भारत का 'यस मैन' नहीं है नेपाल: प्रचंड

एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (माओवादी) के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल उर्फ़ प्रचंड ने कहा है कि उनका देश भारत से असल दोस्ती चाहता है, लेकिन कोई नेपाल को 'यस मैन' के रूप में देखे ये मुमकिन नहीं है.

रविवार को राष्ट्रपति डॉक्टर राम बरन यादव ने नेपाल के संविधान को आधिकारिक तौर पर राष्ट्र को समर्पित किया.

इस संविधान ने दुनिया के एकमात्र हिंदू राष्ट्र नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र में बदल दिया है. सात प्रांतों के इस राष्ट्र में अब 'बहुदलीय प्रजातंत्र' होगा.

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हालांकि कुछ स्थानीय पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं. उनका कहना है कि दक्षिणी नेपाल के मधेसी और थारू जैसे अल्पसंख्यक समूहों की चिंताओं का निवारण नहीं किया गया है.

भारत सरकार ने नेपाल के संविधान पर सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक बयान जारी कर कहा, ''हमने इसका संज्ञान ले लिया है कि नेपाल ने एक संविधान अपनाया है पर हमें चिंता है कि भारत की सीमा से जुड़े इलाक़ों में हिंसा भड़की हुई है.''

इन्हीं मुद्दों पर बीबीसी नेपाली सेवा के महेश आचार्य ने प्रचंड से बात की. उनकी बातचीत के मुख्य अंश.

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Image caption संविधान लागू होने की घोषणा के बाद नेपाल में कई इलाकों में प्रदर्शन हुए

नेपाल में संविधान लागू हुआ है, भारत की प्रतिक्रिया उतनी अच्छी नहीं है?

हमें इससे दुख हुआ है, नेपाली जनता के लंबे संघर्ष और बलिदान के बाद संविधान आया है. नेपाल की संविधान सभा शांति प्रक्रिया के साथ जुड़ी थी. इस प्रक्रिया में भारत का शुरू से ही सहयोग और सदभाव रहा है.

जब संविधान बना तो हमें उम्मीद थी कि भारत को भी गौरव की अनुभूति होगी. वो इसका स्वागत करेगा, लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत को इसे लेकर कुछ आपत्तियां हैं. इसका हमें थोड़ा दुख है.

'यस मैन' नहीं

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आपने कहा कि भारत और चीन को नेपाल की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए. इस बात से आपका क्या मतलब है?

नहीं, ऐसा नहीं है. मैंने कहा कि हम भारत और चीन के असल मित्र होना चाहते हैं. असल मित्र के रूप में भारत की जो चिंताएं हैं, हम सहयोग करने के लिए तैयार हैं. हम उम्मीद करते हैं कि नेपाली जनता की चिंताओं का भारत और नेपाल को भी सम्मान करना चाहिए.

भारत के साथ जो बातचीत हो रही है अगर दोस्ती के रूप में हो रही है तो ठीक है, लेकिन अगर कोई हमें 'यस मैन' के रूप में देखना चाहता है तो वो संभव नहीं है.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष दूत एस जयशंकर नेपाल आए थे. उनसे क्या बातचीत हुई?

एस जयशंकर का कहना था कि भारतीय सीमा के साथ जुड़े नेपाल के तराई क्षेत्र में हिंसा को लेकर भारत चिंतित है.

उनका मुख्य मक़सद ऐसे जान पड़ता है कि वे चाहते थे कि संविधान लागू करने की घोषणा कुछ दिनों के लिए रोक दी जाए और मधेसियों के साथ बातचीत की जाए.

टाइमिंग पर ऐतराज़

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तो आपने इस सुझाव को ठुकरा दिया?

नहीं, हमने इस सुझाव को सीधे-सीधे तो अस्वीकार नहीं किया. मैंने कहा, "हम आपके इस सुझाव पर विचार कर सकते थे, लेकिन क्योंकि अब संविधान निर्माण का काम लगभग पूरा हो चुका है और घोषणा भर बाक़ी है. इसलिए इस प्रक्रिया को अब रोकना मुमकिन नहीं है.''

मैंने उनसे कहा कि आपको या तो इस घोषणा से 15 दिन पहले आना था या 15 दिन बाद. आपके आने की टाइमिंग ठीक नहीं है.

असंतोष कैसे दूर होगा?

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संविधान को लेकर ख़ासकर तराई में असंतोष दिखाई दे रहा है. इसे दूर करने के लिए क्या योजना है?

मैंने सोमवार को भारतीय राजदूत रंजीत रे से बात की है. मैंने उनसे कहा कि हम जितनी जल्दी संभव हो, आंदोलनकारियों के साथ बातचीत करना चाहते हैं. इसमें हम भारत का सहयोग भी चाहते हैं.

मधेसियों की समानुपातिक समावेशिक प्रतिनिधित्व की मांग को संविधान संशोधन के ज़रिए पूरा किया जा सकता है.

इसके अलावा क्षेत्र निर्धारण को आबादी के आधार पर तय करने के लिए भी हम तैयार हैं. साथ ही प्रदेश सीमांकन की मांग को भी आयोग बनाकर सुलझाया जा सकता है.

धोखा नहीं दिया

ये एक मिशन पूरा हुआ है. संविधान के लिए हज़ारों की संख्या में लोगों ने बलिदान किया. बहुत चिंता थी कि कहीं ये दूसरी संविधान सभा भी विफल न हो जाए.

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नौ साल के बाद संविधान की घोषणा हुई. आप कैसा महसूस कर रहे हैं?

जो लोग ये आरोप लगाते हैं कि प्रचंड ने धोखा दिया वो ग़लत हैं. या तो उन्होंने संविधान को अच्छी तरह नहीं समझा, ये वे जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं.

हम पूरी तरह संतुष्ट हैं, ऐसा नहीं है. सीमांकन को लेकर हमारी कुछ आपत्तियां हैं. लेकिन लोकतंत्र में बहस और चर्चा की गुंजाइश बनी रहती है.

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पांच-दस साल बाद नेपाल को आप कहां देखते हैं?

मुझे लगता है कि संविधान की घोषणा होने के बाद जिस तरह से सभी लोगों का ख़्याल रखा गया है, नेपाल को आर्थिक विकास के रास्ते पर जाना चाहिए.

भारत और चीन जैसे पड़ोसियों की तरह हम भी आर्थिक विकास की सीढ़ियां चढ़ेंगे.

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