'हथियारों के सौदों पर मोदी की मधुर कूटनीति'

  • 28 सितंबर 2015
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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा पर एक बार फिर अमरीका गए जहां उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया और सुरक्षा परिषद में सुधार के साथ स्थाई सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी पर बल दिया.

निवेशकों को भारत आकर्षित करने के लिए नरेंद्र मोदी सिलिकॉन वैली भी गए और सोमवार को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से उनकी मुलाक़ात हुई है.

मोदी को विदेश यात्राओं पर जाना ख़ासा पसंद है और उन्होंने हथियारों के सौदों पर मधुर कूटनीति की कला सीख ली है. हालांकि उनकी कूटनीतिक मुहिम के लिए ये थोड़ी शर्म की बात भी है.

अमरीका जाने से पहले मंज़ूरी

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प्रधानमंत्री के अमरीका की सात दिन की यात्रा पर जाने से एक दिन पहले भारतीय कैबिनेट ने 3.2 अरब डॉलर की लागत से अमरीकी सीएच 47 एफ चिनोक और एएच 64 ब्लॉक 3 अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्टर ख़रीदने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी थी.

इस सौदे की चर्चा साल 2014 में तब हुई थी जब प्रधानमंत्री मोदी राजकीय यात्रा पर अमरीका गए थे और तब इसे भारत-अमरीका संबंधों में नई ऊंचाई बताकर प्रचारित किया गया था.

अगस्त 2015 में भारतीय वायुसेना ने तीन और भारी-भरकम सी 17 ग्लोबमास्टर विमान खरीदने के प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी थी.

वर्ष 2011 के अनुबंध के मुताबिक़ क़ीमत 4.7 अरब डॉलर थी और भारत के पास 10 के अलावा छह अतिरिक्त सी 17 विमान ख़रीदने का विकल्प था.

अमरीका की इस यात्रा के दौरान मोदी भारतीय नौसेना के लिए सिकोरस्काई से 16 एस-70बी सीहॉक हेलीकॉप्टर खरीदने पर भी चर्चा करने की संभावना है.

इस सौदे पर लगभग एक अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है. बीते साल 1.9 अरब डॉलर का सैन्य साजो-सामान खरीदने के बाद भारत अमरीका से हथियार खरीदने वाले देशों की सूची में 24वें स्थान से उठकर शीर्ष पर पहुंच गया है.

जापान के साथ रक्षा सहयोग

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मोदी की विदेश यात्रा से ठीक पहले भारत सरकार की ओर से बड़े रक्षा सौदों की घोषणा अब एक नियमित आदत सी बन गई है.

प्रधानमंत्री मोदी जब पहली विदेश यात्रा पर जापान गए थे, तब मीडिया में यह खबर छाई हुई थी कि जापान ने भारत की अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र से जुड़ी छह संस्थाओं को ‘फॉरेन एंड-यूज़र्स लिस्ट’ से हटा दिया है जिससे रक्षा तकनीक में परस्पर सहयोग में मदद मिलेगी.

शिन मायवा यूएस2 विमान खरीदने का बहुप्रतीक्षित समझौता पूरा हो चुका है. एक संयुक्त बयान में कहा गया कि दोनों पक्ष यूएस-2 को भारत में ही बनाने पर काम करेंगे. इसमें विमान की तकनीक भी भारत को देने की बात कही गई है.

जर्मनी के साथ रक्षा सहयोग

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मोदी की जर्मनी यात्रा से पहले इसी साल अप्रैल में जर्मनी की रक्षा मंत्री तीन दिन के दौरे पर भारत आईं जिसमें उन्होंने ‘क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के साथ रक्षा मुद्दों पर ध्यान के अलावा द्विपक्षीय संबंधों को भी प्रगाढ़’ बनाने की बात कही थी.

जर्मनी की रक्षा मंत्री ने भारत की पश्चिमी नौसेना कमान मुख्यालय का भी दौरा किया था और भारत के नौसैनिक विस्तार संबंधी ज़रूरतों पर चर्चा की थी.

आमतौर पर ऐसा होता नहीं है लेकिन जिस सरकार में सैन्य साजोसामान की खरीद एजेंडे में शीर्ष पर हो, उसमें ऐसा होना हैरानी की कोई बात नहीं है.

तभी तो भारत में जर्मन राजदूत रहे माइकल स्टेनर कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अप्रैल में जर्मनी की यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों को नया आयाम दिया है.’

फ्रांस के साथ रक्षा सहयोग

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इसी साल अप्रैल में मोदी जब फ्रांस गए थे तो उन्होंने 36 रफ़ाएल लड़ाकू विमान जल्द से जल्द खरीदने के फ़ैसले पर मंज़ूरी की मोहर लगाई थी.

इसके लिए दोनों देश एक समझौते पर ‘अलग शर्तों’ के साथ दस्तख़त करेंगे. सब कुछ योजना के हिसाब से हुआ तो इस पर 7 अरब डॉलर से ज्यादा की लागत आएगी.

अमरीका और इसराइल जैसे पश्चिमी देशों से हथियार ख़रीदने से पहले तक हथियारों के आयात पर भारत एक तरह से रूस पर ही निर्भर था. शायद यही वजह है कि अन्य देशों से हथियार खरीदने पर रूस अक्सर अपनी नाख़ुशी का इज़हार करता रहता है.

रूस की नाराज़गी

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दिसंबर 2014 में राष्ट्रपति पुतिन से मुलाक़ात के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि भारत, रूस के साथ रक्षा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, व्यापार और निवेश के मामले में संबंधों को प्रगाढ़ बनाने की दिशा में काम करेगा.

भारत ने रूस से 290 से अधिक एसयू-30 एमकेआई और पांचवी पीढ़ी के पीएकेएफ़एटी-50 लड़ाकू विमान खरीदने के लिए बड़े सौदे किए हैं जिन्हें संयुक्त रूप से विकसित किया जा रहा है.

इसके बावजूद भारत के बदलते रुख की वजह से रूस को प्रतिक्रिया देनी पड़ी है. ख़बरें हैं कि रूस अब पाकिस्तान को जंगी हेलीकॉप्टर बेचने पर विचार कर रहा है.

संदेश साफ है कि रूस मोदी की हथियार मामलों में कूटनीति से खुश नहीं है.

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक़, प्रमुख हथियार आयात करने का भारत का आँकड़ा वर्ष 2010 से वर्ष 2014 के बीच पहले के पांच वर्ष की तुलना में 140 प्रतिशत बढ़ा.

इस अवधि में हथियारों के आयात में भारत अव्वल रहा. दुनियाभर में आयात होने वाले कुल हथियारों का 15 प्रतिशत हिस्सा भारत को आयात होता है जो चीन से तीन गुना से भी अधिक है.

चीन के हथियार आयात में वर्ष 2005 से वर्ष 2009 और 2010 से 2014 के बीच 42 प्रतिशत की कमी आई.

ऐसा लगता है कि भारत हथियारों के मामले में नया सऊदी अरब बन रहा है जो बड़े पैमाने पर हथियारों की खरीद के लिए जाना जाता है.

(ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

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