'शरणार्थियों के लिए डेनमार्क में हमदर्दी नहीं'

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इस हफ़्ते तक़रीबन 300 शरणार्थियों को जर्मनी की सीमा पर रोककर ट्रेन से उतार दिया गया. इनमें ज़्यादातर सीरिया और इराक़ से आए हुए थे जिनमें स्त्रियों और बच्चों की तादाद अधिक थी.

वे स्वीडन जा रहे थे, जिसने डेनमार्क की तुलना में अधिक मानवीय दृष्टिकोण अपनाया है. पर बीच रास्ते में डेनमार्क पड़ता है, जहां इन शरणार्थियों को जाने का कोई हक़ नहीं है और जो इन्हें स्वीकार भी नहीं करना चाहता है.

'काले नापसंद'

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डेनमार्क की छवि एक ऐसे देश के रूप में उभर रही है जो काले शरणार्थियों को नापसंद करता है. इसलिए ज़्यादातर शरणार्थी वहां अपना पंजीकरण भी नहीं करवाना चाहते हैं.

शुरुआती गतिरोध के बाद अंत में उन्हें राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे-किनारे चलते हुए स्वीडन जाने की इज़ाज़त मिल गई. उन्हें परिवहन का कोई साधन नहीं मुहैया कराया गया.

कुछ लोगों ने उन्हें खाने पीने की चीजें दीं, कुछ लोगों ने उन्हें परिवहन का साधन भी दिया. हालांकि डेनमार्क में ऐसा करना ग़ैर क़ानूनी है.

इन शरणार्थियों में ज़्यादातर फ़िलहाल 500 किलोमीटर दूर स्वीडन की ओर पैदल ही बढ़े जा रहे हैं. डेनमार्क में इस समय गर्मी नहीं है.

इस समय वहां रात में दिल्ली के दिसंबर जैसी ठंड पड़ रही है. बारिश भी हो सकती है और यह घंटों चल सकती है.

'घर लौट जाओ'

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हालांकि डेनमार्क के कुछ लोगों ने शरणार्थियों की मदद की है, पर ज़्यादातर लोगों ने शरणार्थियों से कहा है कि वे अपने 'घर' लौट जाएं.

लेकिन कौन से घर? बमबारी में उनके घर का वजूद तो ख़त्म हो चुका है. उनके पास घर होता तो वे इस समय डेनमार्क में नहीं होते.

मुख्यधारा की मीडिया के कुछ लोगों ने अपना असली चेहरा दिखा दिया है.

वे इन शरणार्थियों को 'प्रवासी' कह रहे हैं. 'हमारा देश जिस लड़ाई में शामिल है वहां से भाग रहे शरणार्थी' कहने की तुलना में 'हमारी नौकरी छीनने आए अप्रवासी' कहना ज़्यादा आसान है.

लेखिका सुज़ेन ज़रेहुस जैसी पढ़ी लिखी समझे जाने वाली महिलाओं का रवैया भी इस मुद्दे पर साफ़ नहीं है.

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ज़रेहुस इन शरणार्थियों के राजमार्ग पर चलने से नाराज़ हैं. उनका तर्क है कि इस वजह से डेनमार्क के लोग सड़कों पर नहीं चल सकते.

वह इस पर गुस्सा नहीं हैं कि उनकी सरकार ने इन शरणार्थियों को स्वीडन तक पंहुचाने के लिए दो बसें भी मुहैया नहीं करवाईं. उन्होंने यह विकल्प सुझाया ज़रूर था.

आज यूरोप में शरणार्थियों के मुद्दे पर चल रहे विमर्श में कुछ न कुछ गड़बड़ ज़रूर है. इसकी जड़ में नस्लवाद है.

'वे गोरे नहीं हैं'

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इन शरणार्थियों का कोई महत्व इसलिए नहीं है कि वे गोरे नहीं हैं. यूरोप के लोग मानवाधिकार और सहानुभूति को लेकर काफ़ी हायतौबा मचाते हैं.

पर अभी भी यूरोप में कई लोग हैं, जो उन लोगों से सहानुभूति नहीं रखते जो उनकी तरह ही नहीं हैं.

ऐसे लोगों मे यूरोपीय अकेले नहीं हैं. एशियाई, अफ़्रीकी, अमरीकी, हर समुदाय में ऐसे लोग मौजूद हैं, जो दूसरों के प्रति सहानुभूति नहीं रखते.

आख़िर में जब इतिहास लिखा जाएगा, मुमकिन है कि हमारी क़ब्र पर लगे पत्थर पर लिखा जाए, "इनमें सहानुभूति की कमी थी. वे एक दूसरे को एक-एक कर मरते हुए देखते रहे."

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