टीपीपी से किसे फ़ायदा, किसे नुक़सान

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प्रशांत महासागर के तट पर बसे 12 देशों के बीच हुए व्यापार समझौता ट्रांस-पैसिफ़िक पार्टनरशिप बीते दो दशकों में अब तक सबसे बड़ा व्यापार समझौता माना जाता है.

इससे दुनिया की 40 प्रतिशत अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है और अमरीका और जापान जैसे सुपर पावर इसमें शामिल हैं.

यह निश्चय ही एक बड़ा समझौता है और इसके फ़ायदे भी हैं, पर हर किसी को इससे फ़ायदा ही होगा, ऐसा नहीं है.

हम एक नज़र डालते हैं कि इस समझौते से किसे कितना फ़ायदा या नुक़सान होगा.

मोटर गाड़ी कंपनियां

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अमरीका में गाड़ियां बेचने की छूट मिलने से टोयोटा और होंडा जैसे बड़े जापानी मोटर निर्मताओं को लाभ होगा. वे एशिया के दूसरे बाज़ारों से कल-पुर्जे ख़रीद कर अमरीकी बाज़ार में बेचने के लिए गाड़ियां बना सकती है.

इसके साथ ही वियतनाम जैसे देशों में कर की दरों में कटौती होने से अमरीका को भी फ़ायदा हो सकता है.

किसान

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जापान, मेक्सिको और कनाडा में सोयाबीन, बीफ़ और पोल्ट्री उत्पादों में फ़िलहाल जो कर लगाया जाता है, इस समझौते की वजह से उसमें कमी होगी या कर ख़त्म होंगे. इसका फ़ायदा अमरीकी कंपनियों को मिलेगा.

इसी तरह डेरी उत्पाद, चीनी, शराब, चावल और सी फ़ूड में कुछ जगहो पर 98 प्रतिशत तक कर लगता है. इसे हटाए जाने से ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों को लाभ होगा.

स्थानीय श्रम बाज़ार

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Image caption ट्रांस पैसिफ़िक पार्टनरशिप सदस्यों के प्रतिनिधि

कई मज़दूर यूनियनों को डर है कि अमरीका जैसे विकसित देशों से नौकरियां कम वेतन और कम कड़े श्रम क़ानूनों वाले देश की ओर चले जाएंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सबसे अधिक फ़ायदा वियतनाम को होगा.

बड़े देश अपने कारखाने वहां लगा सकते हैं और वियतमानी अर्थव्यवस्था अगले दस सालों तक 11 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है. पर इसके साथ ही इन देशों में श्रम के अंतरराष्ट्रीय क़ानून भी लागू होंगे.

दवा निर्माता

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ट्रांस पैसिफ़िक पार्टनरशिप के तहत दवा कंपनियों को नई बायोटेक दवाओं पर आठ तक सुरक्षा मिलेगी. जीवित कोशिकाओं से बनी महंगी दवा को बायोटेक दवा कहते हैं. पहले इस तरह की दवाओं पर 12 साल तक सुरक्षा मिलती थी.

कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी एक दवा की तरह दूसरी दवा बनाने पर रोक लगने से बाज़ार तक पंहुची दवाओं की क़ीमत बढ़ेगी.

इससे ग़रीब देशों पर बुरा असर पड़ेगा. इनके लोग महंगी जीवन रक्षक दवाएं नहीं ख़रीद पाएंगे, इन देशों के बजट पर बोझ पड़ेगा.

तकनीक कंपनियां

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गूगल और ऊबर जैसी कंपनियों की विदेशों में बिक्री बढ़ेगी. वे विदेशों में स्थानीय स्तर पर भी ढांचागत सुविधाएं विकसित करेंगी.

ग्लोबल रोमिंग शुल्क में कटौती होगी और दूरसंचार की कंपनियो में होड़ बढ़ेगी.

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