'गोश्त तो घर ले आए, गंदगी कौन हटाएगा'

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इस संसार का हर नज़रिया और धर्म अपने मानने वालों को आत्मा, बदन और आस-पास की सफ़ाई की तालीम देता है.

इस्लाम में भी सफ़ाई को आधा ईमान कहा जाता है यानी ख़ुद को और अपने आस-पास को साफ़ रखो.

लेकिन जब-जब इस पर अमल करने का वक़्त आता है तो लोग सबकुछ भूल जाते हैं.

जैसे बकरा ईद के मौक़े पर क़ुर्बानी तो बहुत शौक़ से होती है मगर जानवर की आँतें और दूसरी गंदगी उठाना सरकारी कर्मचारियों की ज़िम्मेदारी समझी जाती है.

सरकार भी नहीं सोचती कि लोगों को सड़क-गली या अपने दरवाज़े पर क़ुर्बानी से रोकने के लिए हर इलाक़े में कुछ ऐसी खुली जगहें ही बना दें जहां क़ुर्बानी हो सके और गंदगी ना फैले.

क़ुर्बानी

मैं बचपन से देख रहा हूं कि बकरा जिबह किया, गोश्त घर ले गए और खाल के साथ दूसरे अंग वहीं छोड़ देते हैं.

इस गंदगी को लांघकर लोग जब एक-दूसरे से गले मिल रहे होते हैं तो यह सीन देखकर बस मज़ा ही तो आ जाता है.

जब इन लोगों से कहा जाए कि हुज़ूर गोश्त के साथ-साथ जानवर के अवशेषों को भी ठिकाने लगाइए तो ऐसे घूर कर देखते हैं जैसे क़ुर्बानी से पहले बकरे को देखा जाता है.

और जब बकरे की तरह मिनमिनाने हुए कहा जाए कि सऊदी अरब, यूएई और ईरान में आप ऐसे क़ुर्बानी करेंगे तो पकड़े जाएंगे, तो इस पर वो कहते हैं कि आप फिर वहीं क्यों नहीं चले जाते हैं. हम तो ऐसे ही बाप-दादा के ज़माने से क़ुर्बानी करते आ रहे हैं और ऐसे ही करेंगे.

ऐसे मौकों पर मोहल्ले के कई सयाने आपको समझाते भी है- "अरे छोड़िए साहब आप इन जाहिलों के चक्कर में ना पड़िए. एक तो ये ग़रीब है और फिर आपकी तरह पढ़े-लिखे भी तो नहीं."

अगर इन सयानों से कहा जाए कि भाई साहब गली का कुत्ता भी पढ़ा-लिखा नहीं होता और उससे ज़्यादा ग़रीब भी कोई नहीं होता लेकिन वो भी बैठने से पहले दुम ज़रूर हिला लेता है.

उस पर तुरंत जवाब मिलता है, "साहब आप बहुत मुंहफट है आप जैसों के मुंह कौन लगे."

महानता सिर आंखों पर

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मुझे आजतक ये बात समझ में नहीं आई कि भारत हो या पाकिस्तान, हमलोग बात-बात पर अकड़ते हैं कि अरे मियां जितने मज़ेदार पकवान हमारे है, गोरों को क्या पता कि अच्छा खाना किसे कहते हैं?

ये पश्चिम वाले ख़ुद को साइंस का गुरु समझते हैं हालांकि मैथ्स और फिलॉसॉफी तो उन्होंने हमसे ही सीखी थी.

और जब बाक़ी दुनिया चिथड़ों में घूम रही थी तब ये उपमहाद्वीप सोने की चिड़िया कहलाता था.

इन बाहर वालों को क्या पता कि सभ्यता किस जानवर का नाम है? आज बड़े मोहज़्ज़ब बने फिरते हैं.

लेकिन अगर उनके सभ्यता के लेक्चर को बीच में टोककर बस इतना कह दें कि हुज़ूर आपकी महानता सिर आंखों पर, लेकिन आज़ादी के 68 साल उपमहाद्वीप की आधी आबादी सुबह खेतों में जाकर, रेलवे लाइनों और सड़क के किनारे ही क्यों फ़ारिग़ होती हैं?

एकता

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आज भी हर मोहल्ले की पिछली गली को गंदी गली क्यों कहते हैं?

ग़रीब और कम पढ़ा-लिखा साफ़ रहने की कोशिश करेगा तो पुलिस पकड़ लेगी क्या?

ऐसी अजीबोग़रीब बातें करने वाले को लोग पागल, सनकी और ऐड़ा ना समझे तो और क्या समझे?

हिंदू और मुसलमानों में भले हर बात पर सिर फुटौव्वल हो पर इस बार में पूरी एकता है कि आसपास को ख़ुद से साफ़ नहीं रखना.

भला ये क्या बात हुई कि गंदगी भी हम ही फैलाएं और साफ़ भी ख़ुद ही करें. वाह जी वाह.

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