'मैं तालिबान से हूँ और आदमखोर नहीं हूँ'

अफ़ग़ानिस्तान के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले हाईवे पर एक छात्रा ने तालिबान का छुपकर वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर डाल दिया.

सआदत (पूरा नाम नहीं) नाम की यह छात्रा मज़ार-ए-शरीफ में अपने घर से काबुल स्थित यूनिवर्सिटी जा रही थी तभी उसकी बस को तालिबान ने रोक लिया.

उसी वक्त उसने अपने कैमरे को छुपाकर एक बंदूकधारी और दूसरे यात्रियों के बीच हुई बातचीत को रिकॉर्ड कर लिया.

सआदत ने इस चेतावनी के बाद भी उस दिन यूनिवर्सिटी जाने का फ़ैसला लिया था कि रास्ते में आगे ख़तरा हो सकता है क्योंकि अफ़ग़निस्तान के उत्तरी शहर कुंदूज़ में तालिबान के साथ झड़पें हुई हैं.

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बाख प्रांत से काबूल जाने वाला रास्ता खाली मैदान के साथ-साथ पहाड़ी इलाकों से भी गुजरता है.

इन्हीं इलाकों में मशहूर सालंग दर्रा भी पड़ता है. इसे देश के दक्षिण और पूर्वी सड़कों की तुलना में अधिक सुरक्षित माना जाता है.

अक्सर यह हाईवे व्यस्त रहता है. हर दिन इस हाईवे से 20 यात्री बसें गुजरती हैं.

वो बताती हैं कि बग़लान प्रांत में आधे रास्ते की दूरी तय करने के बाद उन्होंने पाया कि सड़क पर जाम लगा हुआ है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "मुझे लगने लगा कि कुछ होने वाला है और मैंने अपने मोबाइल फोन से वीडियो बनाना शुरू कर दिया."

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Image caption काबुल में सादत ने बीबीसी से बताया कि उन्होंने वीडियो क्यों बनाई?

तालिबान जब हुकूमत में थे तो सआदत बाहर रहकर पली-बढ़ी थीं. वो बताती हैं कि उन्होंने कभी भी किसी तालिबान को नहीं देखा था.

वो बताती हैं कि नाके को कई लड़ाकों ने घेर रखा था और उनके कंधों पर बड़े-बड़े हथियार थे.

उनमें से एक हथियारबंद आदमी बस पर चढ़ा और मुसाफिरों से फारसी और पश्तो में बात करने लगा.

बातचीत में तालिबान लड़ाके की आवाज़ में नरमी थी.

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उसने मुसाफिरों से खैरियत पूछी. मुसाफिरों ने जब यह पूछा कि वो पख़्तून हैं, तो उसने जवाब दिया कि नस्ल कोई मायने नहीं रखती.

उसने कहा, "इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. कोई पश्तो, फारसी, उज़्बेक या तुर्की नहीं है. मैं एक देशवासी हूं. सभी मुसलमान भाई हैं चाहे वो रूसी ही क्यों ना हो. जब तक मुसलमान है हमारा भाई है. कोई समस्या नहीं है."

उसने गाड़ी के मुसाफिरों से पूछा कि वे लोग सेना या सरकार के लड़ाके तो नहीं है.

एक औरत ने इंकार करते हुए उसे भरोसा दिलाया कि सभी मुसाफिर आम नागरिक हैं.

उसने मुसाफिरों से अपील की कि अगर वे सरकारी नौकरी करते हैं, तो उन्हें नौकरी छोड़ देनी चाहिए और अगर वे लोग ऐसा करते हैं तो वे उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाएँगे.

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गाड़ी से उतरते हुए तालिबान बंदूकधारी ने कहा, "कुछ लोग तालिबान को आदमखोर कहते हैं. मैं तालिबान हूं और आदमखोर नहीं हूं."

लेकिन उन्होंने आगे कहा, "मैं अमरीकियों का सिर खाऊंगा."

तालिबानी बंदूकधारी के बस से उतरते ही एक सवारी की आवाज़ आई, "ख़ुदा का शुक्र है चला गया."

सआदत का कहना है कि उसके जाने के बाद मुसाफिरों ने राहत की सांस ली, लेकिन यह कुछ ही सेकेंड तक कायम रह पाई क्योंकि गाड़ी को दोबारा रोक लिया गया.

सआदत का कहना है कि वो अब बहुत डर गई थीं. उन्हें लग रहा था कि तालिबानी बंदूकधारी ने उन्हें फ़िल्म बनाते हुए देख लिया है.

वो बताती हैं, "एक दूसरा बंदूकधारी बस पर चढ़ा और मेरी तरफ बढ़ा. लेकिन उसने मेरे सामने ड्राइवर के पास पड़े हुए कालीन की ओर इशारा करते हुए उसे हटाने को कहा."

कालीन पर एक अर्धनग्न औरत की तस्वीर बनी हुई थी.

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आख़िरकार फिर से बस का सफर शुरू हुआ और सआदत सुरक्षित काबुल पहुंचीं.

सोशल मीडिया पर सआदत के वीडियो पोस्ट करने के बाद उन्हें कई सारे संदेश मिले.

कई लोगों ने उनके इस कदम की तारीफ की है तो कई ने उनकी आलोचना की है.

सआदत बताती हैं, "कुछ ने कहा कि बहुत अच्छा, तुम बहादुर हो, गुड लक, हमें तुम पर गर्व है और इस तरह की बातें कहीं."

"लेकिन कई दूसरे लोगों का कहना था कि तुमने जोखिम लिया है, तुमने मुसाफिरों की ज़िंदगी ख़तरे में डाली, ऐसा दोबारा नहीं करना."

सआदत ने कहा कि उन्होंने फ़िल्म इसलिए बनाई क्योंकि उस वक्त के हालात बहुत दिलचस्प थे और मैं इसे परिवार और दोस्तों के साथ शेयर करना चाहती थी.

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