • 6 सितंबर 2015
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पाकिस्तान की अपने दो अहम पड़ोसी देशों भारत और अफ़ग़ानिस्तान के साथ रिश्तों में तल्ख़ी वहाँ के उर्दू मीडिया में लगातार सुर्ख़ियां बटोर रही है.

‘नवा-ए-वक्त’ की तीखी टिप्पणी है – शांति को पाकिस्तान की कमज़ोरी समझने वाले भारत को मुंह तोड़ जवाब देना ही वक़्त की ज़रूरत है.

अख़बार का ये संपादकीय भारतीय सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह के इस बयान पर है कि 'भारतीय सेनाओं को संक्षिप्त लड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए.'

अख़बार ने पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ के इस बयान को सराहा है कि भारत छोटी या बड़ी, जिस भी तरह की जंग थोपने की कोशिश करे, उसे मुंह तोड़ जबाव दिया जाएगा.

अख़बार ने फिर एटमी हथियारों के इस्तेमाल की धमकी देते हुए लिखा है कि जंग हुई तो वो पारंपरिक नहीं रहेगी.

‘भारत को करें मजबूर’

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रोज़नामा ‘दुनिया’ लिखता है कि भारत के साथ दोस्ती और अमन की इच्छा रखने वाले प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ भी अब तो यह कहने को मजबूर हैं कि भारत का रवैया शांति के लिए ख़तरा है.

अख़बार कहता है कि अलग अलग मंचों पर इस बात को उठाने की ज़रूरत है कि भारत पाकिस्तान से 1965 और 1971 में जंग कर चुका है और अब वो एक बार फिर अपने नाख़ून तेज कर रहा है.

वहीं ‘एक्सप्रेस’ की राय है कि पाकिस्तान विश्व समुदाय से कहे कि वो भारत को बातचीत की मेज़ पर आने के लिए मजबूर करे.

भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय सेना पर 'ज़ुल्म ढाने' का इल्जाम लगाते हुए अख़बार इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की वकालत करता है.

अख़बार के मुताबिक़ इससे भी भारत पर दबाव बढ़ेगा और वो बातचीत के लिए मजबूर होगा और बातचीत के अलावा कोई चारा है भी नहीं.

'भारत का दख़ल'

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वहीं ‘जसारत’ ने पाक अफ़ग़ान रिश्तों में तनाव को दूर करने के लिए काबुल में अफ़ग़ान नेताओं से पाकिस्तानी विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज़ की मुलाकातों पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार इस तनाव के लिए कहीं ना कहीं भारत और अमरीका को ज़िम्मेदार बताता है.

अख़बार के मुताबिक़ अमरीका ने अशरफ़ ग़नी की सरकार में उन्हीं के प्रतिद्वंद्वी रहे अब्दुल्ला अब्दुल्ला को जगह दिलाकर वहां भारत समर्थक तत्वों को अपना काम करने की आज़ादी दे दी है.

अख़बार आरोप लगाता है कि अज़ीज़ ने राष्ट्रपति ग़नी को पाकिस्तान में भारत की दख़लंदाजी के सबूत दिए.

वहीं रोज़नामा ‘इंसाफ़’ ने पैग़ंबर मोहम्मद पर ईरान में बनी फ़िल्म की कड़ी आलोचना की है.

अख़बार लिखता है कि चार करोड़ डॉलर की लागत से सात साल में बनी यह फ़िल्म मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचाती है और पाकिस्तान को ईरान से अपने संबंधों का इस्तेमाल कर इसे रुकवाना चाहिए.

‘मंत्रियों की क्लास’

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रुख़ भारत का करें तो ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ ने आरएसएस और भाजपा की समन्वय बैठक पर अपने संपादकीय को शीर्षक दिया है- केंद्रीय मंत्रियों की क्लास.

अख़बार कहता है कि आख़िर एक केंद्रीय मंत्री ऐसे संगठन को अपने मंत्रालय से जुड़ी जानकारियां क्यों दे रहा है जिसकी कोई संवैधानिक हैसियत नहीं है.

अख़बार का सवाल है कि आख़िर संघ किस हैसियत से केंद्रीय मंत्रियों की क्लास ले रहा है, क्या ये कोई चुना हुआ संगठन है या फिर चुनी हुई सरकार के ज़रिए गठित कोई सलाहकार संस्था है?

अख़बार का आरोप है कि अब ये साफ़ हो गया है कि संघ न सिर्फ़ भाजपा को नियंत्रित करता है बल्कि सरकार बनने पर उसकी नीतियां भी तय करता है.

वहीं ‘हमारा समाज’ ने बिहार में जनता परिवार वाले गठबंधन से समाजवादी पार्टी के अलग हो जाने के नफ़ा नुक़सान पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार कहता है कि बिहार में हालात ऐसे करवट ले रहे हैं कि महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

अख़बार की राय है कि एक तरफ़ समाजवादी पार्टी के फैसले से बीजेपी को फायदा हो सकता है, वहीं जेडीयू की चिंता असदउद्दीन औवेसी भी बढ़ा रहे हैं जो बिहार में अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे हैं.

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