भारत-पाक के रिश्ते क्या कभी सुधरेंगे?

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साल 2013 में चुनाव जीतने के बाद नवाज़ शरीफ़ ने भारतीय पत्रकारों से कहा था कि अपने तीसरे कार्यकाल में भारत से रिश्ते सुधारना उनकी प्राथमिकता होगी.

एक साल बाद भारत में जब नरेंद्र मोदी ने चुनाव जीता तो उनके विचार भी ऐसे ही लगे और उन्होंने तुरंत नवाज़ शरीफ को दिल्ली आने का न्यौता दिया था.

यह पहला मौक़ा था जब कोई पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भारत के किसी प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुआ था.

इस सकारात्मक माहौल का असर पाकिस्तानी सेना पर भी देखा गया था.

कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने ये दलील भी दी कि अपनी राष्ट्रवादी छवि के दम पर मोदी भारत और पाकिस्तान के मतभेदों को दूर करने के लिए किसी तरह की डील करने का जोखिम भी ले सकते हैं.

लेकिन डेढ़ साल बाद दोनों देशों के अधिकारी एक-दूसरे से मिलने तक को तैयार नहीं हैं, समाधान की तरफ़ बढ़ना तो दूर की बात है.

इस बीच, विवादित कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान और भारतीय सेना के बीच गोलीबारी चल रही है. उम्मीदों का दौर बीत चुका है.

मुंबई हमला

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भारत के नज़रिए से इसके कारण स्पष्ट हैं.

भले ही पाकिस्तान तालिबान से संघर्ष कर रहा है, लेकिन उसने लश्कर-ए-तैय्यबा के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की है जिसे 2008 के मुंबई हमलों समेत भारत में कई हमलों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है. इस संगठन को अब जमात-उत-दावा के नाम से जाना जाता है.

इसी साल अप्रैल में मुंबई हमलों के कथित मास्टरमाइंड ज़कीउर रहमान लखवी को पाकिस्तानी जेल से रिहा कर दिया गया.

भारत के गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने लखवी की रिहाई को मुंबई हमले में मारे गए लोगों का अपमान बताया.

जून में बांग्लादेश यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान पर भारत में चरमपंथी गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया.

वहीं पाकिस्तान आरोप लगाता है कि भारत बलूचिस्तान में अलगाववादियों को मदद देता है. साथ ही वो कराची में राजनीतिक हिंसा के पीछे भी भारत का हाथ बताता है.

वार्ता पर विराम

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तमाम विवादों के बीच इस साल जुलाई में जब रूस के उफा में मोदी और नवाज़ शरीफ़ की मुलाक़ात हुई तो उन्होंने आपसी बातचीत फिर से शुरू करने की कोशिश की थी.

दोनों प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर पर बातचीत शुरू करने पर राज़ी हुए थे.

लेकिन वार्ता शुरू होने के ठीक पहले ही पाकिस्तान ने अपने क़दम पीछे खींच लिए.

पाकिस्तान में आम तौर पर माना जाता है कि सेना ने सरकार से कहा कि जब तक कश्मीर मुद्दा एजेंडे में साफ तौर पर शामिल नहीं हो, उसे बातचीत रद्द कर देनी चाहिए.

पाकिस्तान में विदेश नीति से जुड़े मुद्दे पर सेना का ही नियंत्रण माना जाता है.

1947 से ही भारत और पाकिस्तान दोनों दावा करते हैं कि कश्मीर पर उनका अधिकार होना चाहिए.

कश्मीर के एक तिहाई भाग पर पाकिस्तान का कब्ज़ा है जबकि बाक़ी हिस्सा भारत के पास है.

पाकिस्तान की परेशानी

नवाज़ शरीफ की भारत से रिश्ते सुधारने की तमन्ना काफ़ी पुरानी है. उन्होंने साल 1998 में भी समझौते की कोशिश की थी.

तब पाकिस्तान सेना के कारगिल संघर्ष के दौरान नियंत्रण रेखा पार करने के फ़ैसले से इस कोशिश को ज़बरदस्त झटका लगा था.

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साल 2001 में जब जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने एक समझौता करने की कोशिश की थी, तब भारत सरकार ने उनकी कोशिशों को नामंज़ूर कर दिया था.

पाकिस्तान के सुरक्षा अधिकारी अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रधानमंत्री मोदी के बढ़ते आत्मविश्वास को निराशा के साथ देखते हैं.

मोदी की राष्ट्रवादी राजनीति और भारतीय बाज़ार की क्षमता कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश को कमज़ोर बनाती है.

अफ़गानिस्तान का मुद्दा

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भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में अफ़ग़ानिस्तान के हालात का भी असर पड़ता है.

पाकिस्तान के अधिकारी दबी ज़ुबान में अफ़ग़ान तालिबान को अपने समर्थन को ये कहते हुए सही ठहराते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत के बढ़ते असर को कम करने के लिए उन्हें ताक़तवर और दोस्ताना फोर्स की ज़रूरत है.

नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ़ भले ही मतभेदों को दूर करना चाहें लेकिन उनकी इस दिशा में कामयाबी को लेकर बामुश्किल ही संकेत दिखते हैं.

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