'मुहाजिरों' की उर्दू, पाक की राष्ट्रभाषा

  • 15 सितंबर 2015
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जहाँ कई देश अंग्रेज़ी भाषा को अपना रहे हैं, वहीं पाकिस्तान दूसरी दिशा में जा रहा है और वहाँ की सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि उर्दू को आधिकारिक भाषा बनाया जाए.

उर्दू सुंदर है, बेहद अर्थपूर्ण है और ये भारतीय उपमहाद्वीप में 200 से 300 साल तक बेहद संपन्न साहित्य का माध्यम रही है.

उर्दू पाकिस्तान में बहुतायत से बोली जाती है ख़ासकर शहरी इलाक़ों में.

लेकिन यह भी हक़ीक़त है कि पाकिस्तान में किसी भी इलाक़े को मूल रूप से उर्दू बोलने वाले क्षेत्र के रूप में नहीं माना जा सकता.

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उर्दू शासकों की विवादित इच्छाओं का शिकार भी रही है, जिन्होंने प्रशासनिक, राजनीतिक और भाषाई एकरूपता के लिए स्थानीय संस्कृति को तरजीह दी.

'बांग्लादेश का बीज बोया'

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कई लोगों का मानना है कि पाकिस्तान में अलगाववाद के बीज तभी पड़ गए थे, जब राष्ट्र के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने 1948 में घोषणा की थी कि उर्दू पाकिस्तान की सरकारी भाषा होगी, हालाँकि पूर्वी पाकिस्तान बंगाली को अपनी प्रांतीय भाषा के रूप में इस्तेमाल कर सकता है.

पाकिस्तान को उम्मीद थी कि उर्दू के बाद बंगाली उसकी दूसरी भाषा होगी, लेकिन 1971 में यही पूर्वी पाकिस्तान, पाकिस्तान से अलग हो गया और बांग्लादेश के रूए में एक नए देश का जन्म हुआ.

पाकिस्तान में कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान फ़ैसले को उसी नीति को आगे ले जाता हुए देखते हैं.

एक यूज़र ने ट्विटर पर अपनी नाराज़गी जताते हुए कहा, “उर्दू बहुमत की भाषा नहीं है, फिर भी पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा है. भाषा में भी अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों पर हावी हैं.”

नैना बलूच ने ट्वीट किया, “उर्दू मुहाजिरों (भारत से शरणार्थी) की भाषा है और इसका कोई तुक नहीं है कि देश शरणार्थियों की भाषा को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार करे.”

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'अंग्रेज़ी की जगह उर्दू संभव'

कई दूसरे लोग इस क़दम को पिछले कुछ दशकों में अंग्रेज़ी माध्यम की शिक्षा पर हुए भारी भरकम निवेश को धक्का पहुँचाने के क्रम में देखते हैं.

पेशावर स्थित डॉन अख़बार के क़ानूनी मामलों के पत्रकार वसीम अहमद शाह कहते हैं, “ये 1960 और 70 का दशक नहीं है जब अंग्रेज़ी भाषा सिर्फ़ कुछ व्यवसाई वर्ग या राजनेताओं तक सीमित थी. अब पाकिस्तान के लगभग हर गाँव में अंग्रेज़ी माध्यम का कम से कम एक स्कूल है.”

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पेशावर यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल रिलेशन विभाग के प्रमुख प्रोफ़ेसर इजाज़ ख़ान का कहना है कि उर्दू पर अधिक ज़ोर देने से ये तरक़्क़ी रुक जाएगी और देश दुनिया के उलट चलने लगेगा.

ख़ान कहते हैं, “यह अंग्रेज़ी सीखने की ललक को कमज़ोर करेगा और लंबी अवधि में अमरीका और दूसरे देशों से आर्थिक और राजनीतिक संपर्क कट जाएगा.”

सवाल यह भी है कि क्या अंग्रेज़ी की जगह उर्दू थोपना संभव भी है?

ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह के नोशेरा डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के सीनियर वकील मोहम्मद हारून कहते हैं, “कोर्ट में लाखों की संख्या में दस्तावेज़ अंग्रेज़ी में हैं. मैं नहीं समझता कि इसे उर्दू में अनुवाद करने की प्रशासनिक क्षमता है.”

उर्दू की शब्दावली

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1990 के बाद से कई सरकारों ने सरकारी प्रशासन, न्यायपालिका, सेना और शिक्षा में उर्दू की तकनीकी शब्दावली के लिए कई संस्थाएं गठित की.

2005 में नेशनल लेंग्वेज प्रमोशन डिपार्टमेंट (एनएलपीडी) के प्रोफ़ेसर फ़तेह मोहम्मद मलिक ने कहा कि सरकार अगर चाहे तो अंग्रेज़ी से उर्दू में शिफ़्ट होने के लिए उर्दू की पर्याप्त शब्दावली उपलब्ध है.

मुश्किल ये है कि क्योंकि अधिकतर पाकिस्तानी उर्दू नहीं बोलने वाले हैं, इसलिए उर्दू के कई शब्दों जिनका कि उत्तर भारत, जो कि उर्दू का घर है, में जो अर्थ है, वो पाकिस्तान में अलग हो सकता है.

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डॉन के पेशावर संस्करण के संपादक इस्माइल ख़ान कहते हैं कि इस्तेमाल में आने वाले कई उर्दू शब्दों का इस्तेमाल बहुत हास्यास्पद है.

ख़ान कहते हैं, “जैसे ‘गश्ती’ का मतलब ‘चलते रहना’ या ‘घूमना-फिरना’ होता है, लेकिन यहाँ कई इलाक़ों में इसे ‘यौनकर्मी’ के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है.”

प्रोफ़ेसर इजाज़ ख़ान कहते हैं कि राष्ट्र भाषा का 1960 और 70 के दशक में कोई मतलब था क्योंकि तब देश अपनी पहचान पर ज़ोर दे रहा थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है.

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