आसान नहीं है चीन-पाक कोरिडोर की डगर

  • 19 अक्तूबर 2015
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इस साल की शुरुआत में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पाकिस्तान यात्रा के दौरान 46 अरब डॉलर के जिस निवेश पैकेज का एलान किया गया था उसे पाकिस्तान की मौजूदा दिक्कतों के लिए रामबाण दवा बताया गया था.

चीन के शिनचियांग प्रांत और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को जोड़ने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर (सीपीईसी) के लिए आधारभूत ढांचे की कई परियोजनाओं के सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए थे.

अप्रैल में लॉन्च होने के बाद से सीपीईसी परियोजनाओं पर न सिर्फ़ मीडिया बल्कि सभी सरकारी विभागों का भी ज़ोर रहा लेकिन कुछ विश्लेषक इन्हें लेकर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं.

पाकिस्तानी सरकार और मीडिया सीपीईसी को बेरोज़गारी और बिजली की कमी से परेशान जनता के लिए वरदान बता रहे हैं.

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पाकिस्तान के एक बड़े अख़बार ने हाल ही में एक संपादकीय में लिखा था, "पाकिस्तान और चीन की दोस्ती सहयोग के एक नए दौर में प्रवेश कर गई है क्योंकि चीन एक आर्थिक कोरिडोर बनाने में 46 अरब डॉलर (29.76 खरब रुपये से ज़्यादा) का निवेश कर रहा है. ग्वादर बंदरगाह के पूरी तरह सक्रिय होने और ड्यूटी-फ़्री क्षेत्र बनने के बाद पाकिस्तान एक व्यापारिक केंद्र बन सकता है."

पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ़ ने इस महीने लंदन यात्रा के दौरान कहा, "सीपीईसी पासा पलट देने वाला साबित होगा और क्षेत्र में समृद्धि का नया दौर लाएगा."

सेना को सीपीईसी परियोजनाओं की सुरक्षा की महती ज़िम्मेदारी दी गई है और करीब 10,000 सैनिकों वाली एक नई डिविज़न को तैयार करने के आदेश दिए गए हैं.

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लेकिन ऐसा लगता है कि जनरल फ़ौजियों की कुल संख्या को बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं जो अभी 50 लाख सक्रिय सैनिकों के क़रीब है.

इसका पहला संकेत तब मिला जब सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ ने एबटाबाद में पाकिस्तान सैन्य अकादमी का दौरा किया और कैडेट की संख्या में सालाना 20 फ़ीसदी बढ़ोतरी की अनुमति दी.

अब चूंकि सेना में सभी कैडेट अधिकारी बनते हैं इसलिए प्रशिक्षण की समाप्ति पर अधिकारी कैडरों की संख्या में वृद्धि का मतलब है कि उसी अनुमात में सैनिक भी बढ़ाए जाएंगे.

मई 2013 के चुनाव में नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) का एक बड़ा वादा था ऊर्जा संकट का शीघ्र समाधान.

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प्रधानमंत्री के छोटे भाई और पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ का मीडिया में इस बात के लिए मज़ाक उड़ाया जाता है कि उन्होंने अपनी पार्टी के सत्ता में आने पर बहुत जल्द बिजली की कमी दूर करने का वादा किया था.

अब आधा कार्यकाल समाप्त होने के बाद पार्टी के नेता बिजली संकट ख़त्म करने के बारे में किसी तारीख़ का एलान करने से बचते हैं.

हालांकि यह दावे और वादे सीपीईसी के समय पर लागू होने से जुड़े हुए हैं क्योंकि इसमें बिजली उत्पादन परियोजनाएं भी शामिल हैं.

38 अरब डॉलर तक के निवेश से 8230 मेगावाट बिजली पैदा करने का अनुमान है.

इस बीच, सरकारी हलकों में सीपीईसी परियोजनाओं का श्रेय लेने की बेचैनी है.

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दो प्रमुख मंत्री- ख्वाजा आसिफ़ (डब्ल्यूएपीडीए) और शाहिद ख़ाकान अब्बासी (पैट्रोलियम), ने हाल ही में ऊर्जा परियोजनाओं में कथित रूप से धीमी प्रगति के लिए योजना आयोग की आलोचना की है.

वे इन योजनाओं पर काम की गति धीमी होने से इतने निराश लग रहे थे कि उन्होंने योजना आयोग को भंग करने की मांग कर दी और कहा कि यह राष्ट्रीय हितों के ख़िलाफ़ है.

इसके जवाब में योजना आयोग के प्रभारी मंत्री अहसान इक़बाल ने सख़्त शब्दों में प्रेस विज्ञप्ति जारी की.

मीडियो रिपोर्टों के अनुसार इक़बाल ने कहा, "कुछ मंत्री और विभाग विकास परियोजनाओं की सख़्त समीक्षा से चिढ़े हुए लग रहे हैं, लेकिन इससे योजना आयोग सरकारी पैसे की सुरक्षा की अपनी ज़िम्मेदारी से विमुख नहीं हो सकता."

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सीपीईसी परियोजनाएं को न सिर्फ़ अनपेक्षित हलकों से भी सराहा गया है बल्कि इनके ज़रिए विदेशी निवेश को भी आकर्षित किया जा रहा है.

पाकिस्तान में यूएसएआईडी मिशन के निदेशक जॉन पी ग्रोअर्के ने सीपीईसी की सराहना करते हुए दो दिन पहले कहा कि अगर यह योजना सफल रही तो पाकिस्तान के लिए बहुत फ़ायदेमंद होगी.

यह थोड़े अचरज की बात है क्योंकि पहले माना जा रहा था कि अमरीकी क्षेत्र में चीनी प्रभाव बढ़ने का विरोध करेंगे.

ब्रिटेन के डिपार्टमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (डीएफ़आईडी) की इस घोषणा से पाकिस्तान में सभी लोग अचरज में पड़ गए कि वह सीपीईसी के तहत पंजाब प्रांत और ख़ैबर पख़्तूनख्वा में बनने वाले मोटरवाहन मार्ग के दो हिस्सों के लिए दिए जाने वाले 21.36 करोड़ डॉलर के अनुदान में एशियन डेवलवमेंट बैंक (एडीबी) का साथ देगा.

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पाकिस्तान ने कराची से लाहौर तक 1,100 किलोमीटर लंबी तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) लाइन के लिए हाल ही में रूस के साथ 2.5 अरब डॉलर का अनुबंध किया है.

लेकिन देश के अंदर सीपीईसी की भारी तारीफ़ और देश के बाहर इससे मिलने वाले फ़ायदों के बावजूद सीपीईसी में सब कुछ ठीक नहीं है.

पाकिस्तान की संसद के उच्च सदन सीनेट में विपक्षी दलों ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर में कथित मार्ग परिवर्तन के विरोध में वॉकआउट किया.

राजनीतिक दलों के इसी तरह के विरोधों के बाद प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ राजनीतिक दलों की एक बैठक बुलाने पर मजबूर हो गए ताकि बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को चरणबद्ध ढंग से लागू करने पर सहमति बनाई जा सके.

इसमें ख़ैबर पख़्तूनख़्वा और बलूचिस्तान के कम विकसित इलाक़ों में सड़कों और मोटरवाहन मार्गों को प्राथमिकता दिए जाने की बात कही जा रही है.

इसके अलावा पाकिस्तान के अपने वादे पर बने रहने में भी दिक्कत हो रही है जिससे कुछ मामलों में चीन से मिले कर्ज के ब्याज पर दोबारा बात करनी पड़ी है.

परियोजनाओं को बिना किसी बाधा के जारी रखने के लिए चीन ने ग्वादर में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और एक एक्सप्रेसवे बनाने के लिए ऋण को ब्याज-मुक्त सहायता में बदल दिया है.

वहीं 3.8 अरब डॉलर के एक और ऋण पर ब्याज को तीन फ़ीसदी से घटाकर 1.6 फ़ीसदी कर दिया गया है.

सुरक्षा से जुड़े भी कुछ मुद्दे हैं जो चीन प्रायोजित परियोजनाओं को लागू करने में गंभीर समस्या पैदा कर सकते हैं.

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कई क्षेत्रों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की ज़मीन पर मौजूदगी या उसका प्रभाव एक बड़ा ख़तरा है.

सेना के अभियान के चलते अफ़ग़ानिस्तान से लगने वाले पाकिस्तान के कबायली इलाक़ों में चरमपंथी अभी कमज़ोर लगते हैं लेकिन परिस्थितियां बदल सकती हैं.

सीपीईसी परियोजनाओं को बलूचिस्तान के राष्ट्रवादी चरमपंथ के हिंसक विरोध को झेलना पड़ सकता है.

उनकी क्षमता तुलनात्मक रूप से कम होने के बावजूद बलोच गुटों ने चीनी नागरिकों और परियोजनाओं को लगातार निशाना बनाया है ताकि विदेश निवेश ख़त्म किया जा सके. काम तेज़ होने के बाद उनकी गतिविधियां भी बढ़ सकती हैं.

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चीनी कर्मचारियों और सीपीईसी परियोजनाओं पर हमलों की आशंकाएं हैं लेकिन उम्मीद की जा रही है कि सीपीईसी से मिलने वाले फ़ायदों की संभावना को देखते हुए चीन पाकिस्तान की अशांत स्थिति और देरी को लेकर बहुत धैर्य रखेगा.

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तानी समाज में मौजूद अनियंत्रित भ्रष्टाचार, लाल फीताशाही और सिंध और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा की प्रांतीय सरकारों के साथ संघीय सरकार का राजनीतिक विरोध अहम परियोजनाओं के समय पर पूरे होने के लिए बड़ी दिक्कत साबित हो सकते हैं.

पाकिस्तान में कुछ लोग अब भी बेनज़ीर भुट्टो के शासनकाल में 1994 में शुरू की गई स्वतंत्र ऊर्जा परियोजनाओं (आईपीपी) के हश्र को याद करते हैं.

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बेनज़ीर भुट्टो के सत्ता से बेदखल होने के बाद आई नवाज़ शरीफ़ सरकार की इन परियोजनाओं को ख़त्म करने या उन पर फिर से चर्चा करने की एकतरफ़ा कोशिशों के चलते इनमें तीन साल की देरी हो गई, जिससे कुछ विदेशी निवेशक इन परियोजनाओं को छोड़ने पर मजबूर हो गए.

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