टीपीपीः मुक्त व्यापार का बड़ा समझौता

  • 7 अक्तूबर 2015
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कई दशकों बाद वैश्विक व्यापार के क्षेत्र में मुक्त व्यापार को लेकर एक बड़ा समझौता हुआ है.

प्रशांत क्षेत्र के 12 देशों के बीच सोमवार अमरीका के नेतृत्व में हुआ समझौता ट्रांस पैसिफ़िक पार्टनरशिप (टीपीपी) के तहत सदस्य देशों में व्यापार शुल्क कम किया जाएगा और एक जैसे मानक तय होंगे.

टीपीपी को अब तक का सबसे महात्वाकांक्षी मुक्त व्यापार समझौता कहा जा रहा है.

इसका समर्थन करने वालों का कहना है कि टीपीपी सदस्य देशों की आर्थिक विकास के नए दरवाज़े खोलेगा.

लेकिन जो ख़िलाफ़ हैं, खासकर कुछ अमरीकी, जिन्हें डर है कि इस समझौते से अमरीका का नौकरियां इसमें शामिल विकासशील देशों में चली जाएंगी.

पांच साल तक चली बातचीत को गोपनीय रखने को लेकर भी कुछ लोगों में नाराज़गी है.

आइए पांच बिंदुओं में टीपीपी को समझें.

टीपीपी क्या है?

इस समझौते में 12 देश शामिल हैं- अमरीका, जापान, मलेशिया, वियतनाम, सिंगापुर, ब्रूनेई, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, कनाडा, मैक्सिको, चिली और पेरू.

समझौते का मक़सद इन देशों के बीच आर्थिक संबंध को और गहरा बनाना, शुल्क में कटौती करना और विकास को गति देने के लिए व्यापार का सराहा लेना है.

सदस्य देश आर्थिक नीतियों और नियमों के बारे में रिश्ते को प्रगाढ़ करने की उम्मीद कर रहे हैं.

यह समझौता यूरोप की तरह एक नया एकीकृत बाज़ार पैदा कर सकता है.

यह कब शुरू हुआ?

दस साल पहले इसकी शुरुआत चार देशों के बीच व्यापारिक समझौते से हुई थी- ब्रूनेई, चिली, न्यूज़ीलैंड और सिंगापुर.

इस समझौते के तहत इन देशों के बीच होने वाले अधिकांश सामानों पर शुल्क ख़त्म करने के अलावा इसका दायरा बढ़ाने पर सहमति हुई थी.

सदस्य देशों के बीच रोज़गार, बौद्धिक संपत्ति और प्रतियोगिता नीतियों पर भी सहयोग करने की सहमति बनी थी.

टीपीपी का समझौता कितना बड़ा है?

असल में यह बहुत बड़ा समझौता है. इन 12 देशों की संयुक्त आबादी 80 करोड़ है यानी यूरोपीय संघ के एकीकृत बाज़ार के मुक़ाबले लगभग दोगुनी.

इसके अलावा वैश्विक व्यापार में इनकी हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है.

सदस्य देशों के बीच एक बिल्कुल नए नज़रिए और मानकों के साथ हुआ यह समझौता अहम है, मसलन पर्यावरण सुरक्षा, मज़दूरों के अधिकार और कुछ उद्योगों के लिए खास नीति की बजाए एक नीति अपनाना.

विरोधी क्या कहते हैं?

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विरोधियों का तर्क है कि चीन को अलग थलग करने कि यह चाल है. समझौते में चीन शामिल नहीं है.

अन्य लोगों का कहना है कि सरकार सार्वजनिक सुविधाओं के लिए स्वास्थ्य या शिक्षा के बारे में नीतियां बदलती है तो टीपीपी के तहत कंपनियां उस पर मुक़दमा कर सकती हैं.

इस समझौते से सदस्य देशों में श्रम शक्ति को लेकर प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी.

लेकिन इसकी सबसे बड़ी आलोचना बातचीत को गोपनीय रखने को लेकर होती रही है, क्योंकि सरकार जिन बदलावों को लाना चाह रही है, मतदाताओं को उसकी कोई जानकारी नहीं है.

हालांकि समर्थकों का कहना है कि बातचीत को सार्वजनिक इसलिए नहीं किया गया क्योंकि तबतक औपचारिक सहमति नहीं हुई थी.

वैश्विक व्यापार में क्या होगा असर?

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समझौते को कैसे लागू किया जाएगा, इस मामले में क़ानून बनने के पहले हर देश में जनप्रतिनिधियों के बीच चर्चा कराई जाएगी.

अमरीका में कांग्रेस सदस्यों के बीच यह चर्चा राष्ट्रपति चुनावों के दौरान हो सकती है और दोनों पार्टियों के बीच यह एक बड़ा मुद्दा बन सकता है.

हालांकि कांग्रेस ने इस समझौते को तेज़ी से निपटाने के लिए राष्ट्रपति को अधिकार दे रखे हैं, जिसके तहत जनप्रतिनिधि समझौते की समीक्षा तो कर सकते हैं लेकिन संशोधन नहीं कर सकते हैं.

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