'श्रीलंकाई सेना ने युद्ध अपराध किए थे'

  • 21 अक्तूबर 2015
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श्रीलंका के एक न्यायाधीश मैक्सवेल पारानागामा ने कहा है कि देश में लंबे समय तक चले युद्ध के दौरान सेना पर लगे युद्ध अपराधों के आरोप विश्वसनीय हैं.

संयुक्त राष्ट्र के खुलासों के बाद युद्ध अपराधों की जांच के लिए श्रीलंका सरकार की ओर से बनाई गई पहली जांच कमेटी का नेतृत्व मैक्सवेल पारानागामा कर रहे हैं.

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श्रीलंका की सेना पर लिबरेशन ऑफ तमिल टाइगर ईलम के विद्रोहियों के साथ लंबे समय तक चले संघर्ष के दौरान युद्ध अपराध के आरोप लगते रहे हैं.

क़रीब तीन दशक तक चले युद्ध में करीब एक लाख लोगों की जानें गई थी.

ब्रितानी टीवी चैनल 'चैनल फोर' और संयुक्त राष्ट्र ने श्रीलंका में युद्ध के दौरान हुए अत्याचारों पर तैयार दस्तावेज और वृतचित्र बनाए हैं.

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एक जांच में पता चला कि युद्ध के अंतिम पांच महीनों में ही क़रीब 40 हजार लोगों को मार डाला गया था. वहीं कुछ अन्य लोगों का कहना है कि इस तरह की मौतों की संख्या और अधिक हो सकती है.

मैक्सवेल पारानागामा ने मंगलवार को श्रीलंका की संसद में कहा कि सशस्त्र बलों के कुछ जवानों ने युद्ध के अंतिम दिनों में अपराध किए. इससे युद्ध अपराधों का ग्राफ बढ़ा. उन्होंने कहा कि सैनिकों पर लगे ये आरोप विश्वसनीय थे.

उन्होंने कहा कि चैनल 4 के वृत्तचित्र 'नो फायर ज़ोन' में जिस फुटेज का इस्तेमाल किया गया है, जिसमें नंगे कैदियों, आंखों पर पट्टियां बंधे कैदियों और हाथ बंधे कैदियों को गोली मारते दिखाया गया है, वो वास्तविक हैं.

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चैनल फ़ोर ने जिस समय यह डाक्यूमेंट्री दिखाई थी, उस समय श्रीलंका की सेना ने उसे मनगढ़्ंत बताते हुए खारिज कर दिया था.

पारानागामा कमीशन ने कहा है कि मई 2009 में प्रमुख तमिल राजनेता की हत्या के मामले, जो कि 'व्हाइट फ्लैग' केस के नाम से मशहूर है, उसकी भी जांच होनी चाहिए.

उन्होंने सरकार से अंतरराष्ट्रीय समर्थन वाले एक न्यायिक जांच आयोग का गठन करने को कहा, जैसा कि इस साल सितंबर में आई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में भी कहा गया है.

श्रीलंकाई सरकार ने हमेशा अपने सैन्य बलों के युद्ध अपराधों में शामिल होने का खंडन किया है किसी भी तरह के अंतरराष्ट्रीय जांच से इनकार किया है.

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