'इससे अच्छा मैं काफ़िर मुल्क में रह लूं'

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अफ़ग़ानिस्तान में कौन जीत रहा है, कहना मुश्किल है.

सरकार भारी दबाव में है. अमरीकी नेतृत्व वाली नेटो गठबंधन सेना के बिना तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ रही अफगान सेना का मनोबल टूट चुका है.

अफ़ग़ानी फौज पहले से ही कम वेतन और जरूरत से अधिक बड़े आकार की समस्या से जूझ रही है.

महत्वपूर्ण प्रांत हेलमंद में सेना का तालिबान से संघर्ष चल रहा है.

लेकिन रणनीतिक रूप से अहम शहर कुंदूज़ में अफगान तालिबान ने फौज को जिस तरह से टक्कर दी उसका असर आम लोगों के दिलो-दिमाग पर लंबे समय तक रहेगा.

आम नागरिक देश के भीतर उथल-पुथल से बहुत परेशान हो चुके हैं.

ऐसे में ये कोई ताज्जुब की बात नहीं कि सीरिया के बाद यूरोप में सबसे अधिक प्रवासी अफ़ग़ानिस्तान से पहुंच रहे हैं.

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यहां लोग उलझन में हैं कि क्या करें- अफ़ग़ानिस्तान में ही रहें या जान जोखिम में डालकर यहां से पलायन कर जाएं.

अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की इस मनोदशा का फायदा उठा कर उन्हें बाहर भेजने वालों का एक नेटवर्क बन गया है. लोगों को अफ़ग़ानिस्तान से यूरोप भेजने के नाम पर खूब पैसा कमाया जा रहा है.

बीबीसी ने उनमें से एक व्यक्ति से संपर्क किया.

अब्दुल (काल्पनिक नाम) इसी नेटवर्क के लिए काम करते हैं. उन्होंने बताया कि वे एक व्यक्ति को अफ़ग़ानिस्तान से ईरान, तुर्की होते हुए यूरोप पहुंचाने के लिए 5,000 से 7,000 डॉलर की रकम वसूलते हैं.

अब्दुल को इस रकम में से 10 प्रतिशत मिलता है और बाकी पैसे नेटवर्क के दूसरे लोगों को चला जाता है.

जिन्हें देश छोड़कर बाहर जाना होता है वो रकम का कुछ हिस्सा पहले जमा कर देते हैं और बाकी पैसे उनके मंजिल पहुंचने के बाद, परिवार चुकाता है.

इस सफर में कदम कदम पर खतरे होते हैं.

अब्दुल बताते हैं, "तुर्की और ग्रीस के बीच का सफर सबसे जोखिम भरा है. यहां पुलिस लोगों पर गोली चला देती है. कई बार हमारी बोट पकड़ ली गई. लेकिन इन सबकी खैरियत का मालिक अल्लाह ही है, मैं कौन होता हूं."

वे बताते हैं कि देश के अलग अलग हिस्सों से विभिन्न नौकरीपेशा लोग अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जाने के लिए उनके पास आते हैं. वे सबसे पहले देखते हैं कि इनमें से कोई बीमार, बहुत बूढ़ा, बहुत छोटा बच्चा या गर्भवती महिला तो नहीं है.

अब्दुल अपने इस काम को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं. एक ओर तो उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे लोगों की मदद कर रहे हैं तो दूसरी ओर ये भी मानते हैं कि वे लोगों से पैसे लेते हैं और उन्हें एक अनजान और अनिश्चित भविष्य के हवाले कर देते हैं.

उन्होंने बताया, "मैंने अपने तीन बेटों को भी यहां से बाहर भेजा है. जब भी किसी माता-पिता को रोते देखता हूं, उनकी बहुत याद आती है. बहुत दुख होता है. मुझे ये काम ज्यादा पसंद नहीं. कई बार मैं खुद को अपराधी महसूस करता हूं."

राजधानी काबुल के पासपोर्ट ऑफिस के बाहर की एक सर्द सुबह के दृश्य को देखते ही आसानी से समझ में आ जाता है कि क्यों अब्दुल जैसे लोग इस धंधे में लगे हैं.

तड़के सुबह से ही पासपोर्ट ऑफिस के बाहर लोग कतार बनाना शुरू कर देते हैं. कुछ लोग कार के बोनट पर फार्म भरने में लगे हुए दिखाई देते हैं.

ऐसा लगता है कि जैसे सभी चाहते हैं कि यहां से दूर चले जाएं और फिर कभी मुड़ कर वापस ना आएं.

20 साल के आरिफ मोहम्मद गुस्से और हताशा से भरे दिखाई देते हैं.

आरिफ कहते हैं, "यहां हमारे लिए अब न तो कोई काम बचा है, न ही सुरक्षा. भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा है. यहां रहने से अच्छा है कि मैं किसी काफिर मुल्क में रह लूं."

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"मेरे पिता 2007 के एक आत्मघाती बम हमले में मारे गए. मां और भाई की जान तालिबानियों ने ले ली. जानता हूं कि ये सफर जोखिम भरा है लेकिन अब यहां रहने से अच्छा है कि मैं रास्ते में मर जाऊं."

अफ़ग़ानिस्तान में चारों ओर भारी तकलीफ और निराशा का माहौल है. लेकिन इसके बावजूद कुछ कोने ऐसे भी हैं जहां लोगों के बीच उम्मीद अब भी बची हुई है.

उम्मीद से भरे ऐसे ही युवाओं का एक समूह है जो आजकल "अफ़ग़ानिस्तान नीड्स यू" यानी अफ़ग़ानिस्तान को आपकी जरूरत है, नाम से डिजिटल कैंपेन चला रहा है.

इसी समूह के सदस्य हैं 23 साल के शक़ीब मोहसनयार और 26 साल के शराम गुलज़ाद.

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शकीब मोहसनयार कहते हैं कि वे इस अभियान की मदद से देश से प्रतिभा का पलायन रोकना चाहते हैं जबकि शराम गुलजाद का मानना है कि ज्यादातर अफगानी इस छलावे में हैं कि यहां से बाहर का जीवन अच्छा है.

उन्होंने अपना अनुभव बताया, "मैं तब जर्मनी में था. मैंने वहां अफ़ग़ानियों को जीवन के लिए संघर्ष करते हुए देखा है . सबकुछ मनोबल तोड़ने वाला है. लोग सोचते हैं कि वे एक बार यहां से निकल जाएं तो सब कुछ अच्छा हो जाएगा. जबकि ये एक भ्रम है."

लेकिन साथ ही साथ दोनों ही युवक ये भी मानते हैं कि देश में भ्रष्टाचार, रोजगार की कमी और असुरक्षा का माहौल है.

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गुलजाद का कहना है, "एक बार सुबह निकलने के बाद आपको खुद ये पता नहीं होता कि शाम को आप घर लौटकर आएंगे या नहीं."

उन्होंने कहा, "लेकिन फिर जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा. हम सबमें संभावनाएं हैं. और ये अफ़ग़ानिस्तान का अंत नहीं. यदि हम आगे बढ़कर जिम्मेदारी लें तो देश की तस्वीर बदल जाएगी."

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