लेबर पार्टी पर फिर से चढ़ा लाल रंग

  • 13 सितंबर 2015
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ब्रिटेन में लेबर पार्टी के नेतृत्व की लड़ाई में वामपंथी नेता जेरेमी कोर्बिन की ज़बरदस्त जीत से दो दिन पहले जर्मनी के कामगारों ने 24 बरस पहले ज़मीन में दफ़ना डाली गई लेनिन की मूर्ति को खोद निकाला और अब उसे एक म्यूज़ियम में स्थापित किया जा रहा है.

इन दोनों घटनाओं में परस्पर कोई संबंध नहीं है और न ही इन्हें समाजवाद की वापसी का संकेत मानने की भूल करनी चाहिए. मगर दोनों घटनाएँ ये ज़रूर बताती हैं कि राजनीतिक मर्सिए (किसी की मौत पर लिखी जाने वाली कविता) पढ़ने में जल्दबाज़ी से काम नहीं लिया जाना चाहिए.

टोनी ब्लेयर के नेतृत्व में बारह बरस पहले जिस लेबर पार्टी ने अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के साथ मिलिट्री गठजोड़ करके इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया, आज उसी लेबर पार्टी के सदस्यों ने इराक़ युद्ध के कट्टर और मुखर विरोधी रहे धुर वामपंथी नेता जेरेमी कोर्बिन को लगभग 60 प्रतिशत वोट देकर पार्टी की कमान सौंपी है.

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राजनीतिक पंडित चकित हैं कि आख़िर ये चमत्कार हुआ कैसे. क्योंकि अस्सी के दशक में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने ट्रेड यूनियनों को हाशिए पर डालते हुए वामपंथी-समाजवादी राजनीति को हास्यास्पद और पुरातनपंथी साबित कर डाला था.

'अधपगले वामपंथी'

उसके बाद से अगर कोई भी राजनेता किसी भी तरह से ब्रिटेन में समतावादी उसूलों की बात करता था तो उसे ‘लूनी लेफ़्टिस्ट’ या अधपगला वामपंथी क़रार दिया जाता था. लंदन के मेयर रहे केन लिविंग्स्टन को उनकी वामपंथी राजनीति के कारण ही टेबलॉयड अख़बार 'रेड केन’ कहते रहे हैं.

सोवियत संघ के विघटन और यूरोप में नब्बे के दशक में आए कम्युनिज़्म-विरोधी तूफ़ान में समतावादी विचार और समतामूलक समाज की बात करने को 'ओल्ड फ़ैशन्ड’ कहा जाने लगा.

ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नेतृत्व की लड़ाई से पहले भी उसकी विरोधी कंज़र्वेटिव पार्टी के नेताओं की ओर से कम, ख़ुद लेबर पार्टी के खुले बाज़ार के हामी दक्षिणपंथी नेताओं की ओर से जेरेमी कोर्बिन की ज़्यादा खिल्ली उड़ाई जाती रही.

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टोनी ब्लेयर ने आख़िरी दम तक जेरेमी को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने कहा कि जेरेमी को चुना जाना लेबर पार्टी को खाई में धकेलने जैसा होगा. ब्लेयर ने उनके समर्थकों की हँसी उड़ाते हुए कहा कि वो लोग एक समानांतर यथार्थ में रह रहे हैं.

ब्लेयर के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने लेबर पार्टी के ही गॉर्डन ब्राउन ने परोक्ष तौर पर जेरेमी कोर्बिन पर हमला करते हुए कहा कि लेबर पार्टी को सरकार बनाने में सक्षम पार्टी बननी चाहिए, न कि लगातार विरोध-प्रदर्शन करने वाली पार्टी.

कोर्बिन की राजनीति

सत्तारूढ़ कंज़रवेटिव पार्टी के नेता और लंदन के मेयर बोरिस जॉनसन ने तो बाक़ायदा एक लेख लिखकर उत्सव सा मना डाला कि नेतृत्व की दौड़ में जेरेमी कोर्बिन का होना ही कंज़र्वेटिव पार्टी के लिए कितने आह्लाद की बात है. लेख का निहितार्थ था कि कोर्बिन जीत गए तो लेबर पार्टी का गर्त में जाना तय है.

पर कौन हैं जेरेमी कोर्बिन जिन्हें उन्हीं की पार्टी के टोनी ब्लेयर जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त नेता और विरोधी कंज़रवेटिव पार्टी लगभग एक सुर में देश के लिए और हर परिवार के लिए ख़तरा बताते है लेकिन लेबर पार्टी के आम सदस्य उन्हें कंधों पर उठा लेते हैं?

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आख़िर जेरेमी कोर्बिन के ऐसे कौन से सिद्धांत हैं जिन्हें लेबर या कंज़रवेटिव पार्टी का दक्षिणपंथी धड़ा स्वीकार नहीं करता लेकिन लेबर पार्टी के 59.5 प्रतिशत सदस्य उन्हीं सिद्धांतों का समर्थन करते हैं?

जेरेमी कोर्बिन 1983 से ही लंदन की इस्लिंग्टन नॉर्थ संसदीय सीट से जीतते आ रहे हैं और जब टोनी ब्लेयर, जैक स्ट्रॉ और गॉर्डन ब्राउन ब्रिटेन ही नहीं पूरी दुनिया को बता रहे थे कि सद्दाम हुसैन के पास महाविनाश के हथियार हैं और वो सिर्फ़ 45 मिनट के भीतर ब्रिटेन पर हमला करने में सक्षम है और इसी कारण इराक़ से युद्ध अनिवार्य है, उस वक़्त टोनी बेन जैसे लेबर पार्टी के नेताओं के साथ जेरेमी कोर्बिन लंदन की सड़कों पर लाखों लोगों के युद्ध-विरोधी प्रदर्शन में शिरकत कर रहे थे.

परमाणु हथियारों का विरोध

वो इराक़ पर ब्रिटेन और अमरीका के संयुक्त हमले से पहले बने युद्ध-विरोधी मोर्चे - स्टॉप द वॉर - के शुरुआत से ही अगुवा रहे हैं. उन्होंने लेबर पार्टी के सांसद रहते हुए अपनी पार्टी का विरोध किया और संसद में युद्ध के ख़िलाफ़ वोट दिया.

कोर्बिन लगातार परमाणु हथियारों का विरोध करते रहे हैं और उन्होंने ब्रिटेन के मिसाइल सुरक्षा कवच ट्राइडेंट को ख़त्म करने की अपील की है.

यही नहीं, कोर्बिन बैंकों के राष्ट्रीयकरण के हिमायती रहे हैं, ब्रिटेन में रेलवे के निजीकरण के ख़िलाफ़ उन्होंने अभियान चलाया है. वो अमरीकी नीतियों के आलोचक भी रहे हैं.

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सन 2013 में एक युद्ध-विरोधी सम्मेलन में कोर्बिन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय भूमिका निभाने की सनक में ब्रिटेन की सरकारें वही करती रही हैं जो अमरीका उनसे करवाना चाहता है.

इसी सम्मेलन में उन्होंने कहा, “अमरीका की आक्रामक विदेश नीति विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ के साथ शुरू हुई अदावत का नतीजा थी. पर 1990 के बाद ये सब बदल गया, इसलिए हथियार और हवाई जहाज़ बनाने वालों और फ़ौजी जरनैलों की भूख शांत करने के लिए कोई और कारण ढूँढना ज़रूरी था. 11 सितंबर 2011 को न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुई घटना से उन्हें ये मौक़ा मिल गया.”

एनएचएस के पक्के हिमायती

ब्रिटेन में स्वास्थ्य सेवाएँ मुफ़्त हैं. मगर खुले बाज़ार का समर्थन करने वाले लगातार नेशनल हेल्थ सर्विस को नाकारा बताकर इसे ख़त्म करना चाहते हैं. जेरेमी कोर्बिन एनएचएस के पक्के हिमायती हैं. वो मुफ़्त शिक्षा का भी समर्थन करते रहे हैं.

ब्रिटेन की राजनीति के दक्षिणपंथी हिस्से को इन सब नीतियों से 'समाजवाद की गंध' आती है.

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इन नीतियों का समर्थन करने वाले जेरेमी कोर्बिन को पहले प्रभावहीन कहकर ख़ारिज किया गया, फिर उनका बढ़ता समर्थन देख उनकी और उनके समर्थकों की खिल्ली उड़ाई गई और अंत में उन्हें ख़तरनाक बताया गया.

अंत में एक महत्वपूर्ण सवाल: अब जबकि लेबर पार्टी की कमान जेरेमी कोर्बिन के हाथों में है, क्या वो उतने रैडिकल, उतने युद्ध-विरोधी और उतने कामगार-समर्थक रह पाएँगे जितने एक बैक बेंचर सांसद के तौर पर थे?

यही सवाल तय करेगा कि आने वाले बरसों में ब्रिटेन की राजनीतिक आबोहवा बदलेगी या फिर बाज़ार का बोलबाला बना रहेगा और समतामूलक समाज के विचार को एपिंग फ़ॉरेस्ट के बियाबान में ज़मीदोज़ कर दिया जाएगा.

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