पाकिस्तान में सेना की बढ़ती सियासी ताक़त

  • 30 सितंबर 2015

कुछ लोग इसे परदे के पीछे से सेना की सरकार कह सकते हैं जबकि दूसरे इसे फ़ौजी जनरलों और राजनेताओं के बीच देशहित में मिल जुल कर काम करने का नाम दे सकते हैं.

आप इसे किसी भी नज़रिए से देखें, लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर सकते हैं कि पाकिस्तानी सेना की सियासी ताक़त बढ़ती जा रही है.

इसकी शुरुआत 16 दिसंबर 2014 को पेशावर के आर्मी स्कूल पर पाकिस्तानी तालिबान के हमले से हुई जिसमें 140 से ज्यादा लोग मारे गए.

इसके कुछ दिनों बाद ही असैन्य नेतृत्व ने एक 20 सूत्रीय एक्शन प्लान तैयार किया जिसका मक़सद चरमपंथियों से निपटना, उनके बयानों पर लगाम लगाना, धार्मिक मदरसों को कंट्रोल करना और उन्हें मिलने वाली आर्थिक मदद को धीमा करना है.

सैन्य अदालतें

ये जानते हुए कि अदालतें जिहादियों को सज़ा देने में कोई दिलचस्पी नहीं लेती हैं, संसद ने सैन्य अदालतों के गठन के लिए संविधान में संशोधन का बिल पास किया.

इसके बाद सेना ने एक ऐसी उच्च समिति के गठन का एलान किया जिसमें अहम राजनेता, नौकरशाह, ख़ुफ़िया एजेंसियां और सेना के अधिकारी शामिल हैं.

सरकार ने इस दिशा में कार्रवाई करते हुए अब तक 50 हज़ार चरमपंथियों को या तो हिरासत में लिया है या उन्हें गिरफ़्तार किया गया है.

प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-झंगवी के प्रमुख मलिक इशाक़ को पुलिस ने मार दिया.

इन कार्रवाइयों के बीच चरमपंथियों की हिंसा में कमी आई है.

इस सबके लिए पाकिस्तानी मीडिया ने सेना के प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ की भूमिका को सराहा है और अब सेना जनता के बीच अपने बढ़ते हुए समर्थन का लुत्फ़ ले रही है.

लेकिन जिन लोगों को उम्मीद थी कि पेशावर हमला एक अहम मोड़ साबित होगा उनमें से बहुत से लोगों को अब नहीं लगता कि इस एक्शन प्लान से दीर्घकालीन तब्दीलियां आने वाली हैं.

चुनिंदा कार्रवाई

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इससे पहले 2007 में जनरल मुशर्रफ़ के दौर में दसियों हज़ार चरपंथियों को हिरासत में लिया गया था जिन्हें बाद में रिहा कर दिया गया.

चूंकि सरकार इन सारे चरमपंथियों से जुड़े मामलों की जांच करने में सक्षम नहीं है, इसलिए संभव है कि उन्हें भी यूं ही रिहा कर दिया जाए.

प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने जब इस एक्शन प्लान की घोषणा की थी तो उन्होंने कहा था कि अब पाकिस्तान अच्छे तालिबान (वो जो पाकिस्तान के दुश्मनों से लड़ते हैं) और बुरे तालिबान (जो पाकिस्तान को ही निशाना बनाते हैं) के बीच कोई फ़र्क़ नहीं करेगा.

लेकिन हक़ीक़त में सरकार अब भी ऐसी ही नीतियों पर अमल कर रही है. कार्रवाई उन्हीं गुटों के ख़िलाफ़ होती है, जिन्हें सरकार निशाना बनाना चाहती है.

उन जिहादियों को निशाना नहीं बनाया जाता है जो भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय सेना को निशाना बनाते हैं.

इसी तरह उन तालिबान लड़ाकों को भी आज़ाद छोड़ा गया है जो अफ़ग़ानिस्तान में हमले करते हैं.

ऐसे गुटों में हक्कानी नेटवर्क का नाम प्रमुख तौर पर शामिल है जिसे काबुल में होने वाले हमलों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है.

जोखिम से परहेज़

इन सभी गुटों में सबसे ज़्यादा विवादित गुट लश्कर-ए-तैयबा है, जिसने बाद में अपना नाम जमात उद दावा रख लिया. इस गुट को 2008 के मुंबई हमलों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है, लेकिन इसके ख़िलाफ़ पाकिस्तान में कोई कार्रवाई नहीं हुई.

गुट के प्रमुख हाफ़िज़ सईद के बयान पाकिस्तानी मीडिया में अकसर प्रकाशित होते रहते हैं.

2002 में अमरीकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या के मामले में दोषी क़रार दिए गए उमर शेख़ के ख़िलाफ़ और कार्रवाई होने की कम ही उम्मीद है. उनकी अपील लंबे समय से पड़ी हुई है.

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Image caption मुमताज़ क़ादरी ने सलमान कादरी को ईशनिंदक बताते हुए उनकी हत्या कर दी थी

इसके अलावा पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या करने वाले उनके अंगरक्षक मुमताज़ क़ादरी को लेकर भी ख़ामोशी छाई हुई है.

ना तो फौज ही और न ही सरकार क़ादरी के मुक़दमे को नेशलन एक्शन प्लान में शामिल करने का जोखिम ले सकती है क्योंकि क़ादरी को लोगों का समर्थन प्राप्त है.

निजी बातचीत में सरकारी अधिकारी इस तरह की बातें करते हैं कि उनकी प्राथमिकता वे चरमपंथी हैं जो पाकिस्तान को निशाना बनाते हैं, लेकिन इस दावे पर भी सवाल उठते रहे हैं.

हिंसक पलटवार के डर से सरकार अपने गढ़ दक्षिणी पंजाब में भी चरमपंथियों से टकराने से हिचकती है.

ये डर वाजिब भी दिखाई पड़ता है. मलिक इशाक़ की मौत के चंद दिनों के भीतर ही लश्कर-ए-झंगवी ने जवाबी कार्रवाई करते हुए एक आत्मघाती हमला किया जिसमें पंजाब प्रांत के गृह मंत्री शुजा ख़ानज़ादा मारे गए.

नेशनल एक्शन प्लान का असर पाकिस्तानी सेना और सरकार के बीच रिश्तों पर दिखाई दे रहे हैं.

पाकिस्तानी संसद नेशनल असेंबली और प्रांतीय असेंबलियों के प्रतिनिधि शिकायत करते हैं कि उन्हें क़ानून बनाने की प्रक्रिया से बिल्कुल अलग कर दिया गया है.

सेना प्रमुख का बढ़ता क़द

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कई लोग सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ की उभरती शख्सियत के लेकर भी ख़ौफ़ज़दा हैं. पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची में लगभग हर इलाक़े में इनके पोस्टर लगे दिखाई देते हैं.

कई प्रभावशाली वेबसाइटों पर उनकी तारीफ़ों के पुल बांधे जा रहे हैं. इन वेबसाइटों को सेना की तस्वीरें भी आसानी से मिल जाती हैं.

सेना ने अपने जनसंपर्क विभाग को पहले से बेहतर किया है और जिहादियों के ख़िलाफ़ वो अपनी मुहिम के लिए राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत गीत भी तैयार करवा रही है.

पाकिस्तान का एक आज़ाद ख्याल वर्ग इन तमाम सरगर्मियों को लेकर चिंतित है.

लेकिन इसके साथ ही वो इस बात को भी मानता है कि जिहादियों से निपटने की हर रणनीति पर सेना की छाप इसलिए है क्योंकि सिविलियन सरकार अपनी तरफ़ से कोई भी प्रभावी रणनीति तैयार करने और उसे लागू करने में नाकाम रही है.

सेना के लिए जनता के बढ़ते हुए समर्थन का असर मीडिया पर भी देखा जा सकता है.

कई चैनल सेना को नाराज़ न करने के प्रति इतने सजग हैं कि उनका लाइव प्रसारण 30 सेकेंड की देरी से चलता है ताकि अगर अगर किसी आवाज़ को दबाना हो तो सुविधा रहे.

लाइव प्रसारण में देरी के ये निर्देश पहले जिहादियों के इंटरव्यू को रोकने के लिए दिए गए थे लकिन अब उन्हें सेना की साख बहाल करने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है.

तख़्तापलट का ख़ौफ़

सेना के इस क़दर ताक़तवर होने के कारण प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ अपनी कुछ नीतियों को लागू नहीं कर पा रहे हैं.

उनकी इच्छा थी कि भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे हों लेकिन सेना ने भारत के साथ किसी भी बातचीत में कश्मीर मुद्दे को प्राथमिकता देने की शर्त लगा दी.

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नवाज़ शरीफ़ को परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से भी रोका गया था, जिन्होंने शरीफ़ को सत्ता से बेदख़ल कर दिया था.

सेना नहीं चाहती थी कि उसके पूर्व प्रमुख पर विद्रोह का मुक़दमा चले.

इस वक़्त सेना और सरकार बस सावधानीपूर्वक एक दूसरे का साथ दे रहे हैं. वो एक साथ काम तो कर रहे हैं, लेकिन बस इसलिए, क्योंकि राजनेताओं को ख़ौफ़ सता रहा है कि अगर सेना के साथ मतभेद उभरते हैं तो फिर से तख़्तापलट की नौबत आ सकती है.

कई लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि अब देखना ये है कि ये स्थिति कबतक बरक़रार रहती है.

मानवाधिकार कार्यकर्ता आस्मा जहांगीर कहती हैं, "मैं आपको बता हूं कि हमने इतिहास से बहुत कुछ सीखा है. हमारी सेना को सिर्फ़ ताक़त नहीं चाहिए, बल्कि वो मुकम्मल ताक़त चाहिए."

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