अफ़ग़ान तालिबान में एकता के 'प्रयास नाकाम'

  • 24 सितंबर 2015
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अफ़ग़ान तालिबान में मतभेदों को ख़त्म करने के लिए बनाई गई उलेमाओं की एक कमेटी ने अपनी नाकामी स्वीकार की है.

कमेटी ने तालिबान के गुटों के बीच मेल-मिलाप की कोशिशें रोक देने की भी घोषणा की है.

इस साल जुलाई में अफ़ग़ान तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के निधन की घोषणा के बाद मुल्ला अख़्तर मंसूर ने संगठन की कमान संभाली लेकिन तालिबान के कुछ गुटों ने उन्हें नेता मानने से इनकार कर दिया.

इन मतभेदों को ख़त्म करने और अफ़गान तालिबान में एकजुटता बनाए रखने के लिए कुछ उलेमा कोशिश कर रहे थे.

उलेमाओं की इस कमेटी के प्रवक्ता अब्दुल्ला मंसूर ने बीबीसी उर्दू से बातचीत में कहा, "ऐसा महसूस होता है कि हमारी कोशिशें नाकाम रही हैं. जब तक दोनों पक्षों की तरफ़ से हमसे संपर्क नहीं किया जाता है या मदद नहीं मांगी जाती, उस वक़्त तक हम अपनी कोशिशें रोक रहे हैं."

'नया संगठन'

मुल्ला उमर की मौत के बाद उनके बेटे मुल्ला मोहम्मद याक़ूब और भाई मुल्ला अब्दुल मनान ने शुरुआती विरोध के बाद मुल्ला मंसूर को नेता मान लिया है.

लेकिन तालिबान के भीतर कुछ हल्कों में अब भी मुल्ला मंसूर का विरोध हो रहा है.

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ख़बरें हैं कि मुल्ला अख़्तर मंसूर के विरोधी बातचीत की नाकामी के बाद जल्द नए संगठन की घोषणा कर सकते हैं.

इस बारे में मुल्ला अब्दुल्ला मंसूर ने कहा, "उलेमाओं का मक़सद एकता और सहमति है, लिहाज़ा वो ऐसे किसी फ़ैसले का हिस्सा नहीं होंगे."

मुल्ला मंसूर के विरोधियों में मुल्ला हसन रहमानी, मुल्ला अब्दुल क़यूम जाकिर, मुल्ला मोहम्मद रसूल, मुल्ला अब्दुल रज़ाक और हमीदुल्ला के नाम ख़ास तौर से लिए जा सकते हैं.

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