'कश्मीर विवाद से भारत को आंख नहीं चुरानी चाहिए'

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संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के भाषण के जवाब में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का भाषण पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है.

रोज़नामा ‘वक़्त’ लिखता है कि भारतीय विदेश मंत्री ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के चार बिंदुओं वाले शांति प्रस्ताव को ख़ारिज करते हुए कहा कि चार बिंदुओं की ज़रूरत ही नहीं है, बल्कि बिंदु तो एक ही है - दहशतगर्दी ख़त्म कीजिए और बातचीत करिए.

लेकिन अख़बार की राय है कि भारत और पाकिस्तान के सभी विवादों पर ग़ौर करें तो उनकी तह में बस एक ही विवाद नज़र आता है- कश्मीर विवाद, इसलिए भारत को इससे आंख नहीं चुरानी चाहिए.

अख़बार कहता है कि ये मुद्दा जब तक हल नहीं होगा, क्षेत्र में एटमी जंग के बादल मंडराते रहेंगे.

भारत पर निशाना

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रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ लिखता है कि नवाज़ शरीफ़ ने अपने भाषण में दोतरफ़ा विवादों के हल के लिए एक रास्ता बताया और उसके लिए चार बिंदुओं वाला फॉर्मूला दिया.

अख़बार कहता है कि इस फॉर्मूले में नियंत्रण रेखा पर पूरी तरह संघर्षविराम के लिए 2003 के समझौते का सम्मान करना, एक दूसरे को ताक़त के इस्तेमाल की धमकी न देना, कश्मीर से भारत का फ़ौज हटाना और सियाचिन ग्लेशियर से दोनों देशों की सेनाओं को हटाना शामिल है.

अख़बार लिखता है कि बेहतर तो यह होता कि भारतीय अधिकारी नवाज़ शरीफ़ के शांति प्रस्ताव पर विचार करते और अगर उनके पास कोई बेहतर प्रस्ताव होता तो उसे पेश करते लेकिन उन्होंने इसकी ज़हमत नहीं उठाई और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू कर दिया.

वहीं ‘जंग’ ने लिखा है कि भारत ने फिर हठधर्मिता दिखाते हुए नवाज़ शरीफ़ के प्रस्तावों को ख़ारिज कर दिया है जिससे न सिर्फ़ दक्षिण एशिया के लगभग दो अरब लोगों को बल्कि दुनिया भर के शांतिप्रिय देशों को भी मायूसी हुई है.

‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि भारतीय विदेश मंत्री दहशतगर्दी छोड़ने का प्रस्ताव देते वक़्त इस बात को नज़रअंदाज़ कर गईं कि भारत एक अरसे से कश्मीर में सरकारी दहगतगर्दी में शामिल है.

अख़बार लिखता है कि बलूचिस्तान और पाकिस्तान के सरहदी क़बाइली इलाक़ों में अशांति फैलाने में भारत किस हद तक शामिल है, ये बात सब जानते हैं.

‘नेपाल में भी दख़लअंदाज़ी’

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रोज़नामा ‘इंसाफ़’ का संपादकीय है – नेपाल में भी भारत का हस्तक्षेप.

अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान से भारत की दुश्मनी से तो दुनिया वाक़िफ़ ही है, लेकिन हक़ीक़त ये है कि किसी भी पड़ोसी देश से भारत के रिश्ते अच्छे नहीं हैं.

अख़बार लिखता है कि भारत में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी नेपाल के हिंदू राष्ट्र न रहने और वहां धर्मनिरपेक्ष संविधान लागू होने पर उसके ख़िलाफ़ इंतक़ामी कार्रवाइयों पर उतर आई है और भारत ने नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी की हुई है.

अख़बार लिखता है कि नेपाल, भूटान और म्यांमार कोई भी देश भारत की विस्तारवादी नीतियों से ख़ुश नहीं है.

‘सोची समझी हत्या’

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रुख़ भारत का करें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिहासड़ा गांव में गोमांस खाने की अफ़वाह पर एक व्यक्ति की हत्या पर ‘सहाफ़त’ का संपादकीय है - मोहम्मद अख़लाक़ का ज़ालिमाना क़त्ल.

अख़बार लिखता है कि मुसलमान निशाने पर हैं, वो जुर्म न करें तो उनसे ज़बरदस्ती जुर्म क़बूल कराने की कोशिश होती है और उन्हें फांसी से लेकर उम्रक़ैद तक पहुंचाने की कोशिश होती है और जिन्हें अदालत से रिहाई मिलती भी है तो इतनी देर से कि उनकी ज़िंदगी में कुछ नहीं बचता.

अख़बार की टिप्पणी है कि दूसरी तरफ़ अगर कोई बहुसंख्यक मुसलमानों पर जुर्म करने की बात मान भी ले तो उसकी ज़मानत के लिए हर संभव कोशिश होती है.

अख़बार इस सिलसिले में असीमानंद और प्रज्ञा ठाकुर से जुड़े मामलों की मिसाल देता है.

‘क़ौमी तंज़ीम’ ने लिखा है कि ऐसी घटनाएं इसलिए होती हैं क्योंकि अफ़सर ऐसे मुजरिमों को लेकर ऐसी सख़्ती नहीं दिखाते कि उनके दिल में सज़ा या मौत का डर बैठे.

‘हमारा समाज’ लिखता है कि उत्तर प्रदेश सरकार के दिए मुआवज़े से अख़लाक़ के घर का चूल्हा कुछ दिन तो चल जाएगा, लेकिन न तो उन्हें अपना खोया बाप मिला और न ही आसपास के लोगों के दिलों में पैदा हुआ असुरक्षा का अहसास आसानी से जाएगा.

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