चीन के क़रीब तो नहीं चला जाएगा नेपाल?

नेपाल नाकेबंदी इमेज कॉपीरइट AFP GETTY

नेपाल में नया संविधान लागू होने के बाद भारत से उसके रिश्ते तनावपूर्ण हो गए हैं. ऐसे में, सवाल उठ रहे हैं क्या नेपाल पर चीन का असर बढ़ेगा?

दरअसल, भारत की ओर से नेपाल में सामान की आवाजाही बंद होने से नेपाल में तेल से लेकर बुनियादी चीज़ों की क़िल्लत हो गई है.

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने इसे 'भारत की ओर से अघोषित आर्थिक प्रतिबंध' कहा है और इसे लेकर नेपाल में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

स्थानीय मीडिया की ख़बरों के मुताबिक़, चीन नेपाल को आपात मदद करने की तैयारी में है और वहां एक तबक़े को इस बात का डर है कि कहीं नेपाल चीन के क़रीब तो नहीं चला जाएगा.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरेंद्र मोदी के नेपाल दौरे के बाद भारत की जो लोकप्रियता बढ़ी थी उसमें तेज़ी से कमी आ रही है.

पढ़ें, विस्तार से

इमेज कॉपीरइट AFP

भारत नेपाल के नए संविधान को लेकर खुले तौर पर ऐतराज़ जता चुका है जबकि चीन ने संविधान स्वीकार किए जाने पर नेपाल को बधाई दी थी.

नेपाल के दक्षिणी और मैदानी तराई इलाक़ों में रहने वाले मधेसी लोग नए संविधान के कुछ प्रस्तावों का विरोध कर रहे हैं.

वहीं नेपाल के पहाड़ी इलाक़ों में भारत की आपत्तियों और उसके रुख़ का विरोध हो रहा है.

नेपाल के अख़बार 'अन्नपूर्णा पोस्ट' के प्रमुख संपादक युवराज घिमिरे का कहते हैं, "मोदी के नेपाल आने पर नेपाली लोगों में जो उम्मीद बंधी थी, अब वो निराशा में बदल रही है, क्योंकि नेपाल में भारत विरोधी भावना दिख रही है और लोग सड़कों पर उतर कर उसका विरोध कर रहे हैं."

घिमिरे कहते हैं, "नेपाली लोगों में जो भारत के प्रति आक्रोश है वो केवल मोदी के प्रति नहीं है. असल में साल 2006 में नेपाल में जो राजनीतिक परिवर्तन हुआ था उसमें भारत ने अहम भूमिका निभाई थी."

वो कहते हैं, "यह मोदी का विरोध नहीं है, जब तक भारत इस बात पर पुनर्विचार नहीं करेगा कि उसे नेपाल के अंदरूनी मसलों में कहां तक हस्तक्षेप करना है, तब तक ये समस्या बनी रहेगी."

विरोध

इमेज कॉपीरइट ram sarraff

चीन के स्थिति का फ़ायदा उठाने के बारे में घिमिरे कहते हैं, "नेपाल में भारत की लोकप्रियता कम होना समस्या का एक पहलू है, जबकि चीन से नेपाल की क़रीबी बढ़ना दूसरा पहलू है, लेकिन क्या ये अपने आप हो रहा है."

घिमिरे बताते हैं कि चीन ने नेपाल के संविधान का स्वागत किया है और चीनी राष्ट्रपति ने भारत का नाम लिए बिना कहा है कि बड़े देशों को छोटे पड़ोसी देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.

चीन की तरफ से व्यापारिक साझेदारी बढ़ाने की ख़बरों पर उनका कहना है, "आपात मदद के लिए चीन आगे तो आया है लेकिन कोई अतिरिक्त व्यापार बढ़ाने की बात नहीं की है. नेपाल से जोड़ने वाली सड़कों की मरम्मत करने में वो तेज़ी दिखा रहे हैं."

भूकंप के कारण नेपाल चीन सीमा पर मौजूद व्यापार नाका तातोपानी फ़िलहाल बंद है. और, दोनों मुल्क रसुआगढ़ी में नया नाका खोलने की तैयारी कर रहे हैं.

चीन से क़रीबी

इमेज कॉपीरइट Reuters

हालांकि 'मधेश वाणी' के संपादक राजेश अहिराज कहते हैं, “भारत की ओर से अनौपचारिक नाकेबंदी से नेपाल के पहाड़ी और मधेसी दोनों मुश्किल में हैं. नेपाल में एक समुदाय भारत का विरोधी है और दूसरा चीन का.”

अहिराज के मुताबिक़, “भारत और चीन एक दूसरे के क़रीबी दोस्त हैं, वो एक दूसरे के शत्रु नहीं हैं. दोनों ही देशों से नेपाल के अलग-अलग सामरिक और ऐतिहासिक संबंध हैं, ऐसे में किसी के क़रीब आने से दूसरे के हितों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने जा रहा है.”

वो कहते हैं कि, "हमें नहीं लगता कि नेपाल में चीन भारत पर बढ़त बना लेगा."

वो कहते हैं, "संविधान में प्रतिनिधित्व को लेकर जारी गतिरोध को तोड़ने के लिए भारत और नेपाल की सरकार और राजनीतिक दल लगे हुए हैं और उम्मीद है कि अगले चार पांच दिन में कोई समाधान निकल आएगा."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार