भारत जैसी डील न होने पर ख़फ़ा पाक मीडिया

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पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की अमरीकी यात्रा और राष्ट्रपति बराक ओबामा से उनकी मुलाक़ात पर पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में ख़ूब नुक्ता चीनी हो रही है.

रोज़नामा 'एक्सप्रेस' लिखता है कि शरीफ़-ओबामा मुलाक़ात में दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात हुई, लेकिन व्यवहारिक तौर पर कोई बड़ा समझौता वजूद में नहीं आया.

अख़बार लिखता है कि जिस तरह चीन बाक़ायदा समझौते के तहत पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है या फिर जैसे अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने भारत दौरे में इससे भी बड़े पैमाने पर रक्षा, व्यापार और अन्य क्षेत्रों में समझौते किए गए थे, ऐसा कोई समझौता पाकिस्तान और अमरीका के बीच नहीं हो पाया.

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Image caption चीनी राष्ट्रपति ने अपने पाकिस्तान दौरे में वहां 46 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी

हालांकि साझा घोषणापत्र का ज़िक्र करते हुए अख़बार लिखता है कि दोनों नेताओं ने स्थायी साझेदारी क़ायम करने का संकल्प जताया है.

'नवा-ए-वक़्त' लिखता है कि पाकिस्तान में भारत की दख़लंदाज़ी और कश्मीर मुद्दे पर अमरीका की तरफ़ से वैसा जवाब नहीं मिला, जिसकी पाकिस्तान में उम्मीद की जा रही थी.

अख़बार लिखता है कि कश्मीर पर अमरीकियों की तरफ़ से वही घिसापिटा 'बातचीत करो' का रवैया सामने आया.

हालांकि अख़बार इस नज़रिए से नवाज़ शरीफ़ के दौरे को कामयाब मान रहा है कि अमरीका ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम और उसके छोटे हथियारों की सुरक्षा पर ज़ोर नहीं दिया.

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लेकिन 'जसारत' अख़बार कहता है कि ये घोषणापत्र औपचारिकता से ज़्यादा कुछ नहीं है और इसके ज़रिए पाकिस्तान को फिर 'डू मोर' का हिदायतनामा ही थमाया गया है.

अख़बार लिखता है कि अमरीकी राष्ट्रपति ने बातचीत से पहले ही अपने एजेंडे का एलान कर दिया यानी पाकिस्तान अफ़ग़ान तालिबान पर हथियार डालने के दबाव डाले और इसका तरीक़ा है काबुल में बैठी कठपुतली सरकार से बात करना.

'जसारत' के मुताबिक़ पाकिस्तान में भारत की दख़लंदाज़ी के सबूतों को अमरीकी सरकार पी गई लेकिन साझा घोषणापत्र में नए फ़रमान पाकिस्तान को जारी कर दिए गए हैं.

वहीं 'दुनिया' कहता है कि ओबामा से मुलाक़ात में नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि लश्कर-ए-तैयबा समेत तमाम दहशतगर्द संगठनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेंगे जबकि ऐसी कोई हामी भरने की ज़रूरत ही नहीं थी क्योंकि पाकिस्तान पहले ही दहशतगर्दों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है.

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Image caption अफ़ग़ान राष्ट्रपति पाकिस्तान पर चरमपंथियों की मदद करने का आरोप लगा चुके हैं

'मशरिक़' ने अफ़ग़ानिस्तान को लेकर लिखा है कि जो मक़सद अमरीका हासिल नहीं कर पाया, उन्हें हासिल करने की वो दूसरों से कैसे उम्मीद रख सकता है.

अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान की कोशिशों का ही नतीजा था कि अफ़ग़ान अधिकारी और तालिबान प्रतिनिधि मरी में आमने-सामने बैठे लेकिन मुल्ला उमर की मौत की घोषणा के बाद बातचीत पटरी से उतर गई.

वहीं 'औसाफ़' ने भारत के केंद्रीय मंत्री वीके सिंह के हालिया विवादास्पद बयान पर संपादकीय लिखा है. अख़बार कहता है कि मंत्री ने दलित बच्चों को कुत्ता बताकर भारत के चेहरे पर फिर कालिख मल दी.

अख़बार की राय है कि संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के प्रतिनिधियों को भारत भेजा जाना चाहिए ताकि वो वहां अल्पसंख्यकों और दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों की निगरानी करें.

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Image caption वीके सिंह अपने बयान पर माफ़ी मांग चुके हैं लेकिन विपक्षी दल इसे लगातार मुद्दा बना रहे हैं

वहीं पेशावर से छपने वाले ‘आज’ ने भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट बोर्डों के प्रमुखों की मुलाक़ात से पहले मुंबई में शिवसैनिको के हंगामे को हमला बताते हुए कहा है कि ये दुनिया की आंखें खोले के लिए काफ़ी है.

भारत में हालिया कुछ हिंसक घटनाओं का ज़िक्र करते हुए अख़बार लिखता है कि ये बातें पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठानी चाहिए ताकि दुनिया को पता चले कि सेक्युलरिज़्म और लोकतंत्र का राग अलाप वाले भारत में हो क्या रहा है.

रुख़ भारत का करें तो दिल्ली से छपने वाले 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' ने हरियाणा के घटनाक्रम पर लिखा है- हरियाणा में दलितों पर सितम.

अख़बार ने बसपा प्रमुख मायावती के हवाले लिखा है बिहार में भाषणबाज़ी करने से पहले प्रधानमंत्री मोदी बताएं कि केंद्र और हरियाणा में उनके राज में ग़रीब, दबे कुचले और दलित कब तक ज़िंदा जलाए जाते रहेंगे.

अख़बार लिखता है कि मामला भले ही आपसी रंजिश का हो लेकिन सुनपेड़ गांव में दशकों से दलितों और ऊंची जातियों के बीच चल रहा ख़ूनी खेल चौंकाने वाला है जिसमें कई सवर्ण भी मारे गए हैं.

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Image caption कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी पीड़ित दलित परिवार से मिलने गए

वहीं 'हमारा समाज' में वीके सिंह के विवादास्पद बयान का ज़िक्र है.

अख़बार कहता है कि भारतीय जनता पार्टी के कुछ कट्टरपंथी नेताओं के लगातार आ रहे समाज और दलित विरोधी बयानों से ऐसा लगता है कि ग़रीब और निचले वर्गों के लोगों को यहां रहने का कोई हक़ नहीं है.

अख़बार के मुताबिक़ ये बयान पार्टी को नुक़सान पहुंचा रहे हैं जिसकी भरपाई के लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को विवादित बयान देने वाले संगीत सोम और साक्षी महाराज समेत पांच नेताओं को धमकी भरे अंदाज़ में नहीसत देनी पड़ती है.

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