बांग्लादेश में इस्लामिक स्टेट की दस्तक?

Image caption ढाका में 24 अक्टूबर को मोहर्रम के जुलूस को निशाना बनाया गया

सितंबर के महीने में बांग्लादेश में दो विदेशियों की हत्या और शियाओं के जुलूस पर बम हमले से देश में उथलपुथल का माहौल है.

बांग्लादेश में शिया लोगों को पहली बार निशाना बनाया गया जबकि दो विदेशियों की हत्या के पीछे क्या कारण था, ये अब तक पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाया है.

दुनिया भर में चरमपंथी गतिविधियों पर नज़र रखने वाली अमरीकी संस्था 'साइट' का कहना है कि मध्य पूर्व में सक्रिय कट्टरपंथी गुट इस्लामिक स्टेट ने इन दोनों ही घटनाओं की ज़िम्मेदारी ली है.

'साइट' ने इस्लामिक स्टेट के ट्वीट्स और कट्टरपंथी गुटों से संबंधित वेबसाइटों पर होने वाली चर्चा का हवाला देते हुए इस बात की पुष्टि की है कि दोनों हत्याओं और शियाओं के जुलूस पर बम हमले के पीछे आईएस ही है.

लेकिन बांग्लादेश की सरकार इन दावों को ख़ारिज करती है और उसका कहना है कि ये हत्या और बम धमाके की घटना राजनीति से प्रेरित थीं.

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बांग्लादेश के गृह मंत्री असदुज़मान ख़ान कमाल ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि विपक्षी बीएनपी पार्टी के पार्षद एमए कयूम के आदेश पर 28 सितंबर को इतालवी सहायताकर्मी सेसार तावेल की हत्या की गई. कयूम इसी साल जनवरी से मार्च के दौरान विपक्ष के नेतृत्व वाली नाकेबंदी के दौरान हुए धमाकों के मामले में भी अभियुक्त हैं.

वहीं जापानी नागरिक कुनियो होशी की हत्या के आरोप में एक अन्य बीएनपी नेता को तीन अक्टूबर को बांग्लादेश के उत्तरी जिले रंगपुर से गिरफ्तार किया गया.

एक घास फार्म विकसित करने वाले होशी ने इस्लाम धर्म अपना लिया था.

बांग्लादेश के पुलिस प्रमुख शाहिदुल हक़ कहते हैं, “दोनों ही विदेशी नागरिकों की हत्या एक ही अदांज़ में हुई है. मोटरसाइल पर आए हमलावरों ने तीन बार गोलियां चलाईं. उन्होंने आईएस की तरह उन लोगों का गला नहीं काटा.”

हक़ ने कहा कि सेसार तावेला की हत्या में शामिल होने के संदेह में चार पेशेवर हत्यारों को गिरफ्तार गिया और उन्होंने ‘बड़ो भाई के कहने पर’ हत्या करने की बात क़बूल भी कर ली है.

वैसे ये बात साफ़ नहीं है कि बीएनपी के पार्षद कयूम ही 'बड़ो भाई' है या फिर अपराध की दुनिया का कोई और शख्स इस मामले में शामिल है.

हक इस मामले की जांच को देखते हुए ज़्यादा ब्यौरा नहीं देना चाहते हैं, लेकिन वो इस बात को लेकर आश्वस्त दिखते हैं कि इन घटनाओ के पीछे आईएस का हाथ होने के कोई आसार नहीं हैं.

वो ये भी कहते हैं कि पुराने ढाका में 24 अक्टूबर को शियाओं के जुलूस में जो तीन धमाके हुए उनके पीछे अपराधियों के एक गुट का हाथ है.

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Image caption हसीना हालिया हिंसा के लिए विपक्ष को ज़िम्मेदार बताती हैं

हक़ बताते हैं कि उसी दिन इस गुट ने एक पुलिस सब इंस्पेक्टर की हत्या भी की थी.

वो कहते हैं, “दोनों हत्याओं का आपस में संबंध है और इनका मक़सद हड़कंप फैलाना हो सकता है.”

प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दो विदेशी नागरिकों की हत्या के लिए विपक्षी बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी को ज़िम्मेदार बताया है.

उन्होंने कहा, “वो सरकार को बदनाम करना चाहते हैं, देश की अर्थव्यवस्था को डुबोना चाहते हैं और ये संदेश देना चाहते हैं कि बांग्लादेश विदेशी नागरिकों और अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षित नहीं है.”

वो कहती हैं, “ये षड़यंत्र चलने वाला नहीं है. अल्पसंख्यक समुदाय इस देश में बिना डर के रहेंगे और विदेशी नागरिक भी बिना रोकटोक यहां आते रहेंगे.”

दूसरी तरफ़ बीएनपी पार्टी के नज़रुल इस्लाम ने ये कहने में कोई देर नहीं लगाई कि अगर उनकी पार्टी का कोई भी सदस्य इन हत्याओं में शामिल पाया गया तो इसके लिए पार्टी किसी तरह ज़िम्मेदार नहीं होगी.

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इससे पहले बीएनपी के प्रवक्ता असदुज़मान रिपोन ने सरकार पर आरोप लगाया कि वो हत्याओं को लेकर राजनीति कर रही है. उन्होंने प्रधानमंत्री हसीना से कहा कि मामले की जांच पूरी पारदर्शिता से होनी चाहिए.

सेसार तावेला और कुनियो होशी की हत्या से पहले ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड (एसीबी) ने इस साल अपनी टीम के बांग्लादेश दौरे को स्थगित कर दिया था.

ऑस्ट्रेलियाई बोर्ड ने अपने इस फैसले का आधार कुछ खुफिया जानकारियों को बताया जिनके मुताबिक 'ऑस्ट्रेलियाई हितों को ख़तरा है'.

बांग्लादेश में इस्लामिक स्टेट की गतिविधियों पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुमी ख़ान कहते हैं, “इस्लामिक स्टेट ऐसे किसी जापानी का क्यों मारेगा जिसने इस्लाम धर्म अपना लिया हो. होशी के शव को बांग्लादेश में दफ़नाया गया है क्योंकि जापान में उनका परिवार शव को वहां नहीं ले जाना चाहता था.”

वो कहते हैं, “इस्लामी कट्टरपंथी इस्लाम में आने वाले नए लोगों को निशाना नहीं बनाएंगे, क्योंकि वो तो हमेशा लोगों को मुसलमान बनाने के प्रयासों में लगे रहते हैं.”

सत्ताधारी आवामी लीग के सदस्य सुरनजीत सेनगुप्ता का कहना है कि धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगरों की हत्या, दुर्गा पूजा के दौरान कुछ हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़, दो विदेशी नागरिकों की हत्या और शियाओं के जुलूस पर हमला, ‘ये सब एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा हैं और विपक्ष का नई तरह का आंदोलन है.’

वो इसे ‘राजनीतिक आतंकवाद’ का नाम देते हैं.

सेनगुप्ता कहते हैं कि विपक्ष एक तरफ़ परेशानियां पैदा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाने में लगा है, यहां तक कि भारत की मोदी सरकार से भी वो कह रहे हैं कि हसीना को सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर करें.

वहीं कई लोगों का कहना है कि ये भी हो सकता है कि ताज़ा हिंसा जमात और बीएनपी के कुछ वरिष्ठ नेताओं की फांसी को रुकवाने के लिए की जा रही हो.

इन लोगों को 1971 के मुक्ति संग्राम में 'पाकिस्तान का साथ देने और युद्ध अपराध करने के लिए' ये सज़ाएं दी गई हैं.

पाकिस्तान समर्थक इन नेताओं की सज़ा के लिए अभियान चलाने वाली संस्था '1971 घातक दलाल निर्मूल समिति' के संयोजक शहरयार कबीर कहते हैं, “ये लोग इसलिए इतने बड़े पैमाने पर अव्यवस्था फैला रहे हैं कि सरकार फांसी की सज़ाओं को कुछ समय के लिए रोक दे, जिन्हें अपील ख़ारिज हो जाने के बाद फांसी दी जानी है.”

कबीर कहते हैं कि बांग्लादेश में कभी शियाओं को निशाना नहीं बनाया गया था. हालांकि 2001 से 2004 के बीच बीएनपी और जमात की सरकार के दौर में अहमदिया लोगों को ज़रूर निशाना बनाया गया था.

कबीर कहते हैं, “ये पाकिस्तानी असर है और हम जानते हैं कि यहां हम पाकिस्तानियों के क़रीब हैं.” उनका इशारा जमात-ए-इस्लामी की तरफ़ है जिसने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की आज़ादी का विरोध किया था.

भारतीय ख़ुफिया सूत्रों का मानना है कि शियाओं के जुलूस पर हुए हमले और विदेशी नागरिकों की हत्या में जमात का हाथ हो सकता है.

लेकिन वो ये भी चेतावनी देते हैं कि हो सकता है कि जमात के प्रभाव में काम करने वाले बांग्लादेशी कट्टरपंथी गुट मध्य पूर्व में सक्रिय अल क़ायदा और आईएस जैसे गुटों से जुड़ने की फ़िराक में हों.

वो प्रेस में छपे स्थानीय कट्टरपंथी नेता अंसारुल्लाह बांग्ला के बयान का भी हवाला देते हैं जिनमें मीडिया संस्थाओं से कहा गया था कि वो महिलाओं को अपने यहां काम पर न रखें.

अंसारुल्लाह बांग्ला ब्लॉगरों की हत्या के मामले में भी अभियुक्त हैं और उनका महिला विरोधी एजेंडा बांग्लादेश में चली 'हिफाज़त-ए-इस्लाम' मुहिम की याद दिलाता.

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Image caption युद्ध अपराधों के लिए विपक्ष के कई बड़े नेताओं को फांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है

2010 में 'हिफाज़त-ए-इस्लाम' गुट ने सड़कों पर उतर कर महिलाओं की शिक्षा का विरोध किया था.

वैसे ये कट्टरपंथी एजेंडा बांग्लादेश में चलना मुश्किल हैं क्योंकि ये देश के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है, लेकिन हां इससे अशांति जो ज़रूर पैदा होती है.

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